सोमवार, 9 जनवरी 2017

The Spirituality of no.108.

108 की आध्यात्मिक शक्ति/ रहस्य १०८ का/ अष्टोत्तरशत जप- 

यह तो आप सभी जानते होंगे कि जप आदि करने के लिए हम कई प्रकार की मालाओं का प्रयोग करते हैं, मुख्यतः तुलसी ऐवम रूद्राक्ष और इन जप करने वाली मालाओं में १०८ दाने (गिनती के लिए अंक) होते हैं, परंतु १०८ ही क्यों होते हैं ? अपने किसी ईष्ट का नाम अथवा दीक्षा द्धारा प्राप्त मन्त्रों का १०८ के गुणांक/ बारंबारता में उच्चारण क्यों करते हैं ?
हम अपने मानवीय कष्ट कम करने या उनको सहन करने की शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य अथवा कई अन्य उद्देश्यों की पूर्ती के लिए १०८ दानो वाली माला का जप करते हैं और हिन्दू संस्कृति ऐवम वेद-पुराणों आदि में यह संख्या अत्यंत पवित्र मानी गई है। कारण निम्न हैं कि =

- कुल १२ राशियां (Sun Sign) विद्यमान हैं और सौरमण्डल में कुल ९ गृह हैं, जो सभी राशियों में क्रमशः गतिमान रहते हैं। अतः सभी नवगृहों को प्रधान मान कर, सूर्य की सभी १२ रश्मियों से शक्ति प्राप्त करने हेतु हम 12 x 9 = 108 दानो की माला का जप करते हैं।

- ज्योतिष विज्ञान के अनुसार कुल २७ नक्षत्र हैं व मानव योनि के ४ पुरुषार्थ हैं, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष और दूसरी ओर ४ प्रकार के जीव/ प्राणी क्रमशः जरायुज, अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज। हमारा जन्म, कर्म, सभी पुरुषार्थ, भाग्य, सम्पूर्ण जीवन-मरण इन्हीं पर निर्भर होता है। जिसका गुणांक 27 x 4 = 108 है।

-   भारतीय शास्त्रों एवं पुराणों के अनुसार १४ मनु (मन्वन्तर) / १४ यम / १४ भुवन तथा त्रिगुणी सृष्टि के तीन गुण - सत्व गुण, रजो गुण व तमो गुण, ३३ देवी-देवता (स्पष्टीकरण के लिए मेरा दि० १५ फरवरी,२०१४ का ब्लॉग देखें), सृष्टि/ प्रकृति के जीव का निर्माण कुल ५ तत्वों से मिल कर हुआ है और हमारे पवित्र हिन्दू ग्रन्थ श्रीमद्भागवत गीता, जोकि वास्तविक ज्ञान का केंद्र ऐवम स्रोत है, जिसका एक-एक अक्षर ईश्वर वाणी है, कुल १८ अध्यायों में वर्णित है, यही १८ विद्याएं हैं (स्कन्द पुराण-वैष्णव उत्कल०-३३१) तथा महाभारत का युद्ध, (अच्छाई की बुराई पर जीत, अथवा धर्म की अधर्म पर विजय) १८ दिनों तक ही चला था और अंत में धर्म की विजयपताका चहुँओर लहराई थी, फिर ६ शास्त्र (सांख्य, योग, न्याय, विज्ञान/ विषयक, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा) व ४ प्रकार के जीव (जरायुज, अंडज, स्वेदज उद्भिज्ज), ब्रह्माण्ड के सभी प्राणियों/ जीवों का हर तरह से कल्याण करने के लिए १०८ की महत्ता इसप्रकार समीकरणित है -
 14 x 3 = 42 + 33 + 5 +18 + 6 + 4 = 108 है।

- त्रिगुणी सृष्टि के तीन गुण क्रमशः सत्त्व गुण, रजो गुण व तमो गुण, जिनके अधिष्ठाता त्रिदेव (श्री ब्रह्मा-रचयिता, श्री विष्णो-पालनकर्ता व श्री रूद्र-संहारकर्ता) तथा इन तीनो गुणों से संयुक्त जीव/ प्राणी के चार पुरुषार्थ क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष सर्वविख्यात हैं। इनको पाने के लिए भक्ति एक साधन है, जिसके कुल ९ स्वरुप (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, साख्य तथा आत्मनिवेदन) हैं। इस प्रकार से गुणांक जप को ही 'अष्टोत्तरशत जप' कहा गया है।   3 x 4 x 9 = 108 

- हिन्दी वर्णमाला/ मातृका में कुल ५२ अक्षर हैं, जिनमें सभी ३३ देवी-देवता आदि सम्मिलित हैं (स्पष्टीकरण के लिए मेरा दि० १५ फरवरी,२०१४ का ब्लॉग देखें)। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार कुलकुल १२ राशियां (Sun Sign) तथा २७ नक्षत्र (Stars) विद्यमान हैं, ब्रह्माण्ड में व्याप्त अष्टसिद्धि प्राप्त करने हेतु ८ योग (अष्टांग योग) तथा स्कन्द पुराण के अनुसार ९ निधियाँ (महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील, खर्व) परस्पर जुड़कर,  ५२+२७+१२+८+९ = १०८ की ही संख्या पूरी करती हैं।

- स्कन्द पुराण के अनुसार हमारी आत्मा, जोकि परमात्मा का ही एक अंश मात्र है और जो हमारे शरीर रुपी घर में निवास करती है, उस नाशवान शरीर के निर्माण में कुल २५ तत्वों का महत्वपूर्ण योगदान है, ५ महाभूत, ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ विषय, ५वां रूप सदाशिव स्वरुप है, जिसके ५ तत्व- मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति व पुरुष हैं। प्रकृति की चार दिशाऐं अथवा किसी मण्डप के चार द्वार (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण), इस प्रकार प्राणी (स्त्री-पुरुष) अपने शरीर रुपी मंदिर के प्रत्येक तत्व को चहुंओर से बलवान करने तथा अपने चित्त को वृत्तियों से रोकने के लिए अथवा ब्रह्माण्ड में व्याप्त अष्टसिद्धि प्राप्त करने हेतु ८ योग (अष्टांग योग) की शरण लेता है, अतः २५ महातत्वों का चारों दिशाओं से गुणांक तथा उसमे ८ का योग होने से १०८ अंक की जप, तप व होम विधि से प्राप्त शक्ति से हमारी शारीरिक अंतरात्मा बलवती होती है।  25x4=100+8=108 

                                                               - स्कन्द पुराण - कुमारिकाखण्ड (पृष्ठ सं०-१००,२१०,२१४,२२६)


अतः गणना में १०८ अंकों का और उसी के गुणांक में मंत्रोचारण एवं जप, तप, होम आदि का वैज्ञानिक, दैविक तथा आध्यात्मिक विधान है, जो पूर्णतयः सकारात्मक और उर्जात्मक है।



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