बुधवार, 25 जनवरी 2017

GYAN - 2

ज्ञान  - २ 

ज्ञानोपदेशः  


'ज्ञान' शब्द का शाब्दिक अर्थ पीछे  दि० २५ जनवरी,२०१७ के ब्लॉग में देखें। 

ज्ञान शब्द का प्रथम युग्माक्षर 'ग' और 'य' है जो परस्पर योग से एकाक्षर 'ज्ञ' उच्चारित करता है। यह अक्षर 'ग' भी पंचाक्षरी महिमा से ओत-प्रोत है, इस एक 'ग' में सृष्टि के पांच महातत्व विद्यमान हैं। शिव-पार्वती पुत्र, प्रथमेश (प्रथम पूजनीय) तथा बुद्धि के देवता 'गणेश' का बीजाक्षर 'गं' है। भगवान गणेश के यह पञ्च गं निम्न हैं, जो गणेश की भांति ही प्रथम पूजनीय तथा वन्दनीय हैं, पुण्यदायक व प्राणस्वरूप हैं - 

१- गुरू,          २- गौ/ गाय,          ३- गंगा,          ४- गायत्री,          ५- गीता।      


- सर्वप्रथम व्यक्ति/ जिज्ञासु गुरू के संपर्क में आता है, तत्पश्चात गुरू ही उसे आगे का मार्ग दर्शाता/ बताता है, चाहें वह माता-पिता के रूप में हों अथवा अन्य कोई आदरणीय, पूजनीय अथवा अनुभवी व्यक्ति। गुरु की महिमा का व्याख्यान तो सौरमण्डल के अधिष्ठाता, महागुरु सूर्य या देव गुरू वृहस्पति भी नहीं कर पाए। जीवन में गुरु की महत्ता अत्यधिक है। गुरू-शिष्य का परमानन्दित सम्बन्ध और उनकी उपस्थिति केवल महसूस की जा सकती है, व्यक नहीं। गुरू के बारे में वेद सम्मत मंत्र निम्न है -

 गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः ।   
गुरू साक्षात परब्रह्माः, तस्मै श्री गुरुवे नमः।।


- गौ/ गाय, एक चौपाया-दुग्धक पशु मात्र नहीं है, वरन देवताओं का एक सम्पूर्ण समूह है। वेद-पुराणों के अनुसार जिसमें सभी ३३ कोटि देवी-देवता आदि प्रत्यक्ष निवास करते हैं। इस पवित्र पशु को सृष्टि में स्तन पान कराने वाली 'माँ' का स्थान दिया गया है। यह संसार का एक मात्र जीव है, जो अपनी श्वांस वायु के दौरान कॉर्बन-डाई-ऑक्साइड गृहण करती है और प्राणदायनी ऑक्सीजन का प्रवाह करती है। रोग से ग्रस्त प्राणी के लिए तो गाय का स्पर्श मात्र ही रामवाण/ प्राणदायक औषधि है। गौदुग्ध और गौमूत्र तो किसी औषधि अथवा अमृत से कम नहीं। गाय का दूध, उसका मल-मूत्र (गोबर एवम गौमूत्र) आदि सभी कुछ प्राणिजगत के लिए किसी न किसी रूप में पुष्टिवर्धक तथा लाभदायक है।


- प्राणदायनी, मोक्ष प्रदायनी, पाप विनाशक, पवित्र जल-अमृत धारा माँ गंगा, धरती पर एक मात्र जल का प्रथम स्रोत है, जो प्राणी/ जीव के पञ्च तत्वों में से एक है, जिसे महादेव शिव ने अपनी जटा में धारण करके, एक जल धारा के रूप में पृथ्वी पर उतारा है। सृष्टि के जल की एक-एक बूँद गंगामयी है, गंगा से ही निकली है, परन्तु मूलरूप-प्राकृत गंगा का अपना स्वरुपात्मक गुण आज भी ज्यों का त्यों है। गंगा जल में ऑक्सीजन आदि तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं। गंगा नदी के जल में स्नान और गंगा नदी के जल का पान आदि का पुण्यात्मक, आध्यात्मिक, दैविक तथा वैज्ञानिक माहात्म्य प्राचीन वेद-पुराणों व शास्त्रों में हमारे ऋषि-मुनियों ने अपनी कलम-स्याही से समुद्र के समुद्र उड़ेल दिए हैं, परन्तु निर्मल-पावन गंगा की महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर पाए।


 - माँ गायत्री का माहात्म्य तथा २४ अक्षरों वाले गायत्री मंत्र की महिमा का गान तो स्वयं १८ पुराण तथा चारों वेद आदि करते हैं। महादेव द्वारा वर्णित एक स्वतंत्र देवी हैं, माँ गायत्री। श्रीरामचन्द्र जी ने स्वयं महादेव की स्तुति भी मन्त्रों के राजा गायत्री मंत्र द्वारा ही की थी। सभी देवी-देवताओं का अपना प्रथक गायत्री मंत्र होता है। वेदमूर्ति पं० श्री राम शर्मा आचार्य ने तो माँ गायत्री की आराधना मात्र से तथा उनके गायत्री मंत्र को आधार बना के एक विश्व व्यापी मिशन की स्थापना कर दी। मानव जाति के कल्याण के लिए स्वयं ईश्वर ने गायत्री मन्त्र को सर्वश्रेष्ठ बताया है, जिसे पृथ्वी पर सभी धर्मो ने अपनाया भी है, वह निम्न है -  
भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
 
भावार्थ- उस प्राण स्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें। 
गणेश गायत्री मंत्रशिव गणों के ईष्ट, सृष्टि के प्रथम पूजनीय व विघ्नहर्ता भगवान गणेश का गणेश गायत्री मन्त्र  इस प्रकार है - महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्।

सूर्य गायत्री मंत्रनिःरोगी काया, भोग  मोक्ष प्रदायक शक्तिपुंज के अधिष्ठाता भगवन सूर्य का सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार है आदित्याय विद्महे, विश्वभावाय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात।




- भगवान् नारायण के नाभि-कमल से उत्पन्न श्री ब्रह्मा के मुखारविंद से वेदों की उत्पत्ति हुई। पृथ्वी के श्रेष्ठतम गुरु 'श्री व्यास' ने वेदों का सार पुराणों-शास्त्रों-उपनिषदों में प्रतिपादित किया। इस प्रकार वैदिक और शास्त्रीय ज्ञान तथा भगवान् के मध्य कई व्यवधान पड़े, जबकि श्री विष्णु के द्धापर युग के अवतार श्री कृष्ण ने महाभारत के कुरुक्षेत्र में अपने सखा अर्जुन को 'गीता का उपदेश' दिया। अतः गीता तो स्वयं भगवान् के श्री मुख से निकली है। पवित्र ग्रन्थ गीता के लिए स्वयं वेदव्यास जी ने कहा है -
गीता सुगीता कर्त्तव्या किमन्यैयः शास्त्रसंग्रहैः। 
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्मद्विनिः सृता ।।

भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन का सार व सार्थकता 'श्रीमद्भागवत गीता' में है। सम्पूर्ण मानव जाति को लक्ष्य प्राप्ति करादेने में सहायक और एकमात्र आश्रय 'गीता' ही है, जो सर्वार्थ-सिद्ध तथा सबल-साधन के रूप में उद्घृत है। गीता की महत्ता लोक कल्याणकारी है, सर्व-मान्य व विश्वप्रसिद्ध है और हमारा तो राष्ट्रीय ग्रन्थ है।  


          जिस प्रकार प्राणी का नश्वर शरीर सृष्टि के पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से मिलकर बना है और ये सभी प्राकृतिक तत्व जीवन का आधार हैं, ठीक उसी प्रकार उपरोक्त पञ्च गं का ज्ञानोपदेश, समझ एवं अनुभव, जीवन का वास्तविक ज्ञान ही नहीं है, अपितु इनकी शिक्षा, इस विशाल पर्वत रुपी संघर्षमयी जीवन को जीने के लिए व अपने जीवन आनंदित बनाने के लिए प्रारम्भिक और अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।


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