शनिवार, 22 मार्च 2014

Words & Deed

कथनी और करनी / वचन एवं कर्म 

उपरोक्त शब्दों के समूह और उनके अर्थ से हम भलीभाँति परिचित हैं, परन्तु वास्तविक, शाब्दिक और भावनात्मक अर्थ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, उसका आध्यात्मिक अर्थ और उसका गूढ़ रहस्य । 

कथनी, वचन, कथन, मुँह से निकले शब्द, विचारों का शाब्दिक चित्रण, शब्दों का व्यवहारिक और वैचारिक रूप आदि हमारे द्वारा कहे गए वाक्यों का वह समूह है जो पंक्ति एवं अनुच्छेद बनकर हमारे आंतरिक विचारों पर निर्भर हमारे आचरण, व्यवहार और व्यक्तित्व को सकरात्मक या नकारात्मक दर्शन देता है।

करनी, कर्म, हाथों द्वारा किया गया परिश्रम, मानसिक व शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन, कार्मिक पहचान आदि हमारे द्वारा किये अथवा करवाये गए कर्मों का वह प्रत्यक्ष रूप एवं दर्शन है, जो आधार कर्म बनकर हमारे उत्तम भाग्य एवं उज्जवल भविष्य के निर्माण का कारक बनता है और हमें समाज में सकारात्मक या नकारात्मक पहचान दिलाता है।

साधारण भाषा में कहा जाये तो "जैसा हम कहते हैं और जैसा हम करते हैं, उसी के अनुरूप हम आकर्षित करते और प्राप्त भी करते हैं। बहुत पुरानी सूक्ति है, जैसी करनी, वैसी भरनी, परन्तु यहाँ पर इस पंक्ति प्रसार कुछ ऐसे किया है, जैसी कथनी, वैसी करनी। यदि हम इसे ऐसे समझने का प्रयास करें कि जैसी कथनी, वैसी करनी, यदि की जाती है तो वैसी भरनी, बहुत ही आनंदित व मन को प्रफुल्लित करने वाली होती है।

जिस प्रकार आत्मा अमर है और शारीर का भोग करते हुए इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विचरण करती है, ठीक उसी प्रकार "शब्द और कर्म" भी अमर हैं, लौट कर पुनः हमारे पास ही आते हैं।

विचार हमारे शब्दों का निर्माण करते हैं, हमारे द्वारा कहे गए शब्द हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं, व्यक्तित्व के अनुसार हमारे कर्म होते हैं और कर्म के अनुसार हमारे भोग होते हैं। कथनी और कर्म ही हमारी वास्तविक पहचान होती है। - "चित्रांश"

जैसा कहोगे, वैसा करोगे और जैसा करोगे वैसा भरोगे - अर्थ उपरोक्त पंक्तियों में अधिकतम वर्णित कर चुके। जैसा कहा है, वैसा करो - थोड़ी सी भ्रान्ति है इसमें। इस एक सूक्ति के दो अर्थ हो सकते हैं प्रथम यह कि जैसा आपने कहा है, करने विचार किया है, अथवा करने का वचन दिया है, वैसा अवश्य करें और दूसरा यह कि जैसा हमारे बुजुर्गों ने, गुरुओं ने कहा है, जो ईश्वर वाणी है, वैसा ही करें।
    
अब हम बात करते हैं, कि कैसी हो कथनी और कैसी हो करनी ? तो बहुत आसान सा उत्तर है -

कहो ऐसा, सुन सको जैसा। करो वैसा, कहा है जैसा।      - "चित्रांश"

अर्थात आपको अपनी वाणी पर नियंत्रण रखते हुए अपने मुखारविंद से अपने कथन में उन्हीं शब्दों का प्रयोग करना है, जिन्हें आप स्वयं सुनने की क्षमता रखते हों और आपको यदि वैसे शब्द पुनः सुनने पड़ें, तो सहन कर सकें और बुरा भी न लगे। इतना मधुर बोलें कि यदि आपसे कोई वैसा ही व्यववहार करे अथवा कहे तो खुद को कड़ुवा न लगे, अर्थात सात्विक व धार्मिक वाणी, सज्जन एवं गुरुओं की वाणी, ईश्वर की वाणी का पुरजोर प्रयोग करें। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले शब्द, अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाने वाले शब्दों का ही प्रयोग एवं उचित प्रयोग करें। अपने हाथों को देने की पवित्र भावना से उठायें, न की लेने की। सहायता एवं परोपकार की भावना रखते हुए कर्म करें न कि करने के उपरांत घमण्ड की। ईश्वरीय कर्म करें। सात्विक कर्म करें। जैसा हमारे पवित्र ग्रंथों व पुस्तकों में लिखा एवं वर्णित है, गुरुओं द्वारा निर्देशित एवं आदेशित है, वैसा ही प्रेरित कर्म करने में हमारा, हमारे परिवार, हमारे समाज तथा हमारे राष्ट्र का अपितु सम्पूर्ण मानव जाति का वास्तविक कल्याण निहित है।

आध्यात्मिक, शुद्ध, पवित्र व सत्य वचन तथा सात्विक, परोपकारी एवं सत्कर्म आपको आपके मानव जीवन का वास्तविक अर्थ एवं ज्ञान से बोध कराने के साथ-साथ उसका प्रत्यक्ष दर्शन भी कराते हैं। 

उत्तम विचारों से पवित्र शब्दों का निर्माण होता है। शब्द हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। कर्म हमारे व्यक्तित्व को दर्शाता है। कर्म के अनुसार ही भोग प्राप्त होता है। भोग से ज्ञान प्रेरित होता है। ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष से ईश्वर के दर्शन होते हैं। ईश्वर प्रत्येक प्राणी के ह्रदय में निवास करते हैं। अतः प्रत्येक धर्म व सम्पूर्ण मानव जाति से प्रेम करना चाहिए और भगवान रुपी प्राणी के हितार्थ ही वचन बोलने एवं कर्म करने चाहिए।
- "चित्रांश" 


अपनी "कथनी और करनी" का चयन सोच-विचार कर स्वयं करें। 


बुधवार, 19 मार्च 2014

Base of Friendship

वैचारिक मित्रता / CONCEPTUAL FRIENDSHIP   -   "विचार मित्रता का आधार" 


मित्र, दोस्त - मित्रता, दोस्ती आदि शब्दों से और उनके तरह - तरह के अर्थों से आप भली भाँति परिचित हैं। मित्र शब्द का अर्थ और भावनात्मकता को अनेकों विद्वानों ने व आजकल के युवाओं ने कई तरह से अपनाया, समझाया व परिभाषित भी किया है। बिना किसी मित्र के हमारी जीवन शैली बस एक प्रकार की अनजानी सी साँस प्रतीत होती है। हम सांस लेते हैं, जीवन जीते हैं, सबको जानते हैं और कुछ को जानने का प्रयास करते हैं,  परन्तु मित्र (दोस्त) ही एक ऐसा माध्यम है जो आपको आपसे व आपके व्यवहार से रूबरू करवाता है और प्रत्येक कदम पर मील का पत्थर साबित होता है। आपको आपसे परिचित करवाने वाला वह दोस्त/ मित्र किसी भी संज्ञा में हो सकता है। मेरे अध्यन के अनुसार कुछ दोस्तों के प्रकार निम्नवत हैं, आशा करता हूँ कि निम्न लिखित दोस्तों के बारे में समझाने के लिए अधिक परिभाषित करना  आवश्यक नहीं है। 
  1. New Friend
  2. Old Friend
  3. Wild Friend
  4. Sweet Friend
  5. Ex-Friend
  6. Scary Friend
  7. Confidant Friend
  8. The Boss Friend
  9. Travel Friend (One Time)
  10. Travel Friend (Regular in Bus-Train-Plane etc.)
  11. Road Trip Friend
  12. Single Modifier Friend
  13. Email/ Letter Friend (Pen-Pal)
  14. Special Interest Friend
  15. Secondhand Friend 
  16. Friend's Friend
  17. Dormant Friend
  18. The Soul Mate
  19. The Classmate
  20. The Colleagues
  21. The Friend you only Drink with Friend
  22. Treatment Friend
  23. The Friends with Benefits
  24. Close Friend
  25. The Best Friend
  26. Intellectual Friend
  27. Fighting Friend (normal fight as a Game Style)
  28. Fun Friend (Game-Play-Club-Society etc.)
  29. The Mom Friend (Mother)
  30. The Dad Friend (Father)
  31. Brother Friend (Younger/ Elder/ Older)
  32. Sister Friend (Younger/ Elder/ Older)
  33. Talker Friend
  34. Listener Friend
  35. The Inspiration Friend
  36. The Scene Friend
  37. The Book Friend
  38. The Teacher Friend
  39. Storyteller Friend
  40. Swinger Friend
  41. The Husband Friend
  42. The Wife Friend   
  43. The Boy Friend
  44. The Girl Friend  
  45. The Love Friend   ...... Etc. etc. आदि इत्यादि। 
उपरोक्त वर्णित दोस्तों के अलावा भी कई तरह के दोस्त हमारे आपके जीवन में होते होंगे, परन्तु ध्यान देने के साथ साथ समझने वाली बात यह है कि मित्र चाहें किसी भी प्रकार का क्यों न हो, केवल विचारों से ही बनता और बिगडता है और मित्रता में घनिष्ठता एवं प्रगाढ़ता विचारों के तालमेल से ही आती है। अब बात आती है कि क्या होता है "विचार" और "विचारों का तालमेल" ? कैसा होता है और कैसे होता है ?

"विचार" का तात्पर्य हमारे अंदर की सोच एवं जाना-अन्जाना व्यवहार तथा अनदेखे सच का वह रूप है जो प्रत्यक्ष रूप से बाहर आता तो है परन्तु उसका दर्शन आपको केवल और केवल आपका कोई मित्र ही करा सकता है। वैसे तो यह आत्म मंथन और आत्म चिंतन के द्वारा भी जाना जा सकता है और यह कार्य करने वाले को हम अक्सर गुरू की संज्ञा में रखते हैं, परन्तु मित्र भी इस क्रिया का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कर्ता हो सकता है। 

गुरू हमारा परम मित्र हो सकता है और मित्र एक उच्चतम गुरू का स्थान ले सकता है।  - "चित्रांश" 

अब बात करते हैं "विचारों के तालमेल" की, यह तो एक ऐसे विश्वव्यापी आंतरिक सत्य की वह क्रिया है जो समय और अभ्यास के परस्पर मिलन से स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है। जिसको हम समझते हुए भी नासमझी में ही रहते हैं। प्रेम शब्द का उद्गम भी यहीं से होता है। हमारा अवचेतन मन, हमारी चेतना हमारे उस मित्र व उसके विचारों को अपने आप ही आकर्षित करती है, स्वीकार करती है। वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से, जाने-अनजाने में आपको उस व्यक्ति, वस्तु अथवा कथित दोस्त से जोड़े रखती है। आपको बार-बार उसके बारे में सोचने पर मजबूर करती है, उससे मिलने व बात करने के लिए प्रेरित करती है। वास्तव में यही है, विचारों का तालमेल या विचारों का समन्वय या विचारों की सहमति।     
ऐसी क्रियाएँ कुछ तो आंतरिक-मानसिक रूप से स्वतः होती हैं और कुछ हम जान बूझकर समायोजन की दृष्टि से भी करते हैं। जिनमें समय के साथ-साथ प्रगाढ़ता होने लगती है। दो विचारों में घनिष्ठता उत्पन्न हो जाती है। हमें शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या आत्मिक शांति के लिए उसी विचार के दोस्त की जरूरत हर समय महसूस होने लगती है, जैसे हमारे विचार होते हैं। हमारी यह भूख/ क्षुधा केवल वही दोस्त शांत कर सकता है, जिसके विचार हमारे उन विचारों से मिलते हैं अथवा जिसका चेतन मन हमारी चेतना में रिहायशी हो जाता है, उनकी आवश्यकता हमें उस समय होती है, हमें उनके पास होने, उनसे संपर्क करने के लिए तड़पाती है । किसी एक मित्र के कई विचारों का समावेश उसके एक मित्र में हो सकता है और प्रत्येक विचार के लिए एक पृथक मित्र भी हो सकता है। हम एक से अधिक मित्रों के साथ विचारों में तालमेल स्थापित कर सकते हैं, जो कि हमारी वैचारिक शक्ति और व्यवहार पर निर्भर करता है।  

हमारे विचार सजीव से निर्जीव में प्रवेश कर सकते हैं और विचारों की अनदेखी तरंगों से कोई भी हमारा मित्र बन सकता है। एक जीवित इंसान का परम मित्र एक जानवर ही नहीं वरन एक पौधा भी हो सकता है, शायद इसीलिए पेड़-पौधों को एक स्थान पर स्थिर होने के बावजूद भी सजीव की श्रेणी में रखा गया है। हमारी पुस्तक अथवा कोई प्रिय स्थान भी मित्र की श्रेणी में आ सकता है, क्योंकि विचार शक्ति सभी जगह व्याप्त है। जैसा हम सोचते है, विचार रखते व व्यवहार करते हैं. वैसे ही मित्रों/ दोस्तों व वस्तुओं को आकर्षित भी करते हैं।

एक समय वह आता है जब बिना कुछ कहे, हम सब समझ जाते हैं और सब कुछ कह देने अथवा सुनने के बाद भी हमें कुछ बुरा नहीं लगता। इसमें अधिकता होने के उपरांत तो हम भाव बोध के उस स्तर तक पहुँच जाते हैं, जिसमे केवल सोचने मात्र से हमें अपने उस परम मित्र के सापेक्ष होने का अनुभव होता है और कभी-कभी तो हमारे और उसके विचार शारीरिक रूप से दूर होने पर भी प्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ होते हैं, हमारा समर्थन करते हैं, बल्कि हमारे पास होने का प्रमाण भी दे देते हैं यह प्रमाण किसी भी रूप में हो सकता है, जैसे - अचानक पत्र या सूचना का प्राप्त होना, Phone Call, SMS, E-mail etc. बहुत समय तक एक ही शीर्षक पर बात करना और कुछ समय के बाद एक सा व्यवहार, एक सी पसंद, एक सी सोच और अपने मित्र के लिए कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत व ताकत का स्वतः उत्पन्न हो जाना आदि, यह सब हमारी "वैचारिक मित्रता" का ही एक अंश है, जिसे हमने कई प्रकार के नाम दे दिए हैं, जो ऊपर वर्णित हैं ।   
   
पति-पत्नी, गुरू-शिष्य, पिता-पुत्री, माता-पुत्र, भाई-बहिन तथा मित्र-मित्र आदि, कोई भी रिश्ता क्यों ना हो, यहाँ तक कि प्रेम भी हमारी सोच व विचारों से ही उत्पन्न होता है और एक आलौकिक आनंद का अनुभव कराता है।  दोस्ती/मित्रता/प्रेम की आयु व घनिष्ठता दोनों के परस्पर "विचारों के तालमेल" तथा "समायोजन" पर निर्भर करती है। विचारों के आदान-प्रदान से व उसकी निरंतरता से घनिष्ठता उत्पन्न होती है, और ऐसे ही समायोजन से हमारी दोस्ती एक अंजाना सा, अनूठा आनन्द देने वाला रिश्ता कायम करती है, जिसे कभी तो हम नाम दे सकते हैं और कभी कोई नाम भी नहीं दे पते। विचारों से ही मित्रता की उम्र लम्बी होने के साथ-साथ अमरत्व को प्राप्त करती है। दोस्त, दोस्त होता है, उसका तो कोई लिंग ही नहीं होता उसे तो उभय लिंग में रखा जाता है यानि Common Gender. प्रत्येक प्रकार की मित्रता, एक प्रकार की "वैचारिक मित्रता" ही है, तथा हमारे विचारों से ही उसे संज्ञा/ नाम प्राप्त होता है। वरना निर्जीव-सजीव, स्त्री-पुरुष, युवा-बुजुर्ग सभी से परे है यह मित्रता।

- श्री राधा रानी व भगवान श्री कृष्ण में कोई रिश्ता न होते हुए भी एक घनिष्ठता, आत्मिक प्रेम व वैचारिक मित्रता का ही बोध होता है। जिसका वर्णन करने की ताकत और हिम्मत मेरी कलम में नहीं है।

- जब सुदामा जी ने श्री कृष्ण से कहा मित्रता का असली "मतलब" क्या है..... श्री कृष्ण ने हँस कर उत्तर दिया "जहाँ मतलब होता है वहाँ मित्रता कहाँ होती है?"  

किसी भी धर्म अथवा जाति का आस्तिक व्यक्ति अपने ईष्ट को बिना देखे, बिना मिले केवल विचारों से, उसकी उपस्थिति को महसूस करके उसे अपना परम व उत्तम मित्र बनाता व पूरी निष्ठा से मानता भी है। यही है CONCEPTUAL FRIENDSHIP का Concept, Base and Meaning.

विचार मित्रता का आधार हैं, और मित्र उन्नति का द्वार हैं।             - "चित्रांश"

अच्छे, सुन्दर, शुद्ध, मधुर, सात्विक, परोपकारी और उत्तम विचार वालों को वैसे ही मित्र और उनकी मित्रता का आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। अतः उत्तम विचारों वाले मित्रों से ही मित्रता निभाएँ, और यदि आप के विचारों में विकार उत्पन्न हो रहा हो, तो अपने प्रत्येक मित्र की सलाह एवं विचारों का सम्मान करें। 

जिसके  साथ आप रहते हैं, उसके जैसे हो जाते हैं।

The Friends don't let you do stupid things, always careful for their friends in Good as well as Bad acts also.

सब विचारों का खेल है, मित्रों ।.… ….


गुरुवार, 6 मार्च 2014

AADHYATM - SPIRITUAL

आध्यात्म / Spiritual

हम सभी ने बहुत कुछ सुना व पढ़ा होगा, "आध्यात्म" के बारे में। क्या है आध्यात्म ? किसे कहते हैं आध्यात्म ? 

मैंने "आध्यात्म" रुपी चट्टान को समझने के लिए अपनी कलम रुपी कुदाल से रास्ता बनाने का कुछ प्रयास किया है। हम दूसरों का स्वभाव तथा हाव-भाव जानने को क्या कुछ नहीं करते। हर तरफ पुस्तकों में, समाचार पत्रों में तरह-तरह के लेख भी उपलब्ध हैं, जिनमे आप दूसरों को उनकी लिखावट से, उनके चलने के तरीके से, उठने बैठने के तरीके से यहाँ तक कि शरीर की बनावट को देखकर भी आप उनके स्वभाव से, व्यवहार से परिचित हो सकते हैं, परन्तु स्वयं से परिचय कैसे हो ? स्वयं को कैसे जाने ? यदि स्वयं को जानने की जिज्ञासा शांत करनी हो तो आइये आध्यात्म की शरण में। आध्यात्मिक दुनिया के रंगीन सितारों की अनोखी चमक को आप अपनी आँखों से देख तो कम ही सकेंगे, परन्तु महसूस उससे अधिक कर सकते हैं। 

आध्यात्म कोई पूजा पाठ, मान्यता अथवा किसी धर्म विशेष की कोई क्रिया नहीं है, अपितु आध्यात्म का अपना ही एक अदभुत एवं रंग से रहित एक रंगीन संसार है, जिसका शाब्दिक अर्थ "स्वयं को जानना" या Self Study है। हमारे प्राण, हमारी आत्मा का भाव, हमारे विचार, हमारी भावना आदि इत्यादि सब कुछ आध्यात्मिक ही तो है और इन सब को जानने व समझने के लिए हमें आध्यात्म की शरण में आना होता है। हम जैसे विचार या भावना रखते हैं वैसा ही व्यवहार भी करते हैं। आखिर क्या हैं हम ? क्यों हैं हम ? हम ही क्यों हैं ? कालान्तर से अनगिनत विद्वान, साधू-सन्त तथा धर्म गुरु आदि अपने-अपने तरीके से आपको हमको, अपने अनुयाइयों/ शिष्यों को आध्यात्म का पाठ पढ़ाते आये हैं। उनके भावात्मक व शाब्दिक आशीर्वाद की पवित्र वृष्टि से हम लोगों का मन आच्छादित होता रहता है। एक प्रकार की अनोखी शक्ति महसूस होती है उनकी सभाओं में। परन्तु प्रश्न यह है कि उनकी शाब्दिक कहानिओं को हम कितना समझते हैं और कितना स्वीकार करपाते हैं। जी हाँ जब तक कुछ समझ में न आये तब तक हर एक शब्द केवल शब्द और उनका समूह एक कहानी ही नजर आते हैं, और यदि एक बार समझ में आने लगे तो भूख, प्यास, नींद सब कुछ द्वितीय तथा आध्यात्म प्रथम हो जाता है, और यहीं से आरम्भ होती है आत्म ज्ञान की सुन्दर व अदभुत यात्रा ।   

बचपन में सुना था, आध्यात्म आदि तो बुढ़ापे का कार्य है, जब सारे कार्यों से निवृत्त हो जाओ तब आध्यात्म की ओर चले जाना, जबकि ऐसा नहीं है। जब हमें "आत्म ज्ञान" - "आत्मा का ज्ञान" - "स्वयं की पहचान" ही नहीं होगी तो उम्र भर हम कार्य क्या करेंगे और किस कार्य से निवृत्त होंगे ? आत्म ज्ञान प्राप्त करने की कोई उम्र नहीं है, कोई सीमा नहीं है, कोई निश्चित मार्ग नहीं है, परन्तु मंजिल अवश्य है। बल्कि यहाँ यह कहना उचित होगा कि आध्यात्म जितना अधिक महसूस किया जाता है, हमारा मन उतना ही अधिक आनन्दित होने लगता है। किसी भी धर्म अथवा वर्ण का व्यक्ति किसी भी मार्ग को प्रशस्त करके आध्यात्म की मंजिल की ओर अपने कदम रख सकता है। यदि हम वास्तव में स्वयं को जानना चाहते हैं तो "आध्यात्म" ही एक मार्ग है, और ध्यान एक माध्यम। 

हम यदि आत्म ज्ञान पाने के लिए वृद्धावस्था तक प्रतीक्षा करेंगे, तो उस ज्ञान का आनन्द कब उठाएंगे ? मेरे कहने का श्वेत तात्पर्य यह है कि आज से बल्कि अभी से ध्यान मार्ग को अपनाओ और अपने आप को आध्यात्म की ओर स्वयं आकर्षित होने दो। 


"ध्यान से आत्म ज्ञान का बोध होता है और आत्म ज्ञान ही वास्तविक आध्यात्म है।"      - चित्रांश