बुधवार, 16 अप्रैल 2014

The Life after Death

मृत्यु के बाद जीवन -

यह कोई स्वर्ग-नर्क अथवा पुनर्जन्म की कहानी नहीं है, अपितु मानव जीवन व उसके कर्मों का कटु सत्य है। जीवन तथा मृत्यु, ब्रह्मांड का ऐसा सत्य है जिसके बारे में सब कुछ जानकर भी अनजान हैं। इसमें लिप्त होने की जिज्ञासा कभी समाप्त नहीं होती। अज्ञात तल के समुद्र में गोते लगाने के समान ही है "जीवन-मृत्यु विज्ञान"। असंख्य ऋषि मुनियों व वैज्ञानकों ने जीवन तथा मृत्यु पर अपना शोध प्रस्तुत किया और बहुत कुछ समझाने का प्रयास भी किया, परन्तु यह तो ऐसा सत्य है जिसे केवल महसूस करके ही समझा जा सकता है ना कि किसी के समझाने से। जिस प्रकार नदी के शीतल जल में स्नान करने का आनन्द उसमें डुबकी लगाने से ही मिल सकता है, नाकि नदी के किनारे बैठ कर उस जल को देखने से। आसन, योग, ध्यान आदि क्रियाएँ हमको, हमसे मिलवाने में सहायक होती हैं, परन्तु इन्हें स्वीकारना पड़ता है, इनका स्वयं प्रयोग करके ही अनुभव किया सकता है, पढ़ कर अथवा सुन कर नहीं। 

जीवन का आनन्द सत्य एवं आलौकिक है। मृत्यु का आनन्द अटल-सत्य है और एक प्रकार का भ्रम भी। शरीर नाशवान है तथा परमात्मा व जीवात्मा के निवास का प्रत्यक्ष स्थान है। आत्मा, परमात्मा का एक अंश मात्र है जो शरीर को "जीव" बनाती है। भाग्य तथा कर्म के काल चक्र के अनुसार शरीर का विघटन तथा जीव को छोड़कर आत्मा का परमात्मा में मिलन ही उस जीव को मृत्यु का अहसास कराता है। यह मात्र ऐसा ही है जैसे समय आने पर पुराने वस्त्रों को त्याग देना। जीव मरता है, परन्तु आत्मा अमर है। इसीलिए मृत्यु भ्रम है तथा जीवन सत्य है। जीवित प्राणी में ईश्वरीय परमशक्ति का वास है। मृत्यु के उपरांत आत्मा का परमात्मा में विलीन होना तथा शरीर का उन्ही पांच तत्वों (पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि, वायु) में पुनः समा जाना, जिनसे उनका उद्गम हुआ था, प्रकृति का यह चक्र निरंतर अपने ही निश्चित समयानुसार चलता है। यह ना तो किसी'को ठीक-ठीक पता होता है और ना ही कोई पता कर सकता है। भ्रम, माया, मिथ्या आदि जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भटकाने के लिए प्रस्तुत रहते हैं, मृत्यु से दूर भगाते हैं, जबकि मृत्यु अटल है।  

सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर ही सत्य है, यही वास्तविक सत्य सर्वस्व है।  -  "चित्रांश"

मरने के बाद जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, यही मोक्ष है। जो हम देख रहे हैं वह झूठ है, माया है, जो हमें नहीं दिखता, वही सत्य है। ईश्वर सत्य है, परन्तु दिखाई नहीं देता। आत्मा है, अमर है और सत्य है, परन्तु दिखती नहीं। शरीर मिथ्या है, झूठ है, नश्वर है, परन्तु प्रत्यक्ष है। इसका मोह, जीवन के सत्य-चित्त-आनन्द का अनुभव करने के स्थान पर जीवन भर उस मृत्यु से दूर भागता है, जिसकी गोद में एक दिन अवश्य जाना है। यह मेरा है, वह मेरा है, जो आज तेरा है, वह कल मेरा था, कल फिर मेरा ही होगा। रटते-करते एक दिन सब कुछ छोड़ कर चले जाना है, फिर भी जीवन का वास्तिविक आनन्द इधर-उधर, इसमें-उसमे ढूंढते हैं। जबकि जीवन अपने आप में एक आनन्द है और मृत्यु परम आनन्द है, क्योंकि जीवन प्राप्त होने पर आत्मा परमात्मा से पृथक होकर जीवात्मा का रूप ले लेती है, जबकि मृत्यु ही आत्मा को पुनः परमात्मा से मिलाती है। "असत्य" दिखता है, जबकि "सत्य" केवल महसूस किया जाता है। 

जीवन पर्यन्त कुछ न कुछ करते रहते हैं, परन्तु कुछ ऐसा करने की कभी नहीं सोचते कि मृत्यु के बाद भी जीवन का परम आनन्द मिल सकता है। जी हाँ मरणोपरान्त "परमवीर चक्र" अथवा कोई अन्य पुरुस्कार आपको मृत्यु के पश्चात भी प्रत्यक्ष आनन्द की अनुभूति कराता है। आपका नाम आपके काम के कारण अमर हो जाता है। अब प्रश्न उठता है कि इस आनन्द की अनुभूति हमें कैसे होगी, हमारी तो मृत्यु हो चुकी है? तो यह ऊपर लिखा जा चुका है कि मृत्यु मिथ्या है, भ्रम है। यदि मृत्यु के डर को जीवन में बसा लिया तो, यह अमूल जीवन, मृत्यु से पहले ही नष्ट हो जायेगा। जीवन तो जीने के लिए है, कर्म एवं भक्ति करने के लिए है। यह आप पर व आपकी सोच पर निर्भर करता है कि आप किस प्रकार के कर्म व कर्मों की श्रंखला में प्रवेश करते हैं। यदि आपने सत्कर्म किये हैं, मानव तथा समाज कल्याण में निःस्वार्थ योगदान किया है, ईश्वर की असंख्य भक्ति की है, सत्य में विश्वास है, तो आपकी मृत्यु भी आपको जीवन की एक अनोखी अनुभूति करा सकती है और यदि आपके कर्म इसके विरूद्ध हैं तथा झूठ में अटूट विश्वास है, तो जीवन पर्यन्त आप मृत्यु का अनुभव करते रहते हैं। पिछले कर्म ही आपको अगला जीवन प्रदान कराते हैं। 
   
जीवन का परम आनन्द सत्कर्म में है और वो तो मृत्यु के बाद भी रहता है।
जैसे :- स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस आदि।      

बहुत पुरानी पंक्ति है -  अंत बुरा तो सब बुरा। अंत भला तो सब भला।।

नोट - यहाँ पर मेरे कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि जीवनपर्यन्त मानव व समाज कल्याण के लिए सत्कर्म करो और आज से करो, अभी से करो, ताकि आपके बाद आपके काम को आपके नाम से जाना जाये, और आपकी मृत्यु हो जाने पर भी आपका नाम हमेशा के लिए अमर हो जाये। 



Wish you a Happy Life after Death !!



शनिवार, 12 अप्रैल 2014

Everybody waits for Anyone

Everybody waits for Anyone. 

हर कोई, किसी एक के लिए इंतजार करता है। 

सुन कर कुछ अजीब सा लगता है, कि  "हर कोई, किसी एक के लिए इंतज़ार करता है।" 
जी हाँ, यह उतना ही सत्य एवं अनुभव किया हुआ वाक्या है, जितना कि आप स्वयं महसूस कर सकते हैं। 

1. घर पर परिवार के सदस्यों का किसी एक सदस्य के लिए भोजन पर इंतज़ार। 
2. School-Office जाने के लिए अपने-अपने मित्रों व साथियों का इंतज़ार। 
3. Self-Study के लिए अपने महत्वपूर्ण सहपाठी का इंतज़ार। 
5. किसी Party में जाने के लिए मित्रों का इंतज़ार। 
6. Railway Plate-Form पर Train के आने, रूकने व दोबारा चलने का इंतज़ार। 
7. Railway Crossing पर Train के गुजर जाने का इंतज़ार। 
8. परीक्षा परिणाम के घोषित होने का इंतज़ार। 
9. चालू सरकार गिरने व नई सरकार बनने का इंतज़ार। 
10.  प्रत्येक Monday को Nest Sunday का इंतज़ार।  .... आदि 

उपरोक्त के अलावा भी प्रत्येक व्यक्ति किसी ना किसी प्रकार के इंतज़ार में लिप्त रहता ही है, परन्तु मैं यहाँ एक ऐसी प्रतीक्षा (इंतज़ार) के बारे में ज़िक्र करना चाह रहा हूँ, जो आप सुन कर समझ तो लेंगे, परन्तु उसका वास्तविक आनन्द तो महसूस करने से ही मिलेगा। 

एक निर्जीव वस्तु भी सजीव के सम्पर्क में आने से सजीव हो उठती है। - "चित्रांश"

एक मकान, घर तभी बनता है, जब उसमें इंसान का वास होता है। चाहर दीवारों से घिरी, गुम्बज़ के नीचे स्थापित की गई एक मूर्ति का स्थान, मन्दिर के रूप में तभी जाना-पहचाना जाता है जब वहाँ सजीवों का आवागमन होता है अथवा महसूस किया जाता है। हम अपने विचारों व मन की शक्ति एवं आत्मविश्वास से ही निर्जीव को सजीव बना देते हैं तथा सजीव को निर्जीव की तरह रहने पर मजबूर कर देते हैं। 

यदि मैं कहूँ कि निर्जीव में भी प्राण होते हैं, तो यह कोई नहीं स्वीकारेगा। परन्तु यदि आप महसूस करेंगे तो पाएंगे कि मैंने प्रमणित सत्य ही लिखा है। बच्चों के लिय उनके खिलौनों में, पुस्तक प्रेमियों के लिए पुस्तकों में, एक लेखक के लिए उसकी कलम में, योद्धा के लिए उसके हथियारों में, शिल्पकारों के लिए उनके औज़ारों में, माली को अपने बगीचे के प्रत्येक पौधे एवं पुष्प से, चरवाहे को अपने मवेशियों में और प्रकृति प्रेमियों के लिए तो प्रकृति की हर वस्तु व स्थान में, निर्जीव हो या सजीव, प्राण होते हैं। यह सभी अपने-अपने तरीके से अपनी अमुक वस्तुओं अथवा साथियों से वाकायदा वार्तालाप करने के साथ अपने सुख-दुःख का प्रत्यक्ष साथी भी मानते हैं। 

हमने कई लेखों में पढ़ा है कि जहाँ पर हम अक्सर जाया करते हैं, वहाँ की आवोहवा भी हमारा इंतज़ार करती है और हमारे वहाँ पहुँचने पर उस स्थान का वातावरण, दो अंजान प्रेमियों के आत्मिक मिलन के अनुूठे सुख की अनुभूति करते हुए और-अधिक सुहावना व खुशनुमा हो जाता है। इंसान का समुद्र के मगरमच्छ से दोस्ताना,  नदी की मछलियों से मित्रता, जंगली जानवरों से अपने पन का अहसास, पेड़-पौधों से बातचीत का अनुभव आदि किस्से उतने ही सत्य हैं, जितना कि ईश्वर की उपस्थिति। मानो तो सब है, न मानो तो कुछ भी नहीं। जिस प्रकार हम उपरोक्त को अपनाते हुए जीवन यापन करते हैं, ठीक उसी प्रकार वे सब भी हमें अप्रत्यक्ष रूप से अपना बना लेते हैं और ठीक उसी पल का इंतज़ार करते हैं, जब उनका अंजाना एवं अपना आएगा और उनसे अपनी ही किसी भाषा में बतियायेगा। अपने और मेरे सुख-दुःख बांटेगा।

मन्दिर की मूर्ति भी अपने विश्वास-भक्त के आगमन तथा उसके प्रिय हाथों से प्रसाद ग्रहण करने के लिए इंतज़ार करती है। इसीलिए कहा जाता है कि जिस मन्दिर में या जिस मूर्ति पर आप विश्वास रखते हैं, एक निश्चित स्थान, दिन व समय पर प्रसाद चढ़ाते व भोग लगाते हैं, उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि वह स्थान, वह मूर्ति आपकी अमुक समय पर प्रतीक्षा कर रही होती है, और यदि किसी कारण वश, आप वहाँ नहीं पहुँच पाते हैं, तो मन ही मन उसे याद करके, वहाँ पर अपनी उपस्थिति को दर्ज कराते हुए महसूस करें। चेतना में धारण करें। विश्वास करें कि आप, उस पल वहाँ उपस्थित हैं, क्योंकि वो पल भी आपके वहाँ होने का इंतज़ार कर रहा होता है।

जिस प्रकार इन्सान को अपने मित्रों का इंतज़ार रहता है, उसी प्रकार जानवरों व पक्षियों को भी अपने साथियों का इंतज़ार रहता है तथा जिस प्रकार एक दास को अपने स्वामी तथा ईश्वर भक्त को अपने ईष्ट के दर्शन का इंतज़ार रहता है ठीक उसी प्रकार मन्दिर के ईश्वर भी अपने भक्त के आने की प्रतीक्षा करते हैं। 

इंतज़ार को मिलन में बदल देने से दोनों को ही एक आलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है। - "चित्रांश" 

अधिक न लिखते हुए अंत में केवल यही कहूँगा, कि जन्म को मृत्यु का तथा मृत्यु को पुनः जन्म का इंतज़ार होता है, परन्तु यह कभी मिल नहीं पाते।

किसी को कभी इंतज़ार न करवाएं, निश्चित स्थान, दिन व समय पर अवश्य उपस्थित हों, क्योंकि निर्जीव हो या सजीव "हर कोई, किसी एक के लिए इंतज़ार करता है।"


शनिवार, 22 मार्च 2014

Words & Deed

कथनी और करनी / वचन एवं कर्म 

उपरोक्त शब्दों के समूह और उनके अर्थ से हम भलीभाँति परिचित हैं, परन्तु वास्तविक, शाब्दिक और भावनात्मक अर्थ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, उसका आध्यात्मिक अर्थ और उसका गूढ़ रहस्य । 

कथनी, वचन, कथन, मुँह से निकले शब्द, विचारों का शाब्दिक चित्रण, शब्दों का व्यवहारिक और वैचारिक रूप आदि हमारे द्वारा कहे गए वाक्यों का वह समूह है जो पंक्ति एवं अनुच्छेद बनकर हमारे आंतरिक विचारों पर निर्भर हमारे आचरण, व्यवहार और व्यक्तित्व को सकरात्मक या नकारात्मक दर्शन देता है।

करनी, कर्म, हाथों द्वारा किया गया परिश्रम, मानसिक व शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन, कार्मिक पहचान आदि हमारे द्वारा किये अथवा करवाये गए कर्मों का वह प्रत्यक्ष रूप एवं दर्शन है, जो आधार कर्म बनकर हमारे उत्तम भाग्य एवं उज्जवल भविष्य के निर्माण का कारक बनता है और हमें समाज में सकारात्मक या नकारात्मक पहचान दिलाता है।

साधारण भाषा में कहा जाये तो "जैसा हम कहते हैं और जैसा हम करते हैं, उसी के अनुरूप हम आकर्षित करते और प्राप्त भी करते हैं। बहुत पुरानी सूक्ति है, जैसी करनी, वैसी भरनी, परन्तु यहाँ पर इस पंक्ति प्रसार कुछ ऐसे किया है, जैसी कथनी, वैसी करनी। यदि हम इसे ऐसे समझने का प्रयास करें कि जैसी कथनी, वैसी करनी, यदि की जाती है तो वैसी भरनी, बहुत ही आनंदित व मन को प्रफुल्लित करने वाली होती है।

जिस प्रकार आत्मा अमर है और शारीर का भोग करते हुए इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विचरण करती है, ठीक उसी प्रकार "शब्द और कर्म" भी अमर हैं, लौट कर पुनः हमारे पास ही आते हैं।

विचार हमारे शब्दों का निर्माण करते हैं, हमारे द्वारा कहे गए शब्द हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं, व्यक्तित्व के अनुसार हमारे कर्म होते हैं और कर्म के अनुसार हमारे भोग होते हैं। कथनी और कर्म ही हमारी वास्तविक पहचान होती है। - "चित्रांश"

जैसा कहोगे, वैसा करोगे और जैसा करोगे वैसा भरोगे - अर्थ उपरोक्त पंक्तियों में अधिकतम वर्णित कर चुके। जैसा कहा है, वैसा करो - थोड़ी सी भ्रान्ति है इसमें। इस एक सूक्ति के दो अर्थ हो सकते हैं प्रथम यह कि जैसा आपने कहा है, करने विचार किया है, अथवा करने का वचन दिया है, वैसा अवश्य करें और दूसरा यह कि जैसा हमारे बुजुर्गों ने, गुरुओं ने कहा है, जो ईश्वर वाणी है, वैसा ही करें।
    
अब हम बात करते हैं, कि कैसी हो कथनी और कैसी हो करनी ? तो बहुत आसान सा उत्तर है -

कहो ऐसा, सुन सको जैसा। करो वैसा, कहा है जैसा।      - "चित्रांश"

अर्थात आपको अपनी वाणी पर नियंत्रण रखते हुए अपने मुखारविंद से अपने कथन में उन्हीं शब्दों का प्रयोग करना है, जिन्हें आप स्वयं सुनने की क्षमता रखते हों और आपको यदि वैसे शब्द पुनः सुनने पड़ें, तो सहन कर सकें और बुरा भी न लगे। इतना मधुर बोलें कि यदि आपसे कोई वैसा ही व्यववहार करे अथवा कहे तो खुद को कड़ुवा न लगे, अर्थात सात्विक व धार्मिक वाणी, सज्जन एवं गुरुओं की वाणी, ईश्वर की वाणी का पुरजोर प्रयोग करें। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले शब्द, अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाने वाले शब्दों का ही प्रयोग एवं उचित प्रयोग करें। अपने हाथों को देने की पवित्र भावना से उठायें, न की लेने की। सहायता एवं परोपकार की भावना रखते हुए कर्म करें न कि करने के उपरांत घमण्ड की। ईश्वरीय कर्म करें। सात्विक कर्म करें। जैसा हमारे पवित्र ग्रंथों व पुस्तकों में लिखा एवं वर्णित है, गुरुओं द्वारा निर्देशित एवं आदेशित है, वैसा ही प्रेरित कर्म करने में हमारा, हमारे परिवार, हमारे समाज तथा हमारे राष्ट्र का अपितु सम्पूर्ण मानव जाति का वास्तविक कल्याण निहित है।

आध्यात्मिक, शुद्ध, पवित्र व सत्य वचन तथा सात्विक, परोपकारी एवं सत्कर्म आपको आपके मानव जीवन का वास्तविक अर्थ एवं ज्ञान से बोध कराने के साथ-साथ उसका प्रत्यक्ष दर्शन भी कराते हैं। 

उत्तम विचारों से पवित्र शब्दों का निर्माण होता है। शब्द हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। कर्म हमारे व्यक्तित्व को दर्शाता है। कर्म के अनुसार ही भोग प्राप्त होता है। भोग से ज्ञान प्रेरित होता है। ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष से ईश्वर के दर्शन होते हैं। ईश्वर प्रत्येक प्राणी के ह्रदय में निवास करते हैं। अतः प्रत्येक धर्म व सम्पूर्ण मानव जाति से प्रेम करना चाहिए और भगवान रुपी प्राणी के हितार्थ ही वचन बोलने एवं कर्म करने चाहिए।
- "चित्रांश" 


अपनी "कथनी और करनी" का चयन सोच-विचार कर स्वयं करें। 


बुधवार, 19 मार्च 2014

Base of Friendship

वैचारिक मित्रता / CONCEPTUAL FRIENDSHIP   -   "विचार मित्रता का आधार" 


मित्र, दोस्त - मित्रता, दोस्ती आदि शब्दों से और उनके तरह - तरह के अर्थों से आप भली भाँति परिचित हैं। मित्र शब्द का अर्थ और भावनात्मकता को अनेकों विद्वानों ने व आजकल के युवाओं ने कई तरह से अपनाया, समझाया व परिभाषित भी किया है। बिना किसी मित्र के हमारी जीवन शैली बस एक प्रकार की अनजानी सी साँस प्रतीत होती है। हम सांस लेते हैं, जीवन जीते हैं, सबको जानते हैं और कुछ को जानने का प्रयास करते हैं,  परन्तु मित्र (दोस्त) ही एक ऐसा माध्यम है जो आपको आपसे व आपके व्यवहार से रूबरू करवाता है और प्रत्येक कदम पर मील का पत्थर साबित होता है। आपको आपसे परिचित करवाने वाला वह दोस्त/ मित्र किसी भी संज्ञा में हो सकता है। मेरे अध्यन के अनुसार कुछ दोस्तों के प्रकार निम्नवत हैं, आशा करता हूँ कि निम्न लिखित दोस्तों के बारे में समझाने के लिए अधिक परिभाषित करना  आवश्यक नहीं है। 
  1. New Friend
  2. Old Friend
  3. Wild Friend
  4. Sweet Friend
  5. Ex-Friend
  6. Scary Friend
  7. Confidant Friend
  8. The Boss Friend
  9. Travel Friend (One Time)
  10. Travel Friend (Regular in Bus-Train-Plane etc.)
  11. Road Trip Friend
  12. Single Modifier Friend
  13. Email/ Letter Friend (Pen-Pal)
  14. Special Interest Friend
  15. Secondhand Friend 
  16. Friend's Friend
  17. Dormant Friend
  18. The Soul Mate
  19. The Classmate
  20. The Colleagues
  21. The Friend you only Drink with Friend
  22. Treatment Friend
  23. The Friends with Benefits
  24. Close Friend
  25. The Best Friend
  26. Intellectual Friend
  27. Fighting Friend (normal fight as a Game Style)
  28. Fun Friend (Game-Play-Club-Society etc.)
  29. The Mom Friend (Mother)
  30. The Dad Friend (Father)
  31. Brother Friend (Younger/ Elder/ Older)
  32. Sister Friend (Younger/ Elder/ Older)
  33. Talker Friend
  34. Listener Friend
  35. The Inspiration Friend
  36. The Scene Friend
  37. The Book Friend
  38. The Teacher Friend
  39. Storyteller Friend
  40. Swinger Friend
  41. The Husband Friend
  42. The Wife Friend   
  43. The Boy Friend
  44. The Girl Friend  
  45. The Love Friend   ...... Etc. etc. आदि इत्यादि। 
उपरोक्त वर्णित दोस्तों के अलावा भी कई तरह के दोस्त हमारे आपके जीवन में होते होंगे, परन्तु ध्यान देने के साथ साथ समझने वाली बात यह है कि मित्र चाहें किसी भी प्रकार का क्यों न हो, केवल विचारों से ही बनता और बिगडता है और मित्रता में घनिष्ठता एवं प्रगाढ़ता विचारों के तालमेल से ही आती है। अब बात आती है कि क्या होता है "विचार" और "विचारों का तालमेल" ? कैसा होता है और कैसे होता है ?

"विचार" का तात्पर्य हमारे अंदर की सोच एवं जाना-अन्जाना व्यवहार तथा अनदेखे सच का वह रूप है जो प्रत्यक्ष रूप से बाहर आता तो है परन्तु उसका दर्शन आपको केवल और केवल आपका कोई मित्र ही करा सकता है। वैसे तो यह आत्म मंथन और आत्म चिंतन के द्वारा भी जाना जा सकता है और यह कार्य करने वाले को हम अक्सर गुरू की संज्ञा में रखते हैं, परन्तु मित्र भी इस क्रिया का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कर्ता हो सकता है। 

गुरू हमारा परम मित्र हो सकता है और मित्र एक उच्चतम गुरू का स्थान ले सकता है।  - "चित्रांश" 

अब बात करते हैं "विचारों के तालमेल" की, यह तो एक ऐसे विश्वव्यापी आंतरिक सत्य की वह क्रिया है जो समय और अभ्यास के परस्पर मिलन से स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है। जिसको हम समझते हुए भी नासमझी में ही रहते हैं। प्रेम शब्द का उद्गम भी यहीं से होता है। हमारा अवचेतन मन, हमारी चेतना हमारे उस मित्र व उसके विचारों को अपने आप ही आकर्षित करती है, स्वीकार करती है। वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से, जाने-अनजाने में आपको उस व्यक्ति, वस्तु अथवा कथित दोस्त से जोड़े रखती है। आपको बार-बार उसके बारे में सोचने पर मजबूर करती है, उससे मिलने व बात करने के लिए प्रेरित करती है। वास्तव में यही है, विचारों का तालमेल या विचारों का समन्वय या विचारों की सहमति।     
ऐसी क्रियाएँ कुछ तो आंतरिक-मानसिक रूप से स्वतः होती हैं और कुछ हम जान बूझकर समायोजन की दृष्टि से भी करते हैं। जिनमें समय के साथ-साथ प्रगाढ़ता होने लगती है। दो विचारों में घनिष्ठता उत्पन्न हो जाती है। हमें शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या आत्मिक शांति के लिए उसी विचार के दोस्त की जरूरत हर समय महसूस होने लगती है, जैसे हमारे विचार होते हैं। हमारी यह भूख/ क्षुधा केवल वही दोस्त शांत कर सकता है, जिसके विचार हमारे उन विचारों से मिलते हैं अथवा जिसका चेतन मन हमारी चेतना में रिहायशी हो जाता है, उनकी आवश्यकता हमें उस समय होती है, हमें उनके पास होने, उनसे संपर्क करने के लिए तड़पाती है । किसी एक मित्र के कई विचारों का समावेश उसके एक मित्र में हो सकता है और प्रत्येक विचार के लिए एक पृथक मित्र भी हो सकता है। हम एक से अधिक मित्रों के साथ विचारों में तालमेल स्थापित कर सकते हैं, जो कि हमारी वैचारिक शक्ति और व्यवहार पर निर्भर करता है।  

हमारे विचार सजीव से निर्जीव में प्रवेश कर सकते हैं और विचारों की अनदेखी तरंगों से कोई भी हमारा मित्र बन सकता है। एक जीवित इंसान का परम मित्र एक जानवर ही नहीं वरन एक पौधा भी हो सकता है, शायद इसीलिए पेड़-पौधों को एक स्थान पर स्थिर होने के बावजूद भी सजीव की श्रेणी में रखा गया है। हमारी पुस्तक अथवा कोई प्रिय स्थान भी मित्र की श्रेणी में आ सकता है, क्योंकि विचार शक्ति सभी जगह व्याप्त है। जैसा हम सोचते है, विचार रखते व व्यवहार करते हैं. वैसे ही मित्रों/ दोस्तों व वस्तुओं को आकर्षित भी करते हैं।

एक समय वह आता है जब बिना कुछ कहे, हम सब समझ जाते हैं और सब कुछ कह देने अथवा सुनने के बाद भी हमें कुछ बुरा नहीं लगता। इसमें अधिकता होने के उपरांत तो हम भाव बोध के उस स्तर तक पहुँच जाते हैं, जिसमे केवल सोचने मात्र से हमें अपने उस परम मित्र के सापेक्ष होने का अनुभव होता है और कभी-कभी तो हमारे और उसके विचार शारीरिक रूप से दूर होने पर भी प्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ होते हैं, हमारा समर्थन करते हैं, बल्कि हमारे पास होने का प्रमाण भी दे देते हैं यह प्रमाण किसी भी रूप में हो सकता है, जैसे - अचानक पत्र या सूचना का प्राप्त होना, Phone Call, SMS, E-mail etc. बहुत समय तक एक ही शीर्षक पर बात करना और कुछ समय के बाद एक सा व्यवहार, एक सी पसंद, एक सी सोच और अपने मित्र के लिए कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत व ताकत का स्वतः उत्पन्न हो जाना आदि, यह सब हमारी "वैचारिक मित्रता" का ही एक अंश है, जिसे हमने कई प्रकार के नाम दे दिए हैं, जो ऊपर वर्णित हैं ।   
   
पति-पत्नी, गुरू-शिष्य, पिता-पुत्री, माता-पुत्र, भाई-बहिन तथा मित्र-मित्र आदि, कोई भी रिश्ता क्यों ना हो, यहाँ तक कि प्रेम भी हमारी सोच व विचारों से ही उत्पन्न होता है और एक आलौकिक आनंद का अनुभव कराता है।  दोस्ती/मित्रता/प्रेम की आयु व घनिष्ठता दोनों के परस्पर "विचारों के तालमेल" तथा "समायोजन" पर निर्भर करती है। विचारों के आदान-प्रदान से व उसकी निरंतरता से घनिष्ठता उत्पन्न होती है, और ऐसे ही समायोजन से हमारी दोस्ती एक अंजाना सा, अनूठा आनन्द देने वाला रिश्ता कायम करती है, जिसे कभी तो हम नाम दे सकते हैं और कभी कोई नाम भी नहीं दे पते। विचारों से ही मित्रता की उम्र लम्बी होने के साथ-साथ अमरत्व को प्राप्त करती है। दोस्त, दोस्त होता है, उसका तो कोई लिंग ही नहीं होता उसे तो उभय लिंग में रखा जाता है यानि Common Gender. प्रत्येक प्रकार की मित्रता, एक प्रकार की "वैचारिक मित्रता" ही है, तथा हमारे विचारों से ही उसे संज्ञा/ नाम प्राप्त होता है। वरना निर्जीव-सजीव, स्त्री-पुरुष, युवा-बुजुर्ग सभी से परे है यह मित्रता।

- श्री राधा रानी व भगवान श्री कृष्ण में कोई रिश्ता न होते हुए भी एक घनिष्ठता, आत्मिक प्रेम व वैचारिक मित्रता का ही बोध होता है। जिसका वर्णन करने की ताकत और हिम्मत मेरी कलम में नहीं है।

- जब सुदामा जी ने श्री कृष्ण से कहा मित्रता का असली "मतलब" क्या है..... श्री कृष्ण ने हँस कर उत्तर दिया "जहाँ मतलब होता है वहाँ मित्रता कहाँ होती है?"  

किसी भी धर्म अथवा जाति का आस्तिक व्यक्ति अपने ईष्ट को बिना देखे, बिना मिले केवल विचारों से, उसकी उपस्थिति को महसूस करके उसे अपना परम व उत्तम मित्र बनाता व पूरी निष्ठा से मानता भी है। यही है CONCEPTUAL FRIENDSHIP का Concept, Base and Meaning.

विचार मित्रता का आधार हैं, और मित्र उन्नति का द्वार हैं।             - "चित्रांश"

अच्छे, सुन्दर, शुद्ध, मधुर, सात्विक, परोपकारी और उत्तम विचार वालों को वैसे ही मित्र और उनकी मित्रता का आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। अतः उत्तम विचारों वाले मित्रों से ही मित्रता निभाएँ, और यदि आप के विचारों में विकार उत्पन्न हो रहा हो, तो अपने प्रत्येक मित्र की सलाह एवं विचारों का सम्मान करें। 

जिसके  साथ आप रहते हैं, उसके जैसे हो जाते हैं।

The Friends don't let you do stupid things, always careful for their friends in Good as well as Bad acts also.

सब विचारों का खेल है, मित्रों ।.… ….


गुरुवार, 6 मार्च 2014

AADHYATM - SPIRITUAL

आध्यात्म / Spiritual

हम सभी ने बहुत कुछ सुना व पढ़ा होगा, "आध्यात्म" के बारे में। क्या है आध्यात्म ? किसे कहते हैं आध्यात्म ? 

मैंने "आध्यात्म" रुपी चट्टान को समझने के लिए अपनी कलम रुपी कुदाल से रास्ता बनाने का कुछ प्रयास किया है। हम दूसरों का स्वभाव तथा हाव-भाव जानने को क्या कुछ नहीं करते। हर तरफ पुस्तकों में, समाचार पत्रों में तरह-तरह के लेख भी उपलब्ध हैं, जिनमे आप दूसरों को उनकी लिखावट से, उनके चलने के तरीके से, उठने बैठने के तरीके से यहाँ तक कि शरीर की बनावट को देखकर भी आप उनके स्वभाव से, व्यवहार से परिचित हो सकते हैं, परन्तु स्वयं से परिचय कैसे हो ? स्वयं को कैसे जाने ? यदि स्वयं को जानने की जिज्ञासा शांत करनी हो तो आइये आध्यात्म की शरण में। आध्यात्मिक दुनिया के रंगीन सितारों की अनोखी चमक को आप अपनी आँखों से देख तो कम ही सकेंगे, परन्तु महसूस उससे अधिक कर सकते हैं। 

आध्यात्म कोई पूजा पाठ, मान्यता अथवा किसी धर्म विशेष की कोई क्रिया नहीं है, अपितु आध्यात्म का अपना ही एक अदभुत एवं रंग से रहित एक रंगीन संसार है, जिसका शाब्दिक अर्थ "स्वयं को जानना" या Self Study है। हमारे प्राण, हमारी आत्मा का भाव, हमारे विचार, हमारी भावना आदि इत्यादि सब कुछ आध्यात्मिक ही तो है और इन सब को जानने व समझने के लिए हमें आध्यात्म की शरण में आना होता है। हम जैसे विचार या भावना रखते हैं वैसा ही व्यवहार भी करते हैं। आखिर क्या हैं हम ? क्यों हैं हम ? हम ही क्यों हैं ? कालान्तर से अनगिनत विद्वान, साधू-सन्त तथा धर्म गुरु आदि अपने-अपने तरीके से आपको हमको, अपने अनुयाइयों/ शिष्यों को आध्यात्म का पाठ पढ़ाते आये हैं। उनके भावात्मक व शाब्दिक आशीर्वाद की पवित्र वृष्टि से हम लोगों का मन आच्छादित होता रहता है। एक प्रकार की अनोखी शक्ति महसूस होती है उनकी सभाओं में। परन्तु प्रश्न यह है कि उनकी शाब्दिक कहानिओं को हम कितना समझते हैं और कितना स्वीकार करपाते हैं। जी हाँ जब तक कुछ समझ में न आये तब तक हर एक शब्द केवल शब्द और उनका समूह एक कहानी ही नजर आते हैं, और यदि एक बार समझ में आने लगे तो भूख, प्यास, नींद सब कुछ द्वितीय तथा आध्यात्म प्रथम हो जाता है, और यहीं से आरम्भ होती है आत्म ज्ञान की सुन्दर व अदभुत यात्रा ।   

बचपन में सुना था, आध्यात्म आदि तो बुढ़ापे का कार्य है, जब सारे कार्यों से निवृत्त हो जाओ तब आध्यात्म की ओर चले जाना, जबकि ऐसा नहीं है। जब हमें "आत्म ज्ञान" - "आत्मा का ज्ञान" - "स्वयं की पहचान" ही नहीं होगी तो उम्र भर हम कार्य क्या करेंगे और किस कार्य से निवृत्त होंगे ? आत्म ज्ञान प्राप्त करने की कोई उम्र नहीं है, कोई सीमा नहीं है, कोई निश्चित मार्ग नहीं है, परन्तु मंजिल अवश्य है। बल्कि यहाँ यह कहना उचित होगा कि आध्यात्म जितना अधिक महसूस किया जाता है, हमारा मन उतना ही अधिक आनन्दित होने लगता है। किसी भी धर्म अथवा वर्ण का व्यक्ति किसी भी मार्ग को प्रशस्त करके आध्यात्म की मंजिल की ओर अपने कदम रख सकता है। यदि हम वास्तव में स्वयं को जानना चाहते हैं तो "आध्यात्म" ही एक मार्ग है, और ध्यान एक माध्यम। 

हम यदि आत्म ज्ञान पाने के लिए वृद्धावस्था तक प्रतीक्षा करेंगे, तो उस ज्ञान का आनन्द कब उठाएंगे ? मेरे कहने का श्वेत तात्पर्य यह है कि आज से बल्कि अभी से ध्यान मार्ग को अपनाओ और अपने आप को आध्यात्म की ओर स्वयं आकर्षित होने दो। 


"ध्यान से आत्म ज्ञान का बोध होता है और आत्म ज्ञान ही वास्तविक आध्यात्म है।"      - चित्रांश 


शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

Positive Thoughts and Positive Thinking

सकारात्मक विचार / सकारात्मक सोच 


बहुत से ज्ञानिओं और लेखकों ने सकारात्मक सोच पर अपनी लेखनी की स्याही द्वारा सकारात्मक भावों का और सकारात्मकता का कलात्मक शब्द चित्रण किया है। मैं भी अपने इस ब्लॉग के माध्यम से कुछ ऐसा ही करने का प्रयास कर रहा हूँ। 
सकारात्मक/ धनात्मकता का चिह्न् '+' (Plus) अथवा नकारात्मक/ ऋणात्मक चिह्नों '-' ; '-' (Minus) का संयुक्त मिश्रण। तात्पर्य है कि सकारात्मकता का रास्ता नकारात्मकता के रास्ते से होकर ही गुजरता है, परन्तु यह हमारे अपने दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि दो से ज्यादा नकारात्मक विचारों को हम आने ही न दें। वैसे तो एक नकारात्मक विचार ही पूरी सकारात्मक सोच का बंटा धार करने में सक्षम है, परन्तु यदि इसका प्रयास बीज गणित के शुरुआती सबक के अनुसार चिह्नों के महत्व को समझते हुए कुछ इस तरह से किया जाये कि जिसकी बारम्बारता अधिक होगी या जिस चिह्न का मूल अंक बड़ा होगा वही उत्तर का स्वामी चिह्न कहलायेगा। 

उदाहरण के लिए :  7a - 3a = +4a  तथा  4a - 8a = -4a 

अक्सर बुराई आसान व हमारी पहुँच में होती है और अच्छाई कठिन होने के साथ साथ दूर भी होती है। उसी प्रकार नकारात्मक विचारों को आसानी से समझा जा सकता है अब प्रश्न उठता है कि "सकारात्मकता" का क्या अर्थ है उसका वास्तविक स्वामी क्या है? तो मेरे विचारों में "सकारात्मकता वह है जो आपको ख़ुशी प्रदान करे जो आपको हर पल खुश रहने का एहसास दिलाये आपको आंतरिक रूप से सकारात्मक बनाये।" 

एक प्रकार की स्थिरता, ठहराव को हम सकारात्मक सोच की श्रेणी में रख सकते हैं। अर्थात दुःख में और सुख में एक सा। ना दुःख में बहुत दुःखी और ना ही सुख में बहुत उत्साहित। जो है बस यही है। जो अब है वो कल ना 
होगा अर्थात अगर दुःख है तो कल न होगा और सुख है तो हमेशा ना रहेगा। इस पंक्ति को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक स्थिति में हर पल ख़ुशी को महसूस करना ही सकारात्मकता का अर्थ है। परन्तु इसका मतलब यह कतई  नहीं है कि हम गलत कार्य स्वयं करें और ख़ुशी को महसूस करें। यहाँ पर स्वतः उत्पन्न हुए विचार अथवा सोच को समझने का प्रयास करना है। जैसे यदि आप नए जूते पहनकर सड़क पर कहीं जा रहे हैं और मार्ग में सड़क पर पड़ी किसी कील से आपका जूता, नया जूता ख़राब हो गया, उसमे छेद हो गया। अब लो आरम्भ होती है नकारात्मक विचारों का बारिश, एक एक बूँद करके नहीं, ये तो एक साथ ही मूसलाधार बारिश की तरह हमला करते हैं, 
- अपने आप को कोसना शुरू,
- जूते वाले को कोसना शुरू,
- सड़क बनाने वाले को गलियां देना शुरू, 
- यहाँ तक कि मार्ग पर चलने वाले यात्रियों को भी नहीं छोड़ा आपने। होता है ना यही, जरा सोचिये ?

अब दूसरी ओर सकारात्मक विचार केवल एक ही काफी है, चलो अच्छा हुआ मेरे जूते में ही कील घुसी, पैर तो घायल होने से बच गया। अब अगर मैं अपने सकारात्मक विचारों की बारिश करूँ तो कुछ इस प्रकार होगी -
- केवल जूते पर ही बीती, पैर बच गया वरना डॉक्टर, पटटी, इंजेक्शन आदि, शुक्र है ईश्वर का। 
- किसी बच्चे के नहीं लगी, वरना उसका मुलायम पैर तो सहन ही नहीं कर पता, शुक्र है ईश्वर का। 
- किसी के वाहन आदि पर नहीं लगी, यदि टायर पंक्चर हो जाता, तो कहाँ तक पैदल खीचना पड़ता।
- जूता नया है, और अभी तो गारन्टी में भी है।  इत्यादि।

अब देखिये एक छोटी से घटना ने हमारे विचारों में कितनी उथल पुथल मचा दी और हमारे व्यक्तित्व को भी दर्शा दिया। सोच ही है जो हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती है। हमें ऊँचा उठाती है। 

स्वामी विवेकानंद, पं श्री राम शर्मा आचार्य, श्री श्री रवि शंकर तथा Dr. Rhonda Byrne, Dr. Joseph Merphy जैसे अनेकों युगपुरुष, गुरू एवं लेखकों ने अपनी कलम की पैनी धार से वातावरण की तरंगों का सीना चीरकर हमें सकारात्मक विचारों की अद्भुत व अनूठी शक्ति से रूबरू करवाया।  


                "ईश्वर मंगल या अमंगल जो कुछ भी करता है, वह सब मेरे मंगल के लिए ही है। ऐसा दृढ़विश्वास                 रखना ही सांख्य भक्ति तथा सकारात्मकता का मुख्य लक्षण है।"  

महा शिव पुराण (रुद्रसंहिता - १९४)


सकारात्मकता का मतलब हालात से समझौता करना बिल्कुल नहीं है बल्कि अपने विचारों से अपने लिए अनुकूल वातावरण उत्पन्न करना तथा हर पल ख़ुशी को महसूस करते हुए, खुश रहकर हर परिस्थिति में अपने ईष्ट का धन्यवाद करना है। 
   
!! अच्छा सोचो, सकारात्मक सोचो, अच्छा करो, सफल होओ !!
              

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

Kinds of Human Income

आय / धन अथवा Income

मनुष्य को अपने माता-पिता, गुरु, भ्राता, प्रजा, दीन, दुःखी, आश्रितजन, अतिथि, अभ्यागत (घर पर अकस्मात आने वाला) आदि पोष्य वर्गों का पालन/ भरण पोषण प्रयत्न पूर्वक करना चाहिए। इस संसार में उसी व्यक्ति का जीवन श्रेष्ठ है, जो बहुतों के जीवन का साधक बनता है। जो मात्र अपने भरण-पोषण में लगे रहते हैं, वे जीवित रहते हुए भी मरे के समान हैं, क्योंकि अपना पेट पालन तो पूँछ वाला कुत्ता भी कर लेता है।

व्यवहार में अर्थ का महत्व है। अर्थ को उत्पन्न करना एवं बढ़ाना अतिआवश्यक है और जो हमारे सभी कार्यों की सम्पन्नता में  अनिवार्य रूप से उपयोगी हो, उसे "अर्थ" कहते हैं। अर्थ का अत्यन्त महत्व होने पर भी इसके अर्जन में संयम आवयशक है।

धन, मुख्यतः तीन प्रकार का होता है, शुक्ल, शबल (मिश्रित), कृष्ण।

  1. दायभाग के अनुसार वंश परम्परा से यथाधिकार प्राप्त धन। 
  2. प्रेम संगत किसी के द्वारा दिया गया धन। 
  3. यथाविधि विवाहित पत्नी के साथ प्राप्त धन। 

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्णों की आय का उल्लेख निम्न प्रकार हैं। 

- ब्राह्मण की आय के तीन मुख्य साधन हैं - याजन (यज्ञ कराने से प्राप्त आय), अध्यापन से प्राप्त आय और सत्य पात्र से लिया गया दान।

- क्षत्रिय की आय भी तीन प्रकार से समझी जाती है - कर से प्राप्त धन, दण्ड द्वारा प्राप्त धन और विजय द्वारा प्राप्त धन।

- वैश्य का तीन प्रकार का धन है - खेती से प्राप्त धन, गौपालन से प्राप्त धन तथा व्यापर से प्राप्त धन। 

- शूद्र वर्ण की विशेष आय वही है जो उपरोक्त वर्णों की सेवा एवं उनके कार्यों में सहायता करके कृपा रूप से प्राप्त हो।

शास्त्रसम्मत विधि से ही धनोपार्जन करना चाहिए तथा सभी मनुष्यों को अपने लाभांश से पितृगण, देवगण तथा ब्राह्मण आदि की सेवा एवं पूजा आदि करनी चाहिए। अपने आय एवं बचत में से अन्नादि खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ, वस्त्र, शय्या, आसन तथा गौ आदि का दान, पाप नाशक व पुण्य दायक होने के साथ साथ, अप्रत्याक्ष रूप से धन वृद्धि में भी सहायक होता है।

वर्तमान में मानव के जीविकोपर्जन के सामान्यतयः दस साधन मुख्य व सर्वमान्य हैं -

  1. विद्या 
  2. शिल्प 
  3. वेतन 
  4. सेवा 
  5. गौरक्षा 
  6. व्यापार 
  7. कृषि 
  8. वृत्ति (बिना किसी कार्य के, सहायता के रूप में मिलने वाली मासिक धनराशि)
  9. भिक्षा 
  10. कुसीद (ब्याज द्वारा कमाई गई धनराशि)


प्रत्येक वर्ण के किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन यापन के लिए केवल न्यायोचित मार्ग द्वारा ही धन अर्जन करके अपना कार्य पूर्ण करना चाहिए।


- गरुड पुराण (आचार काण्ड - ३७६)




Kinds of Human Bath

स्नान/ Bath - 

आपने तरह तरह के स्नानों के बारे में सुना व पढ़ा होगा। साधारणतया तीन प्रकार के स्नान होते हैं, पहला जन्म के समय, दूसरा विवाह के समय व तीसरा मृत्यु होने पर। 
बिना स्नान किये पुरुष अथवा नारी जप, तप, पूजा, हवन आदि करने के अधिकारी नहीं होते। प्रातः काल का स्नान आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण बताया गया है। स्नान से शरीर में चुस्ती व स्फूर्ति आती है। मन तरोताजा रहता है।  मानव जीवन की दैनिक दिनचर्या में आठ प्रकार के स्नानों का वर्णन निम्नलिखित है - 

  1. नित्य 
  2. नैमित्तिक 
  3. काम्य 
  4. क्रियांग 
  5. मलापकर्षण 
  6. मार्जन 
  7. आचमन 
  8. अवगाहन 

  1. नित्य स्नान - प्रातः काल का स्नान आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। रात कि निद्रा आलस हटाने व शरीर में स्फूर्ति लाने के लिए किये गए इस स्नान  को "नित्य स्नान" कहते हैं। यह स्नान हमें प्रातः काल नियम पूर्वक रोज़ ही करना चाहिए।  इससे मन प्रसन्न रहता है व दिन की शुरुआत भी अच्छी होती है। 
  2. नैमित्तिक स्नान - शव, चाण्डाल, विष्ठा तथा रजस्वला का स्पर्श करने के बाद जो स्नान किया जाता है, उसे "नैमित्तिक स्नान" कहते हैं। 
  3. काम्य स्नान - ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पुष्य आदि नक्षत्रों में जो स्नानादिक कृत्य किया जाता है, वह "काम्य स्नान" कहलाता है। निष्काम व्यक्ति को इस प्रकार का स्नान नहीं करना चाहिए। 
  4. क्रियांग स्नान - जब मनुष्य पूजा, हवन, होमादिक कृत्यों को सम्पन्न करने की इच्छा से प्रेरित होकर अथवा कोई अन्य पवित्र कृत्य, देवता या अतिथि आदि का पूजन-सत्कार इत्यादि करने की इच्छा से सम्पूर्ण स्नान करता है, ऐसे पवित्र भावना से किये गए स्नान को "क्रियांग स्नान" की संज्ञा दी गई है। 
  5. मलापकर्षण स्नान - शारीरिक मल को दूर करके साफ़ करने के उद्देश्य से सरोवर, देवकुण्ड या तीर्थ नदियों में किया गया स्नान "मलापकर्षण स्नान" है। सामान्य जल से स्नान करने पर केवल शरीर की ऊपरी शुद्धि होती है और पवित्र-तीर्थ स्थानों के जल से शरीर का बाह्य एवं आंतरिक रोम-रोम शुद्ध हो जाता है और विशष्ट फल की प्राप्ति होती है।   
  6. मार्जन स्नान - मुख्य रूप से स्नान के निमित्त विहित मन्त्रों द्वारा मार्जन करने से मनुष्य का पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाता है। इस स्नान को ही "मार्जन स्नान" कहते हैं। 
  7. आचमन स्नान - पूजन-हवन अथवा अन्य किसी पवित्र कार्य को करने से पूर्व इंद्रियों सहित पूरे शरीर को पवित्र करने की भवना से पवित्र गंगा जल द्वारा की गई आचमनादि क्रियाओं को "आचमन स्नान" की संज्ञा दी गई है। 
  8. अवगाहन - ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विशेष तिथियों एवं गृह-नक्षत्रों में किसी विशिष्ट कार्य की पूर्ती हेतु अथवा देवता विशेष के लिए किया गया स्नान "अवगाहन स्नान" कहलाता है। दिन, तिथि व समय के अनुसार अवगाहन स्नान के अत्यंत रूप तथा नियमादि होते हैं। 
तीर्थों के जल का अभाव होने पर उष्ण जल अथवा अन्य किसी प्रकार से प्राप्त कृत्रिम जल से स्नानादि क्रियाएँ सम्पन्न कर लेनी चाहिए। यूं तो भूमि से निकला हुआ जल पवित्र होता है। पर्वतों, झरनों, नदिओं अथवा सरोवर आदि का जल भी पवित्र होता है। इन सभी जलों में तीर्थ स्थान का जल अत्यन्त शुभ व पवत्र माना जाता है और अपेक्षाकृत इनसे भी अधिक श्रेष्ठ, पापनाशक, पुण्य प्रदायक व परम पवित्र तथा निर्मल जल "गंगा जल" का स्थान सर्वोपरी है। 

- गरुड पुराण (आचार काण्ड - ३७७)




रविवार, 16 फ़रवरी 2014

Surya Gayatri Mantra & Twelve energy radix of Lord Surya

अपराजित शक्तियों का मूल स्रोत एवं ग्रहों के अधिपति भगवान् सूर्य के बारे में वर्णन करना मतलब अपनी कलम को धोखा देना है, परन्तु फिर भी अपनी तुच्छ बुद्धि व अधययन के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निम्न हैं -

हम सभी अपने अपने तरीकों से सूर्य देव की पूजा अर्चना करते हैं, जिसमें प्रातःकाल का सूर्य नमस्कार व सूर्य की किरणों पर जल अर्पित करने की आध्यात्मिक परम्परा, वैज्ञानिक तौर पर सर्वमान्य है। शक्ति एवं ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य ही प्रकृति के सभी जीवों के पालन पोषण का आधार है। हमें एकाग्रचित् होकर पवित्र मन से नियमित रूप से सूर्योपासना करनी चाहिए।

निःरोगी काया, भोग व मोक्ष प्रदायक शक्तिपुंज के अधिष्ठाता भगवन सूर्य का सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार है -

ॐ आदित्याय विद्महे, विश्वभावाय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात।   

(या) 

ॐ भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि, तन्नो सूर्यः प्रचोदयात।   


ग्रहाधिपति भगवान सूर्य का मूल मंत्र इस प्रकार है -

ॐ खखोल्काय नमः।


पौराणिक द्वादश सूर्यों का वर्णन निम्नलिखित हैं -
  1. भग 
  2. सूर्य 
  3. अर्यमा 
  4. मित्र 
  5. वरुण  
  6. सविता  
  7. धाता  
  8. विवस्वान  
  9. त्वष्टा  
  10. पूषा 
  11. इंद्र  
  12. विष्णु 
- गरूड पुराण (आचार काण्ड -२९)


ऋग्वेद की पवित्र सूर्य/ वरुण स्तुतिओं में से एक स्तुति -

             "पवित्र पराक्रम युक्त, सबको आच्छादित करने वाले राजा वरुण, दिव्य तेज पुंज सूर्यदेव को आधार 
              रहित आकाश में धारण करते हैं। इस तेज पुंज सूर्यदेव का मुख नीचे की ओर तथा मूल ऊपर की ओर 
              है।  इसके मध्य में दिव्य किरणें विस्तीर्ण होती चलती हैं।"

- ऋग्वेद संहिता-१ (सूक्त-२४/७ - २६०/२९)


The Logic of 33 GODs

३३ …………… देवी-देवता 

३३ करोड़ / 
३३ लाख / 
३३ हजार / 
३३ कोटि .... या फिर, कितने ?

इस प्रकार कई पूजनीय देवी-देवताओं के बारे में तरह-तरह की मान्यतायें लोगों में व्याप्त हैं, परन्तु इसके पीछे वास्तविक रहस्य क्या है? जब मैंने इस तथ्य के बारे में अपनी जिज्ञासा शांत करने के उद्देश्य से पवित्र एवं ज्ञानवर्धक पुस्तकों का अध्ययन किया, तो कुछ ऐसा सामने आया जो उचित व सर्वमान्य है। 

मैनें अपने पिछले ब्लॉग में "भगवान्" का अर्थ व उसका पूर्ण समावेश, प्रकृति के पाँच तत्वों से बने शरीर में होने की बात कही है, मगर यह क्या, यहाँ तो कुछ और भी सामने आ गया। 

जी हां, केवल "भगवान्" ही नहीं बल्कि उपरोक्त ३३ करोड़ देवी-देवताओं का प्रत्यक्ष वास है हमारे मानव शरीर में ! यह कोई अचम्भे की बात नहीं है, वरन् सोचने व समझने की बात है, कि आखिर कैसे ?

३३ देवताओं का वास्तविक अर्थ व तर्क प्रमाण सहित निम्नलिखित है -

१). शरीर शास्त्र तथा विज्ञान के अनुसार हमारा सम्पूर्ण शरीर पूर्ण रूप से केवल "मेंरुदण्ड" या "स्पाइनल कॉर्ड" पर टिका है जो कई अस्थिओं व घटकों से मिल कर बनी हुई सर्पाकार पोली डंडी है, जिस पर शरीर का प्रत्येक कशेरू टिका और सूत्रों से कसा हुआ है। यह अस्थि समूह कुल पाँच भागों में विभाजित है -

           १. ग्रीवा - स्पाइनल रीज़न -                   ७ अस्थियाँ   -   7
           २. वक्ष - डॉर्सल रीज़न -                       १२ अस्थियाँ   - 12
           ३. कटि - लम्बर रीज़न -                        अस्थियाँ    -  5
           ४. त्रिक - वस्तिगृह्वर - सैक्रल रीज़न -        अस्थियाँ   -  5
           ५. चेंचु - क़ॉक्सीजियल -                        अस्थियाँ    -  4
                                                                                   -------
                                                                                      33 .

हमारे शरीर की सभी नाड़ियां इसी पोले अस्थि खण्डों से होकर गुजरती हैं। यह लचीला और अपनी धुरी पर हर दिशा में घूमने में सक्षम व शरीर का प्रमुख आधार है। इन पाँच प्रकार के तैंतीस खण्डों के इसी समूह को वास्तव में ३३ देवता कहा गया है और इनमे सन्निहित क्षमता को दैवीय शक्ति की मान्यता दी गई है। 

-- वेदमूर्ति पं० श्री राम शर्मा आचार्य
शांतिकुंज, हरिद्वार


२). यज्ञ करते समय ऋग्वेद की जिन ऋचाओं का उच्चारण करके देवताओं का आह्वाहन व स्तुति की जाती  है, उनमें से मात्र एक का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है -
            
           "आप सभी ३३ देवता हमारे इस पावन यज्ञ में मधुपान के लिए पधारें। हमारी आयु बढ़ाएं और हमारे 
            पापों को भली-भांति विनष्ट करें। हमारे प्रति द्वेष की भावना को समाप्त करके, सभी कार्यों में
            सहायक बनें।"  

- ऋग्वेद संहिता -१ (सूक्त-३४/११-४०९/४८)


ऋषि-मुनि, संत-महात्मा आदि "कुण्डलिनी जागरण" की प्रक्रिया के दौरान अपनें शरीर की इन्ही दैवीय शक्तिओं को उजागर करने का प्रयास करके ब्रह्माण्ड के सभी ३३ देवी-देवताओं का ही आत्मदर्शन करते हैं। 

यह मंगलमयी मोक्ष प्रदायनी कुण्डलिनी ३३ देवी-देवताओं के रूप में हमारे शरीर में प्रत्यक्ष रूप से विराजमान है। 


शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

Meaning of Bhagwan is Five Elements of Body

प्रिय पाठकों,

सादर प्रणाम !

जैसा कि आप जानते व समझते हैं कि चौरासी लाख योनिओं में श्रेष्ठ मानव योनि है तथा धर्मों में सर्वश्रेष्ठ धर्म मानव धर्म है। हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी, जैन व बुद्ध आदि सभी धर्म मानवता को एक ही सन्देश देते हैं कि आपस में प्रेम करो तथा एक दुसरे की मदद करो।

उपरोक्त पंक्ति का वास्तविक व गूढ़ रहस्य हिंदी भाषा के "भगवान्" शब्द के शाब्दिक अर्थ से स्पष्ट  हो जाता है। सामान्यतः हम "भगवान्" को केवल हिन्दुओं के लिए प्रयोग करते हैं। अन्य संप्रदाय के लोग अपनी -अपनी भाषा में अलग -अलग नामों से पुकारते हैं। जबकि आपको जानकर अचम्भा नहीं होना चाहिए कि इन्सान भगवान् का ही रूप है, हर इन्सान में भगवान् का वास है, बल्कि हर प्राणी अपने आप में भगवान् है। बस थोड़ा सा सोच-विचार करने की जरूरत है, जैसे -
                     
                             - भूमि / धरती
                            - गगन / आकाश
                            - वायु / हवा
                             - अग्नि / प्रकाश   
                            - नीर / पानी

आप और हम भली प्रकार जानते हैं कि प्राणी की संरचना प्रकृति के पाँच तत्वों से मिलकर हुई है - धरती, आकाश, वायु, आग  पानी प्रकृति के यह पाँचों तत्व हमारे मानव शरीर में पूर्ण रूप से निहित हैं, जोकि "भगवान्" शब्द का वास्तविक अर्थ भी स्पष्ट करते हैं।

अंततः हमारे कहने तात्पर्य इतना मात्र है कि आप किसी भी धर्म अथवा रूप में ईश्वर को पाना चाहते हैं तो सर्वप्रथम इंसानियत को समझने का प्रयास करें तथा प्रत्येक मानव / इन्सान / प्राणी से प्रेम करें, क्योंकि हमारे वास्तविक पूजनीय "भगवान्" तो हर जगह हैं, हर प्राणी में हैं, बल्कि हमारे ही अंदर हैं।

हम सब एक ही परम पिता परमेश्वर की सन्तान हैं व एक समान हैं  

!! सबका मालिक एक !!



शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

Ganesha Gayatri Mantra & Twelve names of Lord Ganesha

एक बुद्धिमान मनुष्य पृथक पृथक तरीकों व नामों से विघ्नविनाशक, प्रथमपूज्यनीय भगवान् गणेश का पूजन व जप करता है। गणेश पूजन के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र निम्नवत हैं -

गणेश गायत्री मंत्र - 

ॐ महाकर्णाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्। 


गणेश पूजन करने व जप करने योग्य अन्य मंत्र -

१. ॐ गणाय नमः

२. ॐ गणपतये नमः

३. ॐ कूष्माण्डकाय नमः

४. ॐ गं गणपतये नमः

५. ॐ गः स्वाहा (प्रणव युक्त मूल मंत्र)

शिव - पार्वती पुत्र व गणो के अधिनायक प्रथमेश भगवान गणेश के बारह नाम इस प्रकार हैं - 

            गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बकः।
            नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्नराजकः।।
            धूम्रवर्णो भालचन्द्रो दशमस्तु विनायकः।
            गणपतिर्हस्तिमुखो द्वादशारे यजेड्गणम् ।।


विधि विधान व सच्चे मन से गणपति देव का स्मरण तथा उनकी पूजा करके व्रत, जप एवं हवन करने से विद्द्या एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। खाण्ड के लड्डू व मोदक का प्रसाद भगवन गणेश को अत्यंत प्रिय हैं। भगवान् को उनका प्रिय भोग भेंट स्वरुप देने से मनुष्य की सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं व सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

- गरुड पुराण (आचार काण्ड-२१९)


गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

Meaning of Gayatri Mantra

गायत्री मन्त्र

! ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नह प्रचोदयत् !

भावार्थ

उस प्राण स्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।     
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ईश्वर दण्ड नहीं देता, कर्म की प्रतिक्रिया अन्यायी को दण्ड देती है। 
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मानव मात्र को उज्जवल भविष्य प्रदान में सक्षम गायत्री महाविद्या सबके लिए सुलभ, सबके लिए साध्य, सबके लिए हितकर है। इसे समझें, अपनायें, साधें और अनुपम लाभ उठायें।      
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विविध सम्प्रदायों में गायत्री मंत्र का अर्थ - 


हिन्दू :- ईश्वर प्राण स्वरूप, दुःख नाशक, सुख स्वरूप है। हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें, जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए पवित्र प्रेरणा दे। 

इस्लाम :- हे अल्लाह! हम तेरी ही वंदना करते तथा तुझी से सहायता चाहते हैं। हमें सीधा मार्ग दिखा। उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपा पात्र बनें, न कि उनका जो तेरे कोप भाजन बने तथा पथ भ्रष्ठ हुए। 
     
सिक्ख :- ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है। वह सृष्टि कर्ता, समर्थ पुरुष, निर्भर, निर्बैर, जन्म रहित तथा स्वयं भू है। वह गुरू की कृपा से जाना जाता है।  

ईसाई :- हे पिता हमे परीक्षा में न डाल, परन्तु बुराई से बचा, क्योंकि राज्य, पराक्रम तथा महिमा सब तेरी ही है।     

जैन :- अईहतों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्याओं को नमस्कार तथा सब बन्धुओं को नमस्कार।     

बौद्ध :- मैं बुद्ध कि शरण में जाता हूँ। मैं धर्म की शरण में जाता हूँ। मैं संघ की शरण में जाता हूँ। 

पारसी :- वह परम गुरू (अहुरमज़द) परमेश्वर अपने ॠत व सत्य के भंडार के कारण राजा के समान महान है। ईश्वर के नाम पर किये गए परोपकारों से मनुष्य, प्रभु प्रेम का पात्र बनता है।  

-- वेदमूर्ति पं० श्री राम शर्मा आचार्य,
शांतिकुंज, हरिद्वार



"जो उपासक प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर नित्य गायत्री मंत्र का जप करता है, वह कमलपत्र की भाँति पाप से संलिप्त नहीं होता। "   
- गरुड पुराण (आचार काण्ड - ३७५)

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हरि।  ओइम।  तत्सद। 

माता - पिता के श्री चरणों में सादर प्रणाम
गुरू के श्री चरणों में सादर प्रणाम
ईष्ट देव को साष्टाँग प्रणाम
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- अभिषेक कुमार "चित्रांश"
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