मृत्यु ही नए जीवन का निर्माण करती है।
अब प्रश्न है कि मृत्यु क्या है और जीवन क्या है ? उत्तर है कि जीवन एक नई ऊर्जा है, स्फूर्ति से भरा एक शक्ति पुंज, जबकि मृत्यु उस ऊर्जा के माध्यम का एक बदलाव मात्र है, अर्थात जब कोई शक्ति अपने एक पुराने माध्यम को बदलकर नवीन माध्यम में पुनः वास/ प्रवेश करती है, तो एक ओर पुराने माध्यम के लिए वह मृत्यु और दूसरी ओर नवीन माध्यम के लिए वही जीवन का अनुभव कराती है।
हमारे शरीर में १०१ व्याधियाँ स्थित हैं, इनमे से एक व्याधि तो काल के साथ रहती है, शेष १०० व्याधियाँ आगन्तुक मानी गई हैं। जो आगन्तुक व्याधियाँ हैं, वो तो दवाओं-औषधियों आदि का सेवन करने तथा दान, जप, तप, होम आदि करने से शांत हो जाती हैं, परंतु 'मृत्यु' रूप व्याधि कभी शांत नहीं होती, यदि देहधारी के जीवन का काल आ पहुंचा है, तो उसे धन्वन्तरि भी जीवित नहीं रख सकते। काल से पीड़ित मनुष्य को औषधि, तपस्या, दान, होम, मित्र या बंधु-बान्धव आदि कोई भी बचा नहीं सकते। कोई भी रसायन, योग, सिद्ध महात्मा या पण्डित- ये सब मिलकर भी कालजनित मृत्यु को नहीं टाल सकते। सम्पूर्ण पृथ्वी पर समस्त प्राणियों के लिए मृत्यु के समान कोई दुःख नहीं है, मृत्यु के समान कोई भय नहीं है, मृत्यु के समान कोई त्रास भी नहीं है। हजारों मनुष्यो में से कोई पांच भी शायद ही ऐसे होंगे, जो पूरे सौ वर्षों तक जीने वाले हों, कोई अस्सी-नब्वे, तो कोई सत्तर वर्ष की अवस्था में मृत्यु को प्राप्त होते हैं। मनुष्य की वर्तमान आयु मात्र ६० वर्षों की ही रह गई है, किन्तु वह भी सभी के लिए निश्चित नहीं है। जिस देहधारी को अपने पूर्वकर्मानुसार जितनी आयु प्राप्त होती है, उसका आधा भाग तो मृत्युरूपिणी रात्रि हर लेती है, शेष अबोधावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था तथा बृद्धावस्था में लगभग २० से ४० वर्ष व्यतीत हो जाते हैं, जो धर्म, अर्थ, काम - किसी के भी उपयोग में नहीं आते। शेष आयु का आधा भाग मनुष्य पर आने वाले बहुत से भय तथा अनेक प्रकार के रोग और शोक आदि हर लेते हैं, इन सबसे जो शेष रह जाता है, वही मनुष्य का वास्तविक 'जीवन' है और इसी जीवन की समाप्ति होने पर मनुष्य अत्यंत भयंकर 'मृत्यु' को प्राप्त होता है। इस प्रकार योनि जनित जीवों को बारम्बार मृत्यु रुपी कष्ट उठा कर ही नए जीवन का सुख प्राप्त होता है। विनाश, नव-निर्माण का प्रेरक है।
मृत्यु के पश्चात् मनुष्य पुनः करोड़ों योनियो में जन्म ग्रहण करता है, कर्मों की गणना के अनुसार देह-भेद से जो जीवन का एक शरीर से वियोग होता है, उसी को 'मृत्यु' नाम दिया गया है, वास्तव में उससे जीवन का विनाश नहीं होता। जैसे तृणजलौका जल में बहते हुए तिनके के अंत तक पहुँचकर, जब दूसरा तिनका थाम लेती है, तब पहले को छोड़ देती है। उसी प्रकार जीव एक देह से दूसरी देह में क्रमशः प्रवेश करता है। भावी शरीर में अंशतः प्रवेश करके पूर्व शरीर का त्याग करता है।
- स्कन्द पुराण (कुमारिकाखण्ड-१७१-१७२)
उपरोक्त पंक्तियों में जीवन व मृत्यु के बारे में समझाने का तात्पर्य यह है कि, यदि जीवन का आनंद लेना है तो मृत्यु का भय दिल-दिमाग से पृथक करना होगा। यह जीवन मरण की शक्तियाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, जिनके अधीन है, त्रिदेव भी सृष्टि के इस नियम को नहीं टाल सकते। हमें नया, स्फूर्ति भरा जीवन प्राप्त करने हेतु संसार के तीनो संताप समूह (आध्यात्मिक, आदिदैविक, आदिभौतिक) का नाश करना होगा तभी अपनी कीर्तिमयी प्रभा से सम्पूर्ण जगत्समुदाय को, समस्त विश्व को प्रकाशित कर सकते हैं। जिस प्रकार हम स्नान करके अपने मैल आदि का त्याग करते हैं, गंदे कपड़ों को पानी से धोकर स्वच्छ करते हैं, ठीक उसी प्रकार अपने मन की व्याधियों को मारकर, एक नए जीवन का अनुभव कर सकते हैं, क्योंकि जीवन प्राप्त करने लिए मृत्यु आवश्यक है, किसको जीवित रखने हेतु किसे मारना है, यह विचार आपका अपना है। अतः मृत्यु ही जीवन की जननी है।
- मृत्यु से ही जीवन का निर्माण होता है।
त्रेता युग में दशरथ नंदन, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने लंका में राक्षस राज रवण का संहार करके, द्वापर युग में देवकी नंदन, श्री कृष्ण ने अपने दुराचारी मामा कंस का वध करके एक नए युग का निर्माण किया। कौरव-पाण्डवों के मध्य महाभारत के रणक्षेत्र में कौरवों परास्त कर, सभी अधर्मियों व उनका साथ देने वालो साथियों का संहार करके, पाण्डवों को युद्ध में विजय दिलवाकर धर्म की स्थापना की थी, परंतु इसका यह आशय नहीं है, कि हम-और-आप एक दुसरे का वध करें, अपितु अपने अन्तर्मन/ अन्दर के बुरे विचारों का संहार करें, कुसंगातियों का त्याग करें तथा सभी व्याधियों का वध करें। तभी एक अनुशासित, सुव्यवस्थित, स्वर्णिम व सदाचारी तथा शिष्टाचारी व्यक्तित्व का निर्माण हो सकेगा। एक किसान भी अपनी फसल को और अधिक अच्छा करने के लिए खेत की मिट्टी में उत्पन्न खर-पतवार को उखाड़ फेंकता है। फसल को कीट आदि से रक्षित करने के लिए उसे कीटनाशक औषधियों का छिड़काव आदि करता है और इस प्रकार वह किसान अपनी फसल की पैदावार को अच्छी व स्वच्छ बनाने में समर्थ हो पाता है। यदि किसान कीट अथवा खर-पतवार जैसी व्याधियों से अपनी फसल को रक्षित न करे, उनका संहार न करे, तो वह एक नई और अच्छी फसल का उत्पादन नहीं कर सकेगा। अतः संहार ही निर्माण का आधार है।
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