मृत्यु के बाद जीवन -
यह कोई स्वर्ग-नर्क अथवा पुनर्जन्म की कहानी नहीं है, अपितु मानव जीवन व उसके कर्मों का कटु सत्य है। जीवन तथा मृत्यु, ब्रह्मांड का ऐसा सत्य है जिसके बारे में सब कुछ जानकर भी अनजान हैं। इसमें लिप्त होने की जिज्ञासा कभी समाप्त नहीं होती। अज्ञात तल के समुद्र में गोते लगाने के समान ही है "जीवन-मृत्यु विज्ञान"। असंख्य ऋषि मुनियों व वैज्ञानकों ने जीवन तथा मृत्यु पर अपना शोध प्रस्तुत किया और बहुत कुछ समझाने का प्रयास भी किया, परन्तु यह तो ऐसा सत्य है जिसे केवल महसूस करके ही समझा जा सकता है ना कि किसी के समझाने से। जिस प्रकार नदी के शीतल जल में स्नान करने का आनन्द उसमें डुबकी लगाने से ही मिल सकता है, नाकि नदी के किनारे बैठ कर उस जल को देखने से। आसन, योग, ध्यान आदि क्रियाएँ हमको, हमसे मिलवाने में सहायक होती हैं, परन्तु इन्हें स्वीकारना पड़ता है, इनका स्वयं प्रयोग करके ही अनुभव किया सकता है, पढ़ कर अथवा सुन कर नहीं।
जीवन का आनन्द सत्य एवं आलौकिक है। मृत्यु का आनन्द अटल-सत्य है और एक प्रकार का भ्रम भी। शरीर नाशवान है तथा परमात्मा व जीवात्मा के निवास का प्रत्यक्ष स्थान है। आत्मा, परमात्मा का एक अंश मात्र है जो शरीर को "जीव" बनाती है। भाग्य तथा कर्म के काल चक्र के अनुसार शरीर का विघटन तथा जीव को छोड़कर आत्मा का परमात्मा में मिलन ही उस जीव को मृत्यु का अहसास कराता है। यह मात्र ऐसा ही है जैसे समय आने पर पुराने वस्त्रों को त्याग देना। जीव मरता है, परन्तु आत्मा अमर है। इसीलिए मृत्यु भ्रम है तथा जीवन सत्य है। जीवित प्राणी में ईश्वरीय परमशक्ति का वास है। मृत्यु के उपरांत आत्मा का परमात्मा में विलीन होना तथा शरीर का उन्ही पांच तत्वों (पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि, वायु) में पुनः समा जाना, जिनसे उनका उद्गम हुआ था, प्रकृति का यह चक्र निरंतर अपने ही निश्चित समयानुसार चलता है। यह ना तो किसी'को ठीक-ठीक पता होता है और ना ही कोई पता कर सकता है। भ्रम, माया, मिथ्या आदि जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भटकाने के लिए प्रस्तुत रहते हैं, मृत्यु से दूर भगाते हैं, जबकि मृत्यु अटल है।
सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर ही सत्य है, यही वास्तविक सत्य सर्वस्व है। - "चित्रांश"
मरने के बाद जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, यही मोक्ष है। जो हम देख रहे हैं वह झूठ है, माया है, जो हमें नहीं दिखता, वही सत्य है। ईश्वर सत्य है, परन्तु दिखाई नहीं देता। आत्मा है, अमर है और सत्य है, परन्तु दिखती नहीं। शरीर मिथ्या है, झूठ है, नश्वर है, परन्तु प्रत्यक्ष है। इसका मोह, जीवन के सत्य-चित्त-आनन्द का अनुभव करने के स्थान पर जीवन भर उस मृत्यु से दूर भागता है, जिसकी गोद में एक दिन अवश्य जाना है। यह मेरा है, वह मेरा है, जो आज तेरा है, वह कल मेरा था, कल फिर मेरा ही होगा। रटते-करते एक दिन सब कुछ छोड़ कर चले जाना है, फिर भी जीवन का वास्तिविक आनन्द इधर-उधर, इसमें-उसमे ढूंढते हैं। जबकि जीवन अपने आप में एक आनन्द है और मृत्यु परम आनन्द है, क्योंकि जीवन प्राप्त होने पर आत्मा परमात्मा से पृथक होकर जीवात्मा का रूप ले लेती है, जबकि मृत्यु ही आत्मा को पुनः परमात्मा से मिलाती है। "असत्य" दिखता है, जबकि "सत्य" केवल महसूस किया जाता है।
जीवन पर्यन्त कुछ न कुछ करते रहते हैं, परन्तु कुछ ऐसा करने की कभी नहीं सोचते कि मृत्यु के बाद भी जीवन का परम आनन्द मिल सकता है। जी हाँ मरणोपरान्त "परमवीर चक्र" अथवा कोई अन्य पुरुस्कार आपको मृत्यु के पश्चात भी प्रत्यक्ष आनन्द की अनुभूति कराता है। आपका नाम आपके काम के कारण अमर हो जाता है। अब प्रश्न उठता है कि इस आनन्द की अनुभूति हमें कैसे होगी, हमारी तो मृत्यु हो चुकी है? तो यह ऊपर लिखा जा चुका है कि मृत्यु मिथ्या है, भ्रम है। यदि मृत्यु के डर को जीवन में बसा लिया तो, यह अमूल जीवन, मृत्यु से पहले ही नष्ट हो जायेगा। जीवन तो जीने के लिए है, कर्म एवं भक्ति करने के लिए है। यह आप पर व आपकी सोच पर निर्भर करता है कि आप किस प्रकार के कर्म व कर्मों की श्रंखला में प्रवेश करते हैं। यदि आपने सत्कर्म किये हैं, मानव तथा समाज कल्याण में निःस्वार्थ योगदान किया है, ईश्वर की असंख्य भक्ति की है, सत्य में विश्वास है, तो आपकी मृत्यु भी आपको जीवन की एक अनोखी अनुभूति करा सकती है और यदि आपके कर्म इसके विरूद्ध हैं तथा झूठ में अटूट विश्वास है, तो जीवन पर्यन्त आप मृत्यु का अनुभव करते रहते हैं। पिछले कर्म ही आपको अगला जीवन प्रदान कराते हैं।
जीवन का परम आनन्द सत्कर्म में है और वो तो मृत्यु के बाद भी रहता है।
जैसे :- स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस आदि।
जैसे :- स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस आदि।
बहुत पुरानी पंक्ति है - अंत बुरा तो सब बुरा। अंत भला तो सब भला।।
नोट - यहाँ पर मेरे कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि जीवनपर्यन्त मानव व समाज कल्याण के लिए सत्कर्म करो और आज से करो, अभी से करो, ताकि आपके बाद आपके काम को आपके नाम से जाना जाये, और आपकी मृत्यु हो जाने पर भी आपका नाम हमेशा के लिए अमर हो जाये।
Wish you a Happy Life after Death !!