बुधवार, 16 अप्रैल 2014

The Life after Death

मृत्यु के बाद जीवन -

यह कोई स्वर्ग-नर्क अथवा पुनर्जन्म की कहानी नहीं है, अपितु मानव जीवन व उसके कर्मों का कटु सत्य है। जीवन तथा मृत्यु, ब्रह्मांड का ऐसा सत्य है जिसके बारे में सब कुछ जानकर भी अनजान हैं। इसमें लिप्त होने की जिज्ञासा कभी समाप्त नहीं होती। अज्ञात तल के समुद्र में गोते लगाने के समान ही है "जीवन-मृत्यु विज्ञान"। असंख्य ऋषि मुनियों व वैज्ञानकों ने जीवन तथा मृत्यु पर अपना शोध प्रस्तुत किया और बहुत कुछ समझाने का प्रयास भी किया, परन्तु यह तो ऐसा सत्य है जिसे केवल महसूस करके ही समझा जा सकता है ना कि किसी के समझाने से। जिस प्रकार नदी के शीतल जल में स्नान करने का आनन्द उसमें डुबकी लगाने से ही मिल सकता है, नाकि नदी के किनारे बैठ कर उस जल को देखने से। आसन, योग, ध्यान आदि क्रियाएँ हमको, हमसे मिलवाने में सहायक होती हैं, परन्तु इन्हें स्वीकारना पड़ता है, इनका स्वयं प्रयोग करके ही अनुभव किया सकता है, पढ़ कर अथवा सुन कर नहीं। 

जीवन का आनन्द सत्य एवं आलौकिक है। मृत्यु का आनन्द अटल-सत्य है और एक प्रकार का भ्रम भी। शरीर नाशवान है तथा परमात्मा व जीवात्मा के निवास का प्रत्यक्ष स्थान है। आत्मा, परमात्मा का एक अंश मात्र है जो शरीर को "जीव" बनाती है। भाग्य तथा कर्म के काल चक्र के अनुसार शरीर का विघटन तथा जीव को छोड़कर आत्मा का परमात्मा में मिलन ही उस जीव को मृत्यु का अहसास कराता है। यह मात्र ऐसा ही है जैसे समय आने पर पुराने वस्त्रों को त्याग देना। जीव मरता है, परन्तु आत्मा अमर है। इसीलिए मृत्यु भ्रम है तथा जीवन सत्य है। जीवित प्राणी में ईश्वरीय परमशक्ति का वास है। मृत्यु के उपरांत आत्मा का परमात्मा में विलीन होना तथा शरीर का उन्ही पांच तत्वों (पृथ्वी, आकाश, जल, अग्नि, वायु) में पुनः समा जाना, जिनसे उनका उद्गम हुआ था, प्रकृति का यह चक्र निरंतर अपने ही निश्चित समयानुसार चलता है। यह ना तो किसी'को ठीक-ठीक पता होता है और ना ही कोई पता कर सकता है। भ्रम, माया, मिथ्या आदि जीवन के वास्तविक उद्देश्य को भटकाने के लिए प्रस्तुत रहते हैं, मृत्यु से दूर भगाते हैं, जबकि मृत्यु अटल है।  

सत्य ही ईश्वर है, ईश्वर ही सत्य है, यही वास्तविक सत्य सर्वस्व है।  -  "चित्रांश"

मरने के बाद जीवात्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है, यही मोक्ष है। जो हम देख रहे हैं वह झूठ है, माया है, जो हमें नहीं दिखता, वही सत्य है। ईश्वर सत्य है, परन्तु दिखाई नहीं देता। आत्मा है, अमर है और सत्य है, परन्तु दिखती नहीं। शरीर मिथ्या है, झूठ है, नश्वर है, परन्तु प्रत्यक्ष है। इसका मोह, जीवन के सत्य-चित्त-आनन्द का अनुभव करने के स्थान पर जीवन भर उस मृत्यु से दूर भागता है, जिसकी गोद में एक दिन अवश्य जाना है। यह मेरा है, वह मेरा है, जो आज तेरा है, वह कल मेरा था, कल फिर मेरा ही होगा। रटते-करते एक दिन सब कुछ छोड़ कर चले जाना है, फिर भी जीवन का वास्तिविक आनन्द इधर-उधर, इसमें-उसमे ढूंढते हैं। जबकि जीवन अपने आप में एक आनन्द है और मृत्यु परम आनन्द है, क्योंकि जीवन प्राप्त होने पर आत्मा परमात्मा से पृथक होकर जीवात्मा का रूप ले लेती है, जबकि मृत्यु ही आत्मा को पुनः परमात्मा से मिलाती है। "असत्य" दिखता है, जबकि "सत्य" केवल महसूस किया जाता है। 

जीवन पर्यन्त कुछ न कुछ करते रहते हैं, परन्तु कुछ ऐसा करने की कभी नहीं सोचते कि मृत्यु के बाद भी जीवन का परम आनन्द मिल सकता है। जी हाँ मरणोपरान्त "परमवीर चक्र" अथवा कोई अन्य पुरुस्कार आपको मृत्यु के पश्चात भी प्रत्यक्ष आनन्द की अनुभूति कराता है। आपका नाम आपके काम के कारण अमर हो जाता है। अब प्रश्न उठता है कि इस आनन्द की अनुभूति हमें कैसे होगी, हमारी तो मृत्यु हो चुकी है? तो यह ऊपर लिखा जा चुका है कि मृत्यु मिथ्या है, भ्रम है। यदि मृत्यु के डर को जीवन में बसा लिया तो, यह अमूल जीवन, मृत्यु से पहले ही नष्ट हो जायेगा। जीवन तो जीने के लिए है, कर्म एवं भक्ति करने के लिए है। यह आप पर व आपकी सोच पर निर्भर करता है कि आप किस प्रकार के कर्म व कर्मों की श्रंखला में प्रवेश करते हैं। यदि आपने सत्कर्म किये हैं, मानव तथा समाज कल्याण में निःस्वार्थ योगदान किया है, ईश्वर की असंख्य भक्ति की है, सत्य में विश्वास है, तो आपकी मृत्यु भी आपको जीवन की एक अनोखी अनुभूति करा सकती है और यदि आपके कर्म इसके विरूद्ध हैं तथा झूठ में अटूट विश्वास है, तो जीवन पर्यन्त आप मृत्यु का अनुभव करते रहते हैं। पिछले कर्म ही आपको अगला जीवन प्रदान कराते हैं। 
   
जीवन का परम आनन्द सत्कर्म में है और वो तो मृत्यु के बाद भी रहता है।
जैसे :- स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ टैगोर, लोकमान्य तिलक, महात्मा गांधी, सुभाषचन्द्र बोस आदि।      

बहुत पुरानी पंक्ति है -  अंत बुरा तो सब बुरा। अंत भला तो सब भला।।

नोट - यहाँ पर मेरे कहने का तात्पर्य मात्र इतना है कि जीवनपर्यन्त मानव व समाज कल्याण के लिए सत्कर्म करो और आज से करो, अभी से करो, ताकि आपके बाद आपके काम को आपके नाम से जाना जाये, और आपकी मृत्यु हो जाने पर भी आपका नाम हमेशा के लिए अमर हो जाये। 



Wish you a Happy Life after Death !!



शनिवार, 12 अप्रैल 2014

Everybody waits for Anyone

Everybody waits for Anyone. 

हर कोई, किसी एक के लिए इंतजार करता है। 

सुन कर कुछ अजीब सा लगता है, कि  "हर कोई, किसी एक के लिए इंतज़ार करता है।" 
जी हाँ, यह उतना ही सत्य एवं अनुभव किया हुआ वाक्या है, जितना कि आप स्वयं महसूस कर सकते हैं। 

1. घर पर परिवार के सदस्यों का किसी एक सदस्य के लिए भोजन पर इंतज़ार। 
2. School-Office जाने के लिए अपने-अपने मित्रों व साथियों का इंतज़ार। 
3. Self-Study के लिए अपने महत्वपूर्ण सहपाठी का इंतज़ार। 
5. किसी Party में जाने के लिए मित्रों का इंतज़ार। 
6. Railway Plate-Form पर Train के आने, रूकने व दोबारा चलने का इंतज़ार। 
7. Railway Crossing पर Train के गुजर जाने का इंतज़ार। 
8. परीक्षा परिणाम के घोषित होने का इंतज़ार। 
9. चालू सरकार गिरने व नई सरकार बनने का इंतज़ार। 
10.  प्रत्येक Monday को Nest Sunday का इंतज़ार।  .... आदि 

उपरोक्त के अलावा भी प्रत्येक व्यक्ति किसी ना किसी प्रकार के इंतज़ार में लिप्त रहता ही है, परन्तु मैं यहाँ एक ऐसी प्रतीक्षा (इंतज़ार) के बारे में ज़िक्र करना चाह रहा हूँ, जो आप सुन कर समझ तो लेंगे, परन्तु उसका वास्तविक आनन्द तो महसूस करने से ही मिलेगा। 

एक निर्जीव वस्तु भी सजीव के सम्पर्क में आने से सजीव हो उठती है। - "चित्रांश"

एक मकान, घर तभी बनता है, जब उसमें इंसान का वास होता है। चाहर दीवारों से घिरी, गुम्बज़ के नीचे स्थापित की गई एक मूर्ति का स्थान, मन्दिर के रूप में तभी जाना-पहचाना जाता है जब वहाँ सजीवों का आवागमन होता है अथवा महसूस किया जाता है। हम अपने विचारों व मन की शक्ति एवं आत्मविश्वास से ही निर्जीव को सजीव बना देते हैं तथा सजीव को निर्जीव की तरह रहने पर मजबूर कर देते हैं। 

यदि मैं कहूँ कि निर्जीव में भी प्राण होते हैं, तो यह कोई नहीं स्वीकारेगा। परन्तु यदि आप महसूस करेंगे तो पाएंगे कि मैंने प्रमणित सत्य ही लिखा है। बच्चों के लिय उनके खिलौनों में, पुस्तक प्रेमियों के लिए पुस्तकों में, एक लेखक के लिए उसकी कलम में, योद्धा के लिए उसके हथियारों में, शिल्पकारों के लिए उनके औज़ारों में, माली को अपने बगीचे के प्रत्येक पौधे एवं पुष्प से, चरवाहे को अपने मवेशियों में और प्रकृति प्रेमियों के लिए तो प्रकृति की हर वस्तु व स्थान में, निर्जीव हो या सजीव, प्राण होते हैं। यह सभी अपने-अपने तरीके से अपनी अमुक वस्तुओं अथवा साथियों से वाकायदा वार्तालाप करने के साथ अपने सुख-दुःख का प्रत्यक्ष साथी भी मानते हैं। 

हमने कई लेखों में पढ़ा है कि जहाँ पर हम अक्सर जाया करते हैं, वहाँ की आवोहवा भी हमारा इंतज़ार करती है और हमारे वहाँ पहुँचने पर उस स्थान का वातावरण, दो अंजान प्रेमियों के आत्मिक मिलन के अनुूठे सुख की अनुभूति करते हुए और-अधिक सुहावना व खुशनुमा हो जाता है। इंसान का समुद्र के मगरमच्छ से दोस्ताना,  नदी की मछलियों से मित्रता, जंगली जानवरों से अपने पन का अहसास, पेड़-पौधों से बातचीत का अनुभव आदि किस्से उतने ही सत्य हैं, जितना कि ईश्वर की उपस्थिति। मानो तो सब है, न मानो तो कुछ भी नहीं। जिस प्रकार हम उपरोक्त को अपनाते हुए जीवन यापन करते हैं, ठीक उसी प्रकार वे सब भी हमें अप्रत्यक्ष रूप से अपना बना लेते हैं और ठीक उसी पल का इंतज़ार करते हैं, जब उनका अंजाना एवं अपना आएगा और उनसे अपनी ही किसी भाषा में बतियायेगा। अपने और मेरे सुख-दुःख बांटेगा।

मन्दिर की मूर्ति भी अपने विश्वास-भक्त के आगमन तथा उसके प्रिय हाथों से प्रसाद ग्रहण करने के लिए इंतज़ार करती है। इसीलिए कहा जाता है कि जिस मन्दिर में या जिस मूर्ति पर आप विश्वास रखते हैं, एक निश्चित स्थान, दिन व समय पर प्रसाद चढ़ाते व भोग लगाते हैं, उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि वह स्थान, वह मूर्ति आपकी अमुक समय पर प्रतीक्षा कर रही होती है, और यदि किसी कारण वश, आप वहाँ नहीं पहुँच पाते हैं, तो मन ही मन उसे याद करके, वहाँ पर अपनी उपस्थिति को दर्ज कराते हुए महसूस करें। चेतना में धारण करें। विश्वास करें कि आप, उस पल वहाँ उपस्थित हैं, क्योंकि वो पल भी आपके वहाँ होने का इंतज़ार कर रहा होता है।

जिस प्रकार इन्सान को अपने मित्रों का इंतज़ार रहता है, उसी प्रकार जानवरों व पक्षियों को भी अपने साथियों का इंतज़ार रहता है तथा जिस प्रकार एक दास को अपने स्वामी तथा ईश्वर भक्त को अपने ईष्ट के दर्शन का इंतज़ार रहता है ठीक उसी प्रकार मन्दिर के ईश्वर भी अपने भक्त के आने की प्रतीक्षा करते हैं। 

इंतज़ार को मिलन में बदल देने से दोनों को ही एक आलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है। - "चित्रांश" 

अधिक न लिखते हुए अंत में केवल यही कहूँगा, कि जन्म को मृत्यु का तथा मृत्यु को पुनः जन्म का इंतज़ार होता है, परन्तु यह कभी मिल नहीं पाते।

किसी को कभी इंतज़ार न करवाएं, निश्चित स्थान, दिन व समय पर अवश्य उपस्थित हों, क्योंकि निर्जीव हो या सजीव "हर कोई, किसी एक के लिए इंतज़ार करता है।"