अलग-अलग तीन ही एक हैं।
त्रिगुणात्मक सृष्टि के तीन गुण क्रमशः सत्त्व गुण, रजो गुण व तमो गुण, जिनके अधिष्ठाता त्रिदेव हैं। ये तीनो गुण प्रत्येक प्राणी में विद्यमान हैं। प्रथम श्री ब्रह्मा-रचयिता हैं जो जगतपिता/ परमपिता कहलाते हैं, द्वितीय श्री विष्णो, जो सृष्टि का पालन करते हैं व तृतीय श्री रूद्र हैं, जो प्रकृति को सन्तुलित करने के लिए संहार करते हैं। ये सभी आदि, अन्त तथा मध्य में नित्य मंगलमय हैं, जिनकी समानता अथवा तुलना कभी भी नहीं है, जो आत्मा के स्वरुप को प्रकाशित करने वाले देवता/ परमात्मा हैं। यही सर्वश्रेष्ठ अजर-अमर ईश्वर हैं। यह सब ज्ञान, भक्ति व वैराग्य से उत्कृष्ट हैं, इनके दर्शन एवं साक्षात्कार का यही साधन है। श्रवण, कीर्तन/ध्यान व मनन ये तीनो साधन वेद सम्मत हैं (स्कन्द पुराण-४८६) और मोक्ष के साक्षात्कार का एक मात्र साधन। यह तीनो एक हैं और एक में तीनो निहित हैं।
यह शब्द ब्रह्म ही ज्योतिर्मय स्तम्भ है, जो सृष्टि का निर्माणक/ स्रोत है। सृष्टि का निर्माण, पालन, संहार, ब्रह्म के जगत्सम्बन्धी तीन कार्य हैं, जो नित्य सिद्ध हैं। इन तीनो अवयवों से एकीभूत होकर सृष्टि का प्रथम अक्षर प्रणव, ॐ (ओंकार) उत्पन्न हुआ। प्रणव के उच्चारण में क्रमशः 'अ', 'उ' तथा 'म' तीनो अक्षर ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन करते हैं। प्रणव में तीन अक्षर हैं, 'प्र'-प्रकृति से उत्पन्न महासागर का नाम है। 'न'-इस महासागर को पार करने के लिए नाव तथा 'व'-हम-तुम सभी के लिए। अतः इन तीन भावो को एक ही मानकर ज्ञानी पुरुष 'एक ओंकार' (ॐ) कहते हैं, यही एक शब्द त्रिगुणी ईश्वर तथा ब्रह्माण्ड का सारतत्त्व है व सृष्टि के माया रुपी महासागर को पार करने के लिए एक मात्र नाव है। वह अ - उ - म, इन तीन तत्वों से युक्त है, जिसमे अकार श्री ब्रह्मा स्वरुप हैं, उकार श्री विष्णु स्वरुप हैं तथा मकार स्वयं महेश्वर हैं और ये तीनो एक रूप ओंकार स्वरुप हैं।
- शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता-५८, ७४)
भारत देश के उत्तरप्रदेश में अयोध्या नगरी- त्रेता युग के श्री राम जन्म भूमि को हम भली प्रकार जानते हैं, यह अयोध्या नाम भी अपने आप में उपरोक्त त्रिगुणात्मक शक्ति का बोध करवाता है, अकार कहते हैं ब्रह्मा को, यकार विष्णु का नाम है और धकार रूद्र स्वरुप है, इन सबके योग से 'अयोध्या' नाम शोभित होता है। समस्त उपपातकों के साथ ब्रह्म हत्या आदि महापातक इस पुरी से युद्ध नहीं कर सकते, इसलिए इस स्थान को 'अयोध्या' कहा जाता है। यह श्री राम जन्म भूमि 'अयोध्या पुरी' भी त्रिगुणी शक्ति का एक अनूठा द्योतक है।
- स्कन्द पुराण (वैष्णवखण्ड-५०८)
भारत देश के उत्तरप्रदेश में मथुरा नगरी- द्धापर युग के श्री कृष्ण की जन्म भूमि है, जिन्हें हम माधव अथवा केशव नाम से भी संबोधित करते हैं। यहाँ 'केशव' नाम का उल्लेख श्रीमद्भागवत में इस प्रकार है, अक्षर 'क' ब्रह्मा हैं, अक्षर 'अ' विष्णु हैं, 'ईश' स्वयं शिव हैं तथा ये तीनो जिसके 'व'-वपु अर्थात स्वरुप हों, उसको केशव कहते हैं। यहाँ अर्जुन भगवन को 'केशव' नाम से संबोधित करके यह भाव दिखलाते हैं, कि आप समस्त जगत के सृजन, संरक्षण और संहार करने वाले सर्वशक्तिमान साक्षात् सर्वग्य परमेश्वर हैं।
- श्रीमद्भागवत गीता (दूसरा अध्याय, श्लोक-५४)
तात्पर्य यह है कि, उपरोक्त तीनो शक्तियाँ, यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनके अधीन है, अलग-अलग तीन होते हुए भी सर्वथा एक ही हैं। यही तीनो/ त्रिदेव सृष्टि रुपी संसार के तीनो संताप (आध्यात्मिक, आदिदैविक, आदिभौतिक) समूह का अपहरण करते हैं तथा अपनी कीर्तिमयी प्रभा से सम्पूर्ण जगत्समुदाय को, समस्त विश्व को प्रकाशित करते हैं।
- स्कन्द पुराण (वैष्णवखण्ड-३९८)
हिन्दी शब्दावली में 'भगवान' या 'ईश्वर' को अंग्रेजी भाषा में 'GOD' कहते हैं, जिसका शाब्दिक व व्यापक अर्थ, G से Generator (रचयिता), O से Operator (पालनकर्ता) और D से Destroyer (संहारक) है, जो एक शब्द मात्र नहीं है, बल्कि त्रिशक्तियों का एक सुप्रसिद्ध प्राकृत/ दैविक समूह है, जिसके विचार करने मात्र से शरीर में एक अनदेखी सकारात्मक ऊर्जा का संचार सा होने लगता है, जो अलग-अलग भी होकर हमें एक होने का आभास कराते हैं। इन तीनों शक्तियों का एक साथ उच्चारण करने के लिए एक अन्य मार्ग भी है, उनका लघु नाम। सृष्टि के पालक विष्णु/ प्रभु जगन्नाथ को "श्री हरि" नाम से, सृष्टि के आदि-अंत/ संहारक भगवान शिव को 'ओंकार' (ॐ) और सत्त्व गुण के रूप परमपिता ब्रह्मा को 'तत्सद्' से संबोधित हैं, इस प्रकार "हरि-ॐ-तत्सद्" एक सूत्र में बंधे वो तीन मोती हैं, जो तीन होकर भी एक हैं तथा जिनका उच्चारण करने से हमारे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सभी कष्टों का निवारण होता है।
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