सोमवार, 16 जनवरी 2017

Wow Life ! - Wah Jindagi

वाह जिन्दगी !!

. . . जिन्दगी ?
क्या है जिन्दगी ?  
कैसी होती है जिन्दगी ? 
किसे कहते हैं जिन्दगी ?  
क्या आपने देखी है जिंदगी ?
          
          उपरोक्त सभी प्रश्नों के प्रतिउत्तर में, मैं मात्र इतना कहना चाहूँगा, कि ''जी हाँ, मैंने देखी है, जिन्दगी।'' बहुत ही सुन्दर है, कल्पना से परे है, और आपका साक्षात्कार भी करवाऊंगा। वह लोग जो अपनी जिन्दगी को हंसी-ख़ुशी जीते हैं, उनके लिए खिलते हुए अति सुन्दर व मनमोहक गुलाबों का बगीचा है, तथा दूसरी ओर जो सज्जन दुःखी मन से द्वेष की भावना से देखते हैं, उनके लिए जी का जंजाल/ बवाल है। 
          
          अरे ! यह तो एक निर्मल, स्वच्छ व स्वादिष्ट पानी वाली नदी के दो किनारे हैं, जिसके बीच में निर्मल जल की कल-कल करती धारा प्रवाहित हो रही है और पानी के दोनों ओर सूखी हुई जमीन। अब किनारे पर रहकर, नदी में बिना प्रवेश किये, ना तो प्यास बुझाई जा सकती है और ना ही उस निर्मल जल में स्नान का आनन्द ही मिल सकेगा। बस यूँ ही, ऐसी ही तो है हमारी मनभावन जिन्दगी। 
          
          ''जैसी मूर्ति मन में बसा लो, वैसे ही हैं भगवन'', यह पंक्ति तो सभी ने सुनी व पढ़ी होगी। हमारी जिन्दगी भी कुछ ऐसी ही है। जो सुखी हैं अथवा हर पल, हर स्थिति में सुखी रहते हैं, वे दिन-प्रतिदिन सुख का अनुभव करते हुए प्रगति की सीढियां चढ़ते चले जाते हैं और जो अपने मन-अंतरमन को दुःखी मानते हैं, हर पल दुःख का अनुभव करते तथा दुःखी ही रहते हैं, उनकी यह दुःखमयी सोच, उन्हें पतन की ओर ढकेलती रहती है। अरे ! मेरे प्रिय बन्धुओं, जिन्दगी तो सुन्दर वस्त्रों व आभूषणों में लिपटी कोमल काया वाली, चिरयौवन से युक्त वह सुन्दर स्त्री है, जिसे हम अपने विचार और संस्कार से अलग-अलग संज्ञा देकर पुकारा करते हैं, जैसे-माता, बहिन, पत्नी अथवा मित्र और फिर वही स्त्री कुविचारों से वैश्या हो जाती है, जबकि उसे यह रूप व नाम देने वाले और उसकी वैश्यावृत्ति का लाभ उठाने वाले आप और हम ही तो हैं। परन्तु यदि थोड़ा सा अपने दिमाग पर जोर डालें तो जानेंगे कि, पौराणिक कथाओं में या मंदिरों में जहाँ पर भी देवियों का उल्लेख है अथवा मूर्तियों की शाब्दिक या वास्तविक चित्रकारी की गई है, वे सभी सुन्दर व सुडौल शरीर वाली, चिरयौवन से युक्त, कवि की शाब्दिक कल्पनाओं से परे, दर्शायी गई हैं। प्रश्न यह है, कि ये मूर्तियाँ या उनकी कहानी, क्यों अनूठी सुंदरता से परिपूर्ण होती है? क्योंकि, सुन्दर व पवित्र विचारों से ही हमारी जिन्दगी परिभाषित, सुगन्धित एवं उद्घोषित होती है। हमारे व्यक्तित्व का निर्माण भी इसी तथ्य पर निर्भर करता है। जिन्दगी से, एक ओर कोई दुःखी है और दूसरी ओर किसी की ख़ुशी का ना तो ठिकाना है और ना ही कोई सीमा।   

          जैसे किसी मूर्तिकार अथवा कवि ने कभी किसी देवी या किसी अप्सरा को प्रत्यक्ष नहीं देखा, परंतु उसकी छाया का चित्रांकन और उसकी मूर्ति को अपनी शिल्पकारी से तथा कवि अपने शब्दों से वो आकार-प्रकार-रूप प्रदान कर देता है, अपनी कल्पनात्मक सोच व नज़रिये से सजा कर ऐसे प्रस्तुत करता है, कि हम उस मूर्ति को/ छाया चित्रण को वैसा ही मानने पर मजबूर हो जाते हैं। ठीक उसी प्रकार एक मूर्तिकार की तरह ही अपनी जिंदगी को मन्दिर की दैवीय मूर्ति जैसी खुशनुमा, रंगीन, अदभुत, अतिसुन्दर और चिरयौवन से युक्त बनाने की सम्पूर्ण जिम्मेवारी हमारी स्वयं की ही है। यह तो आप सभी जानते होंगे, कि मानव जीवन (Human Life) प्रकृति का अदभुत ऐवम अभूतपूर्व तोहफा है, जो हम प्राक्तृतिक सौन्दर्य को महसूस करने के साथ-साथ अपनी प्रत्यक्ष आँखों से देख कर समझने की क्षमता भी रखते हैं। जैसे प्रकृति हमें अपने अनूठे-अद्भुत सौंदर्य का एहसास करवाती है, वैसे ही हमें भी अपनी जिंदगी के खुशनुमा होने का एहसास स्वयं करना होगा।    

          मैं 'अथर्ववेद' एक की सूक्ति/ ऋचा का यहाँ उल्लेख करता हूँ, "यदन्तरं तद बाह्मं, यद् बाह्मं तदन्तरं", अर्थात जो तुम बाहर से हो, वही तुम अंदर से भी बन जाओ, जो अंदर हो, वही बहिरंग में प्रकट हो।


  'जो है, वही अंतर्मन से महसूस करो और जो अपने अंतर्मन में महसूस करो, वही प्रवाहित भी।'

                                                                                               - "चित्रांश"

          जिस प्रकार प्रकृति बाहर से सुन्दर होने के साथ-साथ अंदर से भी सुन्दर होने का एहसास करवाती है। निर्जीव होकर भी सुन्दर वस्त्र व वस्तुएँ हमें अपनी ओर आकर्षित कर ही लेती हैं। हम भी हमेशा सुन्दर वस्त्र पहनने को लालायित रहते हैं तथा सुन्दर वस्त्र ही देखते व पहनते हैं, वैसे ही बाहर और अन्दर दोनों ओर से अपने विचारों को, अपनी सोच को बदलकर, अपने अंतर्मन को निर्मल करके, उसमे सुन्दर व निश्चल जीवन धारा प्रवाहित करो और जिन्दगी की संज्ञा को स्वयं परिभाषित करो। सिद्ध करो कि, हम अपनी जिन्दगी के मूर्तिकार स्वयं हैं। 


          जीवन जीने का वास्तविक आनन्द तो तब है जब आनन्द की अनुभूति अंतर्मन में हो, वो आलौकिक आनंद की अनुभूति, जो शब्दों में न व्यक्त की जा सके और कलम की स्याही से मापी न जा सके। यह पूर्णानंद आपके भीतर है, आपके अंतर्मन में है, आपके रोम-रोम में निहित है। खेत की मिट्टी में बोये हुए बीज के अंकुर की तरह धरती की छाती चीरकर बाहर निकलो और असंख्य लोगों के बीच जोर से, पूरी ताकत के साथ, पूर्ण वेग से चिल्लाकर कहो - खुशनुमा है जिन्दगी, आलौकिक आनन्द से परिपूर्ण है, हमारी जिन्दगी। 


वाह जिन्दगी !!

हमें अपनी आनंदमयी जिन्दगी की परिभाषा, अपनी ही लेखनी से स्वयं लिखनी है और ऐसी लिखनी है कि मुख, स्वर व ध्वनि बलपूर्वक स्वतः ही कहें, कि  - वाह जिन्दगी, वाह-वाह जिंदगी !!


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