गुरुवार, 26 जनवरी 2017

GYAN - 3

ज्ञान - ३  

ज्ञानोपदेशः  


'अज्ञान' की निवृत्ति 'ज्ञान' से ही होती है, कर्म से नहीं। 
ज्ञान परब्रह्म परमात्मा का नाम है। वेदान्तवाक्य के श्रवण और मनन से जो ज्ञान होता है, वह विरक्त पुरुष को ही होता है, दूसरे को नहीं। श्रेष्ठ अधिकारी को गुरुदेव की कृपा से भी ज्ञान हो जाता है। यह सत्य है। मनुष्य के ह्रदय में जो कामनाएं हैं वे सबकी सब जब छूट जाती हैं, तब वह जीवन्मुक्त होकर इसी जीवन में परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। क्रूरकाल जागते, सोते, खाते और ठहरते समय सदा ही इस जीव को अपनी ओर खींचता रहता है। संग्रह का अंत विनाश है। अधिक ऊँचे चढ़ने का अंत नीचे गिरना है। संयोग का अंत वियोग और जीवन का अंत मरण है। दि० २१ जनवरी,२०१७ के ब्लॉग देखें। 

जैसे पके हुए फलों को गिरने के सिवा और कोई भय नहीं है, वैसे ही जन्म लेने वाले मनुष्यों को मृत्यु के सिवा और कोई भय नहीं है। जैसे सुदृढ़ खम्भों वाला गृह सुदीर्घ काल के बाद जीर्ण होने पर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जराजीर्ण होकर मृत्यु के आधीन हो नष्ट हो जाता है। दिन और रात बीतते चले जा रहे हैं। इससे मनुष्यों की आयु नष्ट होती है। इस दशा में तुम अपनी आत्मा के लिए शोक करो। दूसरी किसी बात के लिए क्यों शोक करते हो? हे वत्स! कोई खड़ा हो या दौड़ता हो, उसकी आयु का प्रति क्षण नाश हो रहा है। मृत्यु साथ-साथ चलती है, साथ ही बैठती है और दूर देश में साथ-साथ जाकर पुनः साथ ही लौट आती है। शरीर में झुर्रियां पड़ गईं, सिर के बाल सफ़ेद हो गए और बृद्धावस्था एवं दमा और खाँसी से देह शिथिल हो जाती है। प्रिय बन्धु! जैसे समुद्र में बहते हुए दो काठ एक दूसरे से मिलकर फिर विलग हो जाते हैं, उसी प्रकार कालयोग से मनुष्यों का एक दूसरे के साथ संयोग और वियोग होता है। इसी प्रकार स्त्री, पुत्र, भाई, क्षेत्र और धन ये सब कभी कुछ काल के लिए एकत्र होते और फिर अन्यत्र चले जाते हैं। जैसे कोई पथिक राह चलते हुए किसी दूसरे पथिक से कहता है, कि ठहरिये, मैं भी आपके साथ चलूंगा और इस प्रकार दोनों कुछ काल तक साथ हो जाते हैं और फिर अलग-अलग चले जाते हैं, इसी प्रकार स्त्री और पुत्र आदि का समागम नश्वर है। शरीर के उत्पन्न होने के साथ ही निश्चय ही मृत्यु भी उत्पन्न होती है। इस अवश्यम्भावी मृत्यु को टालने का कोई उपाय नहीं है। हे वत्स! इस शरीर का अंत हो जाने पर देहाभिमानी जीव अपने कर्म की गति के अनुसार दूसरा शरीर धारण कर लेता है। प्राणियों का सदा एक स्थान पर निवास नहीं होता। अपने-अपने कर्म वाश वश सभी जीव एक-दूसरे से विलग हो जाते हैं। 

प्रिय बन्धु! जीवों के शरीर जिस प्रकार उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं, उस प्रकार आत्मा का जन्म और मरण नहीं होता। तुम शोक रहित अद्वैत ज्ञानमय सतस्वरूप निर्मल परब्रह्म परमात्मा का दिन-रात चिंतन करो। ऐसी दृष्टि होने पर तुम्हारा किया हुआ प्रत्येक कर्म स्वयं ईश्वर के द्वारा किया हुआ है और उनका किया हुआ प्रत्येक कर्म तुम्हारा किया हुआ है। इस प्रकार अज्ञान के प्रभाव से ही मनुष्य दुःख पाता है और अज्ञान की निवृत्ति हो जाने तथा अंतर्मन में ज्ञान का प्रकाश होने पर, उसे उत्तम सुख की प्राप्ति होती है।

अतः प्रिय बन्धु! तत्वज्ञान में ही सदा स्थित रहो। यह आत्मा स्वयंप्रकाश है। तुम सदा आत्मा के इसी स्वरुप का चिंतन व मनन करो। देह आदि में ममता त्यागकर सदा सत्य-अहिंसा एवं धर्म का आश्रय लो।

 - स्कन्द पुराण (ब्रह्मखण्ड-५८०-५८१)


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