बुधवार, 25 जनवरी 2017

GYAN - 1

ज्ञान  - १

ज्ञानोपदेशः  


'ज्ञान' शब्द का अर्थ बहुत विस्तृत एवं अति व्यापक है। ज्ञान का शाब्दिक तथा वास्तविक अर्थ होने के साथ-साथ यह अपने आप में पूर्ण तो है, परंतु इसका सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर पाना अत्यंत दुर्लभ है आसान नहीं है, परन्तु प्रयास और अथक प्रयास करने से 'ज्ञान' प्राप्ति तभी हो सकती है, जब प्रभु की अनुकंपा हो। सृष्टि, समूचा ब्रह्माण्ड, इसकी उत्पत्ति तथा विनाश, जीवन तथा मृत्यु का रहस्य आदि इसी 'ज्ञान' शब्द में समाया हुआ है। 

ॐ (ओंकार/ प्रणव) सृष्टि का प्रथम उद्गम है। यह एक ऐसा आदि मन्त्र है, जिससे सृष्टि का, ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है। सम्पूर्ण सृष्टि इसी एकाक्षरी आदि मन्त्र में निहित है, जिसका स्थूल पंचाक्षरी है और सूक्ष्म ॐ (ओंकार) जो वेद-पुराणों के सभी मंत्रो का आदि तथा अंत भी है। कोई भी मंत्र ॐ से आरम्भ होकर, ॐ पर ही अंत होता है।  ॐ (ओंकार) हिंदी वर्णमाला का प्रथमांक/ प्रथम अक्षर है तथा 'ज्ञ' अंतिम अक्षर।

महाशिव पुराण के अनुसार ॐ (ओंकार/ प्रणव) पंचाक्षरों के एकोच्चारण में क्रमशः 'अ', 'उ', 'म', 'नाद' तथा 'ध्वनि', ये पाँचो एक स्वर की तरह सम्मिलित हैं। ध्वनि और नाद के साथ तीनो अक्षर ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन करते हैं। प्रणव में तीन अक्षर हैं, 'प्र'-प्रकृति से उत्पन्न महासागर का नाम है। 'न'-इस महासागर को पार करने के लिए नाव तथा 'व'-हम-तुम सभी के लिए। अतः इन तीन भावो को एक ही मानकर 'ज्ञानी' पुरुष 'एक ओंकार' (ॐ) कहते हैं, यही एक शब्द त्रिगुणी ईश्वर तथा ब्रह्माण्ड का सारतत्त्व है व सृष्टि के माया रुपी महासागर को पार करने के लिए एक मात्र नाव है। ॐ (ओंकार) मातृका का प्रथमाक्षर, अ - उ - म, इन तीन तत्वों से युक्त है, जिसमे अकार श्री ब्रह्मा स्वरुप हैं, उकार श्री विष्णु स्वरुप हैं तथा मकार स्वयं महेश्वर हैं और ये तीनो एक रूप ओंकार स्वरुप हैं। सदाशिव रूद्र के ओंकार रुपी डमरू की 'ध्वनि' तथा 'नाद' शून्यमयी ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। इसी शून्य से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और विनाशकाल में इसी में समा जाती है। 

यह 'ज्ञान' शब्द भी पंचाक्षरी प्रणव की भांति है, सृष्टि की तरह जिसमे पूर्ण हिन्दी वर्णमाला सम्मिलित है। अक्षर 'ज्ञ' और 'अ', यानि 'अ' से 'ज्ञ' तथा उपरोक्त वर्णित है, अक्षर 'न' अर्थात नाव। अब यदि 'अ' से 'ज्ञ' का ज्ञान हो अथवा 'ज्ञ' से 'अ' का ज्ञान, दोनों ही रूपों में आपको वर्णमाला का ज्ञान तो हो ही जायेगा। ज्ञानी व्यक्ति के ज्ञान का प्रकाश स्वतः करतल 'ध्वनि' उत्पन्न करता है और शून्य/ 'नाद' से बाहर आने का प्रयास करता है। वह ज्ञानी व्यक्ति अपने ज्ञान रुपी नाव की सहायता से यह जीवन/ संसार के मायावी महासागर को पार लेता है और अपनी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करता है। अब एक भ्रान्ति दिमाग में उत्पन्न हो रही होगी, कि 'अ' से 'ज्ञ' का ज्ञान हो, यह पंक्ति सीधी व उचित प्रतीत होती है, परंतु  'ज्ञ' से 'अ' के ज्ञान की पंक्ति तो उल्टी है !! ?? इसके लिए वेदमूर्ति पं० श्री राम शर्मा आचार्य की एक अनोखी सीख है, कि यदि उल्टे को सीधा करना हो, तो उसे पुनः उल्टा कर देना चाहिए। जब हम दर्पण में अपना चेहरा देखते हैं, तब हमें अपना ही प्रतिबिम्ब उल्टा दिखाई देता/ प्रतीत होता है, परन्तु हम तो उल्टे नहीं हो जाते, सीधे ही रहते हैं। ठीक उसी प्रकार 'ज्ञ' से 'अ' को जब उल्टा करेंगे तो स्वतः ही सीधा होकर, 'अ' से 'ज्ञ' हो जायेगा और कोई भी 'ज्ञान' उसकी अपनी वर्णमाला से ही आरम्भ होता है, अर्थात किसी भी पद्धति को जानने व समझने के लिए उसका व्यावहारिक ज्ञान अर्थात उसकी A,B,C,D . . . . etc. के बारे में जानकारी होना अतिआवश्यक होता है। चाहें वह अंग्रेजी का A to Z हो अथवा हिंदी वर्णमाला का 'अ' से 'ज्ञ'। किसी की पूर्ण या अपूर्ण जानकारी होना भी ज्ञान का ही प्रतीक है, परन्तु अपूर्ण ज्ञान लाभदायक नहीं होता। अतः साक्षर होना प्रथमावश्यक है।  (हिंदी वर्णमाला का पूर्ण ज्ञान और उसकी आध्यात्मिकता को जानने के लिए मेरा दि० ०९ जनवरी,२०१७ का ब्लॉग देखें।)

जब कोई शिशु पहली बार वर्णमाला का ज्ञान प्राप्त करता है, किशोरावस्था में अपने विद्द्यालय का मार्ग याद कर लेता है, युवावस्था में किसी वाहन को चलाने की प्रक्रिया को सीख लेता है या किसी भी प्रकार का कोई भी ज्ञान प्राप्त करता है अथवा कोई भी जिज्ञासु किसी बृद्ध/ गुरु/ अनुभवी व्यक्ति से कुछ ज्ञानवर्धक तथ्यों की जानकारी प्राप्त करके अपनी जिज्ञासा रुपी प्यास को बुझलता है, तो उसके आनंदित-प्रफुल्लित अंतर्मन के प्रकाश की 'ध्वनि' उसे 'शून्य' से बाहर लाकर ज्ञानी होने का अनुभव कराती है और इस प्रकार उस जिज्ञासु/ ज्ञान के पिपासु को ज्ञानोपदेश की प्राप्ति होती है। 


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