अंध-विश्वास :
अंधविश्वास, प्रतिदिन प्रयोग में आने वाला दो शब्दों का समूह, अक्सर हमारे दिमाग में उथल पुथल करता है कि वास्तव में इसका अर्थ क्या है अथवा इसको किस तरह समझा जाये। साधारण भाषा में अन्धविश्वास का अर्थ बहुत ही सूक्ष्म है। हम लोग कई रूढ़िवादिताओं के अनुसार कुछ तथ्यों / वाक्यों पर अन्धविश्वास ही नहीं करते बल्कि उनका अनुसरण भी करते हैं, भले ही हमें उसके पूर्ण एवं उचित अर्थ की जानकारी न हो।
कभी आपने सोचा है कि अंधविश्वास को हम हमेशा गलत नज़रों से ही क्यों देखते हैं, क्यों उसका अर्थ नकारात्मकता से ही लिया जाता है, कि अमुक व्यक्ति बहुत बड़ा अंधविश्वासी है या वह तो अन्धविश्वास का पालन करते हैं। परन्तु यदि ठन्डे दिमाग से अथवा गहराई से सोचें तो अंधविश्वास भी दो तरह से जाना जा सकता है, नकारात्मक अंधविश्वास व सकारात्मक अंधविश्वास।
नकारात्मक अंधविश्वास - अंधविश्वास के बारे में जैसा कि ऊपर वर्णन करने का प्रयास किया है कि जिन तथ्यों पर हम अंधे होकर अथवा बिना उसकी सच्चाई जाने विश्वास कर लेते हैं उसी को अंधविश्वास कहा जाता है। अब बात आती है नकारात्मक अंधविश्वास की, अर्थात जिन तथ्यों पर बिना सोचे समझे विश्वास करने से नकारात्मकता का बोध होता हो, अगले ही कदम पर अथवा आने वाले समय में कुछ हानि होने की सम्भावना नज़र आती हो, उसी अंधविश्वास को नकारात्मक अंधविश्वास के रूप में जान सकते हैं।
- उदहारण के लिए, बिल्ली के द्वारा रास्ता काटे जाने से परीक्षा देने न जाने की सोच, कि बिल्ली ने रास्ता काट दिया अब तो परीक्षा का परिणाम अनुचित/ अनुत्तीर्ण ही होगा। यात्रा आरम्भ के समय छींक आने से उस समय के लिए यात्रा स्थगित कर देना। किसी के सिर पर कौवा बैठकर उड़ जाने पर उसकी मृत्यु का झूठा समाचार फैलाना। तिराहे-चौराहे पर पूजन और न जाने इस प्रकार की बिना सिर-पैर की कितनी ही अवैज्ञानिक एवं रूढ़िवादी/ अंधविश्वासी परम्पराओ का बिना सोचे समझे पालन करना और उसी को उचित मानना, एक प्रकार का नकारात्मक अंधविश्वास ही है। इस तरह का अंधविश्वास हमें आज के आधुनिक-वैज्ञानिक युग में पीछे की ओर ढकेलते हुए असफलता के मार्ग पर चलने की अनुभूति कराता है।
सकारात्मक अंधविश्वास - अंधविश्वास का सकारत्मक रूप भी हो सकता है, कुछ अटपटा सा लग रहा होगा, परन्तु आगे की पंक्तियों को पढ़-समझ कर हमारी बातों पर विश्वास होने लगेगा।
यदि हम किसी को अपना आदर्श अथवा गुरु मानकर उसके उपदेशों/ सलाह पर बिना सोचे समझे विश्वास करते हैं तो यह भी एक प्रकार का अंधविश्वास ही है। अंतर सिर्फ इतना है कि इस प्रकार के अंधविश्वास में हमारी उन्नति अथवा उन्नति की भावना निहित होती है। हमसे अपनी बातों को अनुसरण करवाने वाले की प्रत्यक्ष/ परोक्ष भावना हमारी सफलता मात्र ही होती है और हम उनके उपदेशों/ निर्देशों/ तथ्यों अथवा कथाओं पर विश्वास ही तो करते हैं, परन्तु हमने उन्हें देखा नहीं होता और समझने की योग्यता भी नहीं होती, लेकिन अंधों की भांति विश्वास करते हैं अपितु उसका पालन/ अनुसरण करना अपना परम कर्त्तव्य/ धर्म समझते हैं।
- उदहारण के लिए, अध्यापक/ गुरु/ माता-पिता/ बुजुर्गों अथवा अनुभवी/ बुद्धिजीवी मित्रों/ व्यक्तियों के निर्देशों पर बिना सोचे-समझे, उन पर विश्वास करते हुए पालन करना भी एक प्रकार का अंधविश्वास ही है, परन्तु उसका प्रत्यक्ष/ अप्रत्यक्ष रूप सकारात्मकता का है। उनपर अन्धविश्वास या पूर्ण विश्वास करना हमें आंतरिक ऊर्जा प्रदान करता है और जीवन में सफलता की राह पर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करता है। अतः इसे हम सकारात्मक अंधविश्वास की तरह समझ सकते हैं, परन्तु यह अंधविश्वास हमें सकारात्मक ऊर्जा एवं आंतरिक शक्ति प्रदान करता है। इस प्रकार के अंधविश्वास में हमें पूर्ण विश्वास रखना चाहिए और उनके निर्देश को ईश्वर का आशीर्वाद व सन्देश मानकर पालन करना चाहिए।
ईश्वर पर विश्वास करना भी कुछ नास्तिक लोग अंधविश्वास की श्रेणी में लेते हैं, क्योंकि ईश्वर अथवा उससे सम्बंधित किसी तथ्य को हमने व आपने देखा तो है नहीं, बस महसूस किया है और यह एहसास भी हमें हमारे विश्वास के मापदण्ड के अनुसार ही होता है। आज ईश्वर रुपी प्राकृतिक शक्ति/ ब्रह्माण्ड शक्ति का वातावरण में विद्यमान होना वैज्ञानिक प्रमाण है, जोकि एक आध्यात्मिक-विज्ञान है और हर प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी। अब आप और हम पर निर्भर करता है, कि किस तथ्य / वाक्य पर कितना विश्वास करें, चाहें वह पूर्ण विश्वास हो अथवा अंधविश्वास, बस वह उचित हो, सकारात्मक ऊर्जा एवं ज्ञान से परिपूर्ण हो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला हो, जिससे सफलता का मार्ग प्रशस्त हो तथा मानसिक तनाव के स्थान पर मानसिक शान्ति का अनुभव हो सके।
ईश्वर पर विश्वास करना भी कुछ नास्तिक लोग अंधविश्वास की श्रेणी में लेते हैं, क्योंकि ईश्वर अथवा उससे सम्बंधित किसी तथ्य को हमने व आपने देखा तो है नहीं, बस महसूस किया है और यह एहसास भी हमें हमारे विश्वास के मापदण्ड के अनुसार ही होता है। आज ईश्वर रुपी प्राकृतिक शक्ति/ ब्रह्माण्ड शक्ति का वातावरण में विद्यमान होना वैज्ञानिक प्रमाण है, जोकि एक आध्यात्मिक-विज्ञान है और हर प्रकार की सकारात्मक ऊर्जा का स्रोत भी। अब आप और हम पर निर्भर करता है, कि किस तथ्य / वाक्य पर कितना विश्वास करें, चाहें वह पूर्ण विश्वास हो अथवा अंधविश्वास, बस वह उचित हो, सकारात्मक ऊर्जा एवं ज्ञान से परिपूर्ण हो, अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाला हो, जिससे सफलता का मार्ग प्रशस्त हो तथा मानसिक तनाव के स्थान पर मानसिक शान्ति का अनुभव हो सके।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें