रविवार, 15 जनवरी 2017

GOD HUMAN - Insani Ishwar

"इन्सानी ईश्वर"

 

एक सत्य घटना पर आधारित यात्रा चित्र -

 

         यह सुखद घटना वर्ष जून,२००९ की है जब "अंकुर" अपनी हवाई यात्रा के दौरान दक्षिण अफ्रीका में जोहनसबर्ग एयरपोर्ट पर अपनी अगली फ्लाइट की प्रतीक्षा में परेशान व हताश बैठा था। अंकुर को फ्लाइट में प्रवेश के लिए माना कर दिया गया था, जबकि उसके पास अपनी अगली फ्लाइट का टिकट आदि सभी कुछ उपलब्ध था। वास्तव में अंकुर के दोनों पैर अचानक ख़राब (पैरों पर खड़े होने व चलने की शक्ति नहीं रही) हो जाने के कारण व्हील चेयर पर यात्रा कर रहा था। उसके साथ कोई अन्य साथी अथवा सहायक भी नहीं था। दरअसल उसके साथी उसे "मपूटो एयरपोर्ट" (मोजांबिक देश की राजधानी, जहाँ से यात्रा आरम्भ हुई थी) पर ही शुभ यात्रा (Happy Journey) सन्देश के साथ विदा करके अपने-अपने घर वापस लौट चुके थे।
          पहली बार एक "व्हील चेयर मरीज" के रूप में यात्रा कर रहे अंकुर से जोहनसबर्ग एयरपोर्ट पर अगली फ्लाइट में प्रवेश के लिए "मेडिकल रिपोर्ट" की मांग की गई थी, जो उसके पास नहीं थी। जब उसने सोचा कि मपूटो हॉस्पिटल, जहाँ फर्स्ट ऐड के दौरान भर्ती हुआ था, फ़ोन-ईमेल आदि की सहायता से मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध करवा दी जाये, तो उसमे भी कम से कम ४८ घण्टों का समय लगना था, जबकि दूसरी ओर उस फ्लाइट को रवाना होने में मात्र ३ घण्टों का समय ही शेष था। अब तो अंकुर को आगे की यात्रा कर पाना सम्भव नहीं लग रहा था। एक ओर ४८ घण्टों तक जोहनसबर्ग एयरपोर्ट पर वेटिंग पैसेंजर के रूप में अकेले रुकना तथा दूसरी ओर अगले २ घण्टे ५९ मिनट में मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध करवा पाना, दोनों ही कार्य उस समय असम्भव ही थे, जबकि ठीक उसी समय एयरपोर्ट का "काउन्टर ड्यूटी सहायक" अपनी उस दिन की सेवाएं समाप्त करके, अपने अन्य साथियों को आगे का कार्य भार सौंप रहा हो। अब बेचारे अंकुर के पास एक ही रास्ता शेष था, कि वह सच्चे मन व पूर्ण श्रद्धा से अपने ईष्ट/ ईश्वर को पुकारे और सहायता की मांग करे।
          अंकुर, जो अपने पैरों पर खड़े होने व चलने की शक्ति खोने के साथ-साथ मल-मूत्र त्यागने की शक्ति-आभास सभी कुछ पूर्ण रूप से खो चुका था, उसका नाभि के नीचे, दोनों पैरों तक लगभग सुन्न हो चुका था। यूरिनल पाइप और डाइपर लगा हुआ था। व्हील चेयर पर पहली बार और वह भी बिना किसी सहायक/ साथी के, अपने हाथों में केवल पासपोर्ट-टिकट-बोर्डिंग पास तथा डॉक्यूमेंट फाइल लिए, कभी ऊपर की ओर देखता, कभी नज़रें नीचे करके सोचता, तो कभी इधर-उधर नज़रें घुमाकर देखता, कि इस अचानक हुए अपाहिज को, उस अनजान जगह पर कोई तो सहायक मिले। कदाचित ईश्वर स्वयं प्रकट होकर अंकुर के सहायक बने और अर्जुन के सारथी की भांति उसको भी कोई रास्ता सुझाएँ। तभी अचानक एक झटका सा लगा, मानो पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई हो और एक महिला ने अचानक अंकुर के पास आकर, उसकी व्हील चेयर को पीछे की और खीचते हुए उससे, उसका परिचय पूछते हुए हाल जानने का प्रयास किया। यह वो पल था, जब अंकुर को लगा, जैसे उसकी प्रार्थना ईश्वर ने स्वीकार कर ली और स्वयं दर्शन देने व उसकी सहायता के लिए ही वहाँ उसके पास प्रकट हुए हों। वह महिला, बीच में खड़ी व्हील चेयर को, जिस पर अंकुर बैठा था, बोर्डिंग पास काउन्टर की पंक्ति/ अहाता पर से एक किनारे करने के लिए आई थी।
         अनजान जगह, अकेला अपाहिज, अपनी परेशानियों की उलझनों में उलझा, परेशान व हताश 'अंकुर' कुछ सोचने व समझने में असमर्थ, आवेश में आकर उसने उस महिला को 'दीदी' (Elder Sister) कह कर संबोधित किया और वह एक सुखद गलती कर बैठा। बस फिर क्या था, अंकुर की उस अनजान 'अफ़्रीकी दीदी' ने उसे साँस रहने तक का कर्ज़दार/ ऋणी बना दिया। दीदी का नाम 'सुजैन' था। वह दक्षिण अफ्रीका के जोहनसबर्ग एयरपोर्ट पर एक महिला कर्मचारी के रूप अटेंडेंट के पद पर कार्यरत थी, जो उस वक्त "इंसानी ईश्वर"/ God Human, के रूप में अंकुर के समक्ष प्रकट हुई थी। उसके डेली ड्यूटी समाप्त हो चुकने के बाद भी 'सुजैन दीदी ने वहां रुक कर अंकुर की निःस्वार्थ भाव से आवश्यक सहायता की। उस अनजान जगह पर एक बेहतर सुविधाजनक हवाई यात्रा प्रतीक्षा भवन/ Travelers' Waiting Room, उपलब्ध करवाया व अपने भाई अंकुर को सुव्यस्थित कमरे में ले गई, स्वयं गोद में उठाकर व्हील चेयर से बिस्तर पर लिटाया। भरे हुए यूरिन बैग को स्वयं खाली भी किया। भाई अंकुर लिए जूस-भोजन आदि की व्यवस्था भी की। उसी वक्त सुजैन दीदी के पति का फ़ोन कॉल आया, क्योंकि वह अपने निर्धारित समय पर घर नहीं पहुची थी, और वह घर अपनी पत्नी की प्रतीक्षा कर रहे थे, जबकि 'सुजैन' अपने भारतीय भाई की सेवा में व्यस्त थी। अतः अब सुजैन दीदी ने वहाँ एयरपोर्ट पर अपने सहायक कर्मचारी को 'अंकुर' की सहायता की जिम्मेदारी सौंपी, भाई अंकुर को शीघ्र स्वस्थ होने का आशीर्वाद देते हुए परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना की और वहां से भाव-भीनी विदाई ली।
          यह सब सुजैन दीदी ने अपने उस भारतीय भाई के लिए किया था, जिससे वह पहले कभी नहीं मिली थी। जोहनसबर्ग एयरपोर्ट पर यह उनकी पहली और कदाचित अंतिम मुलाकात थी। यदि हम परमपिता परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सच्चे-निर्मल मन से उन्हें याद करते हैं तो वही परमपिता  परमेश्वर किसी न किसी रूप में, अपनी संतान की सहायता करने अवश्य आते हैं। वह किसी भी प्राणी अथवा जीव के रूप में कभी भी-कहीं भी प्रकट होकर हमारे सहायक होते हैं।
 
                  भारतीय भाई 'अंकुर' की अफ़्रीकी दीदी 'सुजैन' को शत-शत नमन। 

                                                       !!*****!!

सत्य यात्रा चित्र की हृदयस्पर्शी रचना 'इन्सानी ईश्वर', इन्सानियत के प्रति अंतर्मन को छूती हुई एक संवेदात्मक अभिव्यक्ति है। 

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