रविवार, 16 फ़रवरी 2014

The Logic of 33 GODs

३३ …………… देवी-देवता 

३३ करोड़ / 
३३ लाख / 
३३ हजार / 
३३ कोटि .... या फिर, कितने ?

इस प्रकार कई पूजनीय देवी-देवताओं के बारे में तरह-तरह की मान्यतायें लोगों में व्याप्त हैं, परन्तु इसके पीछे वास्तविक रहस्य क्या है? जब मैंने इस तथ्य के बारे में अपनी जिज्ञासा शांत करने के उद्देश्य से पवित्र एवं ज्ञानवर्धक पुस्तकों का अध्ययन किया, तो कुछ ऐसा सामने आया जो उचित व सर्वमान्य है। 

मैनें अपने पिछले ब्लॉग में "भगवान्" का अर्थ व उसका पूर्ण समावेश, प्रकृति के पाँच तत्वों से बने शरीर में होने की बात कही है, मगर यह क्या, यहाँ तो कुछ और भी सामने आ गया। 

जी हां, केवल "भगवान्" ही नहीं बल्कि उपरोक्त ३३ करोड़ देवी-देवताओं का प्रत्यक्ष वास है हमारे मानव शरीर में ! यह कोई अचम्भे की बात नहीं है, वरन् सोचने व समझने की बात है, कि आखिर कैसे ?

३३ देवताओं का वास्तविक अर्थ व तर्क प्रमाण सहित निम्नलिखित है -

१). शरीर शास्त्र तथा विज्ञान के अनुसार हमारा सम्पूर्ण शरीर पूर्ण रूप से केवल "मेंरुदण्ड" या "स्पाइनल कॉर्ड" पर टिका है जो कई अस्थिओं व घटकों से मिल कर बनी हुई सर्पाकार पोली डंडी है, जिस पर शरीर का प्रत्येक कशेरू टिका और सूत्रों से कसा हुआ है। यह अस्थि समूह कुल पाँच भागों में विभाजित है -

           १. ग्रीवा - स्पाइनल रीज़न -                   ७ अस्थियाँ   -   7
           २. वक्ष - डॉर्सल रीज़न -                       १२ अस्थियाँ   - 12
           ३. कटि - लम्बर रीज़न -                        अस्थियाँ    -  5
           ४. त्रिक - वस्तिगृह्वर - सैक्रल रीज़न -        अस्थियाँ   -  5
           ५. चेंचु - क़ॉक्सीजियल -                        अस्थियाँ    -  4
                                                                                   -------
                                                                                      33 .

हमारे शरीर की सभी नाड़ियां इसी पोले अस्थि खण्डों से होकर गुजरती हैं। यह लचीला और अपनी धुरी पर हर दिशा में घूमने में सक्षम व शरीर का प्रमुख आधार है। इन पाँच प्रकार के तैंतीस खण्डों के इसी समूह को वास्तव में ३३ देवता कहा गया है और इनमे सन्निहित क्षमता को दैवीय शक्ति की मान्यता दी गई है। 

-- वेदमूर्ति पं० श्री राम शर्मा आचार्य
शांतिकुंज, हरिद्वार


२). यज्ञ करते समय ऋग्वेद की जिन ऋचाओं का उच्चारण करके देवताओं का आह्वाहन व स्तुति की जाती  है, उनमें से मात्र एक का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है -
            
           "आप सभी ३३ देवता हमारे इस पावन यज्ञ में मधुपान के लिए पधारें। हमारी आयु बढ़ाएं और हमारे 
            पापों को भली-भांति विनष्ट करें। हमारे प्रति द्वेष की भावना को समाप्त करके, सभी कार्यों में
            सहायक बनें।"  

- ऋग्वेद संहिता -१ (सूक्त-३४/११-४०९/४८)


ऋषि-मुनि, संत-महात्मा आदि "कुण्डलिनी जागरण" की प्रक्रिया के दौरान अपनें शरीर की इन्ही दैवीय शक्तिओं को उजागर करने का प्रयास करके ब्रह्माण्ड के सभी ३३ देवी-देवताओं का ही आत्मदर्शन करते हैं। 

यह मंगलमयी मोक्ष प्रदायनी कुण्डलिनी ३३ देवी-देवताओं के रूप में हमारे शरीर में प्रत्यक्ष रूप से विराजमान है। 


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