बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

Kinds of Human Bath

स्नान/ Bath - 

आपने तरह तरह के स्नानों के बारे में सुना व पढ़ा होगा। साधारणतया तीन प्रकार के स्नान होते हैं, पहला जन्म के समय, दूसरा विवाह के समय व तीसरा मृत्यु होने पर। 
बिना स्नान किये पुरुष अथवा नारी जप, तप, पूजा, हवन आदि करने के अधिकारी नहीं होते। प्रातः काल का स्नान आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण बताया गया है। स्नान से शरीर में चुस्ती व स्फूर्ति आती है। मन तरोताजा रहता है।  मानव जीवन की दैनिक दिनचर्या में आठ प्रकार के स्नानों का वर्णन निम्नलिखित है - 

  1. नित्य 
  2. नैमित्तिक 
  3. काम्य 
  4. क्रियांग 
  5. मलापकर्षण 
  6. मार्जन 
  7. आचमन 
  8. अवगाहन 

  1. नित्य स्नान - प्रातः काल का स्नान आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। रात कि निद्रा आलस हटाने व शरीर में स्फूर्ति लाने के लिए किये गए इस स्नान  को "नित्य स्नान" कहते हैं। यह स्नान हमें प्रातः काल नियम पूर्वक रोज़ ही करना चाहिए।  इससे मन प्रसन्न रहता है व दिन की शुरुआत भी अच्छी होती है। 
  2. नैमित्तिक स्नान - शव, चाण्डाल, विष्ठा तथा रजस्वला का स्पर्श करने के बाद जो स्नान किया जाता है, उसे "नैमित्तिक स्नान" कहते हैं। 
  3. काम्य स्नान - ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पुष्य आदि नक्षत्रों में जो स्नानादिक कृत्य किया जाता है, वह "काम्य स्नान" कहलाता है। निष्काम व्यक्ति को इस प्रकार का स्नान नहीं करना चाहिए। 
  4. क्रियांग स्नान - जब मनुष्य पूजा, हवन, होमादिक कृत्यों को सम्पन्न करने की इच्छा से प्रेरित होकर अथवा कोई अन्य पवित्र कृत्य, देवता या अतिथि आदि का पूजन-सत्कार इत्यादि करने की इच्छा से सम्पूर्ण स्नान करता है, ऐसे पवित्र भावना से किये गए स्नान को "क्रियांग स्नान" की संज्ञा दी गई है। 
  5. मलापकर्षण स्नान - शारीरिक मल को दूर करके साफ़ करने के उद्देश्य से सरोवर, देवकुण्ड या तीर्थ नदियों में किया गया स्नान "मलापकर्षण स्नान" है। सामान्य जल से स्नान करने पर केवल शरीर की ऊपरी शुद्धि होती है और पवित्र-तीर्थ स्थानों के जल से शरीर का बाह्य एवं आंतरिक रोम-रोम शुद्ध हो जाता है और विशष्ट फल की प्राप्ति होती है।   
  6. मार्जन स्नान - मुख्य रूप से स्नान के निमित्त विहित मन्त्रों द्वारा मार्जन करने से मनुष्य का पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाता है। इस स्नान को ही "मार्जन स्नान" कहते हैं। 
  7. आचमन स्नान - पूजन-हवन अथवा अन्य किसी पवित्र कार्य को करने से पूर्व इंद्रियों सहित पूरे शरीर को पवित्र करने की भवना से पवित्र गंगा जल द्वारा की गई आचमनादि क्रियाओं को "आचमन स्नान" की संज्ञा दी गई है। 
  8. अवगाहन - ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विशेष तिथियों एवं गृह-नक्षत्रों में किसी विशिष्ट कार्य की पूर्ती हेतु अथवा देवता विशेष के लिए किया गया स्नान "अवगाहन स्नान" कहलाता है। दिन, तिथि व समय के अनुसार अवगाहन स्नान के अत्यंत रूप तथा नियमादि होते हैं। 
तीर्थों के जल का अभाव होने पर उष्ण जल अथवा अन्य किसी प्रकार से प्राप्त कृत्रिम जल से स्नानादि क्रियाएँ सम्पन्न कर लेनी चाहिए। यूं तो भूमि से निकला हुआ जल पवित्र होता है। पर्वतों, झरनों, नदिओं अथवा सरोवर आदि का जल भी पवित्र होता है। इन सभी जलों में तीर्थ स्थान का जल अत्यन्त शुभ व पवत्र माना जाता है और अपेक्षाकृत इनसे भी अधिक श्रेष्ठ, पापनाशक, पुण्य प्रदायक व परम पवित्र तथा निर्मल जल "गंगा जल" का स्थान सर्वोपरी है। 

- गरुड पुराण (आचार काण्ड - ३७७)




कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें