वैचारिक मित्रता / CONCEPTUAL FRIENDSHIP - "विचार मित्रता का आधार"
हमारे विचार सजीव से निर्जीव में प्रवेश कर सकते हैं और विचारों की अनदेखी तरंगों से कोई भी हमारा मित्र बन सकता है। एक जीवित इंसान का परम मित्र एक जानवर ही नहीं वरन एक पौधा भी हो सकता है, शायद इसीलिए पेड़-पौधों को एक स्थान पर स्थिर होने के बावजूद भी सजीव की श्रेणी में रखा गया है। हमारी पुस्तक अथवा कोई प्रिय स्थान भी मित्र की श्रेणी में आ सकता है, क्योंकि विचार शक्ति सभी जगह व्याप्त है। जैसा हम सोचते है, विचार रखते व व्यवहार करते हैं. वैसे ही मित्रों/ दोस्तों व वस्तुओं को आकर्षित भी करते हैं।
एक समय वह आता है जब बिना कुछ कहे, हम सब समझ जाते हैं और सब कुछ कह देने अथवा सुनने के बाद भी हमें कुछ बुरा नहीं लगता। इसमें अधिकता होने के उपरांत तो हम भाव बोध के उस स्तर तक पहुँच जाते हैं, जिसमे केवल सोचने मात्र से हमें अपने उस परम मित्र के सापेक्ष होने का अनुभव होता है और कभी-कभी तो हमारे और उसके विचार शारीरिक रूप से दूर होने पर भी प्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ होते हैं, हमारा समर्थन करते हैं, बल्कि हमारे पास होने का प्रमाण भी दे देते हैं यह प्रमाण किसी भी रूप में हो सकता है, जैसे - अचानक पत्र या सूचना का प्राप्त होना, Phone Call, SMS, E-mail etc. बहुत समय तक एक ही शीर्षक पर बात करना और कुछ समय के बाद एक सा व्यवहार, एक सी पसंद, एक सी सोच और अपने मित्र के लिए कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत व ताकत का स्वतः उत्पन्न हो जाना आदि, यह सब हमारी "वैचारिक मित्रता" का ही एक अंश है, जिसे हमने कई प्रकार के नाम दे दिए हैं, जो ऊपर वर्णित हैं ।
किसी भी धर्म अथवा जाति का आस्तिक व्यक्ति अपने ईष्ट को बिना देखे, बिना मिले केवल विचारों से, उसकी उपस्थिति को महसूस करके उसे अपना परम व उत्तम मित्र बनाता व पूरी निष्ठा से मानता भी है। यही है CONCEPTUAL FRIENDSHIP का Concept, Base and Meaning.
मित्र, दोस्त - मित्रता, दोस्ती आदि शब्दों से और उनके तरह - तरह के अर्थों से आप भली भाँति परिचित हैं। मित्र शब्द का अर्थ और भावनात्मकता को अनेकों विद्वानों ने व आजकल के युवाओं ने कई तरह से अपनाया, समझाया व परिभाषित भी किया है। बिना किसी मित्र के हमारी जीवन शैली बस एक प्रकार की अनजानी सी साँस प्रतीत होती है। हम सांस लेते हैं, जीवन जीते हैं, सबको जानते हैं और कुछ को जानने का प्रयास करते हैं, परन्तु मित्र (दोस्त) ही एक ऐसा माध्यम है जो आपको आपसे व आपके व्यवहार से रूबरू करवाता है और प्रत्येक कदम पर मील का पत्थर साबित होता है। आपको आपसे परिचित करवाने वाला वह दोस्त/ मित्र किसी भी संज्ञा में हो सकता है। मेरे अध्यन के अनुसार कुछ दोस्तों के प्रकार निम्नवत हैं, आशा करता हूँ कि निम्न लिखित दोस्तों के बारे में समझाने के लिए अधिक परिभाषित करना आवश्यक नहीं है।
- New Friend
- Old Friend
- Wild Friend
- Sweet Friend
- Ex-Friend
- Scary Friend
- Confidant Friend
- The Boss Friend
- Travel Friend (One Time)
- Travel Friend (Regular in Bus-Train-Plane etc.)
- Road Trip Friend
- Single Modifier Friend
- Email/ Letter Friend (Pen-Pal)
- Special Interest Friend
- Secondhand Friend
- Friend's Friend
- Dormant Friend
- The Soul Mate
- The Classmate
- The Colleagues
- The Friend you only Drink with Friend
- Treatment Friend
- The Friends with Benefits
- Close Friend
- The Best Friend
- Intellectual Friend
- Fighting Friend (normal fight as a Game Style)
- Fun Friend (Game-Play-Club-Society etc.)
- The Mom Friend (Mother)
- The Dad Friend (Father)
- Brother Friend (Younger/ Elder/ Older)
- Sister Friend (Younger/ Elder/ Older)
- Talker Friend
- Listener Friend
- The Inspiration Friend
- The Scene Friend
- The Book Friend
- The Teacher Friend
- Storyteller Friend
- Swinger Friend
- The Husband Friend
- The Wife Friend
- The Boy Friend
- The Girl Friend
- The Love Friend ...... Etc. etc. आदि इत्यादि।
उपरोक्त वर्णित दोस्तों के अलावा भी कई तरह के दोस्त हमारे आपके जीवन में होते होंगे, परन्तु ध्यान देने के साथ साथ समझने वाली बात यह है कि मित्र चाहें किसी भी प्रकार का क्यों न हो, केवल विचारों से ही बनता और बिगडता है और मित्रता में घनिष्ठता एवं प्रगाढ़ता विचारों के तालमेल से ही आती है। अब बात आती है कि क्या होता है "विचार" और "विचारों का तालमेल" ? कैसा होता है और कैसे होता है ?
"विचार" का तात्पर्य हमारे अंदर की सोच एवं जाना-अन्जाना व्यवहार तथा अनदेखे सच का वह रूप है जो प्रत्यक्ष रूप से बाहर आता तो है परन्तु उसका दर्शन आपको केवल और केवल आपका कोई मित्र ही करा सकता है। वैसे तो यह आत्म मंथन और आत्म चिंतन के द्वारा भी जाना जा सकता है और यह कार्य करने वाले को हम अक्सर गुरू की संज्ञा में रखते हैं, परन्तु मित्र भी इस क्रिया का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष कर्ता हो सकता है।
गुरू हमारा परम मित्र हो सकता है और मित्र एक उच्चतम गुरू का स्थान ले सकता है। - "चित्रांश"
अब बात करते हैं "विचारों के तालमेल" की, यह तो एक ऐसे विश्वव्यापी आंतरिक सत्य की वह क्रिया है जो समय और अभ्यास के परस्पर मिलन से स्वतः ही उत्पन्न हो जाती है। जिसको हम समझते हुए भी नासमझी में ही रहते हैं। प्रेम शब्द का उद्गम भी यहीं से होता है। हमारा अवचेतन मन, हमारी चेतना हमारे उस मित्र व उसके विचारों को अपने आप ही आकर्षित करती है, स्वीकार करती है। वह प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष रूप से, जाने-अनजाने में आपको उस व्यक्ति, वस्तु अथवा कथित दोस्त से जोड़े रखती है। आपको बार-बार उसके बारे में सोचने पर मजबूर करती है, उससे मिलने व बात करने के लिए प्रेरित करती है। वास्तव में यही है, विचारों का तालमेल या विचारों का समन्वय या विचारों की सहमति।
ऐसी क्रियाएँ कुछ तो आंतरिक-मानसिक रूप से स्वतः होती हैं और कुछ हम जान बूझकर समायोजन की दृष्टि से भी करते हैं। जिनमें समय के साथ-साथ प्रगाढ़ता होने लगती है। दो विचारों में घनिष्ठता उत्पन्न हो जाती है। हमें शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक या आत्मिक शांति के लिए उसी विचार के दोस्त की जरूरत हर समय महसूस होने लगती है, जैसे हमारे विचार होते हैं। हमारी यह भूख/ क्षुधा केवल वही दोस्त शांत कर सकता है, जिसके विचार हमारे उन विचारों से मिलते हैं अथवा जिसका चेतन मन हमारी चेतना में रिहायशी हो जाता है, उनकी आवश्यकता हमें उस समय होती है, हमें उनके पास होने, उनसे संपर्क करने के लिए तड़पाती है । किसी एक मित्र के कई विचारों का समावेश उसके एक मित्र में हो सकता है और प्रत्येक विचार के लिए एक पृथक मित्र भी हो सकता है। हम एक से अधिक मित्रों के साथ विचारों में तालमेल स्थापित कर सकते हैं, जो कि हमारी वैचारिक शक्ति और व्यवहार पर निर्भर करता है।
हमारे विचार सजीव से निर्जीव में प्रवेश कर सकते हैं और विचारों की अनदेखी तरंगों से कोई भी हमारा मित्र बन सकता है। एक जीवित इंसान का परम मित्र एक जानवर ही नहीं वरन एक पौधा भी हो सकता है, शायद इसीलिए पेड़-पौधों को एक स्थान पर स्थिर होने के बावजूद भी सजीव की श्रेणी में रखा गया है। हमारी पुस्तक अथवा कोई प्रिय स्थान भी मित्र की श्रेणी में आ सकता है, क्योंकि विचार शक्ति सभी जगह व्याप्त है। जैसा हम सोचते है, विचार रखते व व्यवहार करते हैं. वैसे ही मित्रों/ दोस्तों व वस्तुओं को आकर्षित भी करते हैं।
एक समय वह आता है जब बिना कुछ कहे, हम सब समझ जाते हैं और सब कुछ कह देने अथवा सुनने के बाद भी हमें कुछ बुरा नहीं लगता। इसमें अधिकता होने के उपरांत तो हम भाव बोध के उस स्तर तक पहुँच जाते हैं, जिसमे केवल सोचने मात्र से हमें अपने उस परम मित्र के सापेक्ष होने का अनुभव होता है और कभी-कभी तो हमारे और उसके विचार शारीरिक रूप से दूर होने पर भी प्रत्यक्ष रूप से हमारे साथ होते हैं, हमारा समर्थन करते हैं, बल्कि हमारे पास होने का प्रमाण भी दे देते हैं यह प्रमाण किसी भी रूप में हो सकता है, जैसे - अचानक पत्र या सूचना का प्राप्त होना, Phone Call, SMS, E-mail etc. बहुत समय तक एक ही शीर्षक पर बात करना और कुछ समय के बाद एक सा व्यवहार, एक सी पसंद, एक सी सोच और अपने मित्र के लिए कुछ भी कर गुजरने की हिम्मत व ताकत का स्वतः उत्पन्न हो जाना आदि, यह सब हमारी "वैचारिक मित्रता" का ही एक अंश है, जिसे हमने कई प्रकार के नाम दे दिए हैं, जो ऊपर वर्णित हैं ।
पति-पत्नी, गुरू-शिष्य, पिता-पुत्री, माता-पुत्र, भाई-बहिन तथा मित्र-मित्र आदि, कोई भी रिश्ता क्यों ना हो, यहाँ तक कि प्रेम भी हमारी सोच व विचारों से ही उत्पन्न होता है और एक आलौकिक आनंद का अनुभव कराता है। दोस्ती/मित्रता/प्रेम की आयु व घनिष्ठता दोनों के परस्पर "विचारों के तालमेल" तथा "समायोजन" पर निर्भर करती है। विचारों के आदान-प्रदान से व उसकी निरंतरता से घनिष्ठता उत्पन्न होती है, और ऐसे ही समायोजन से हमारी दोस्ती एक अंजाना सा, अनूठा आनन्द देने वाला रिश्ता कायम करती है, जिसे कभी तो हम नाम दे सकते हैं और कभी कोई नाम भी नहीं दे पते। विचारों से ही मित्रता की उम्र लम्बी होने के साथ-साथ अमरत्व को प्राप्त करती है। दोस्त, दोस्त होता है, उसका तो कोई लिंग ही नहीं होता उसे तो उभय लिंग में रखा जाता है यानि Common Gender. प्रत्येक प्रकार की मित्रता, एक प्रकार की "वैचारिक मित्रता" ही है, तथा हमारे विचारों से ही उसे संज्ञा/ नाम प्राप्त होता है। वरना निर्जीव-सजीव, स्त्री-पुरुष, युवा-बुजुर्ग सभी से परे है यह मित्रता।
- श्री राधा रानी व भगवान श्री कृष्ण में कोई रिश्ता न होते हुए भी एक घनिष्ठता, आत्मिक प्रेम व वैचारिक मित्रता का ही बोध होता है। जिसका वर्णन करने की ताकत और हिम्मत मेरी कलम में नहीं है।
- जब सुदामा जी ने श्री कृष्ण से कहा मित्रता का असली "मतलब" क्या है..... श्री कृष्ण ने हँस कर उत्तर दिया "जहाँ मतलब होता है वहाँ मित्रता कहाँ होती है?"
- जब सुदामा जी ने श्री कृष्ण से कहा मित्रता का असली "मतलब" क्या है..... श्री कृष्ण ने हँस कर उत्तर दिया "जहाँ मतलब होता है वहाँ मित्रता कहाँ होती है?"
किसी भी धर्म अथवा जाति का आस्तिक व्यक्ति अपने ईष्ट को बिना देखे, बिना मिले केवल विचारों से, उसकी उपस्थिति को महसूस करके उसे अपना परम व उत्तम मित्र बनाता व पूरी निष्ठा से मानता भी है। यही है CONCEPTUAL FRIENDSHIP का Concept, Base and Meaning.
विचार मित्रता का आधार हैं, और मित्र उन्नति का द्वार हैं। - "चित्रांश"
अच्छे, सुन्दर, शुद्ध, मधुर, सात्विक, परोपकारी और उत्तम विचार वालों को वैसे ही मित्र और उनकी मित्रता का आत्मिक आनंद प्राप्त होता है। अतः उत्तम विचारों वाले मित्रों से ही मित्रता निभाएँ, और यदि आप के विचारों में विकार उत्पन्न हो रहा हो, तो अपने प्रत्येक मित्र की सलाह एवं विचारों का सम्मान करें।
जिसके साथ आप रहते हैं, उसके जैसे हो जाते हैं।
The Friends don't let you do stupid things, always careful for their friends in Good as well as Bad acts also.
सब विचारों का खेल है, मित्रों ।.… ….
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