Everybody waits for Anyone.
हर कोई, किसी एक के लिए इंतजार करता है।
सुन कर कुछ अजीब सा लगता है, कि "हर कोई, किसी एक के लिए इंतज़ार करता है।"
जी हाँ, यह उतना ही सत्य एवं अनुभव किया हुआ वाक्या है, जितना कि आप स्वयं महसूस कर सकते हैं।
1. घर पर परिवार के सदस्यों का किसी एक सदस्य के लिए भोजन पर इंतज़ार।
2. School-Office जाने के लिए अपने-अपने मित्रों व साथियों का इंतज़ार।
3. Self-Study के लिए अपने महत्वपूर्ण सहपाठी का इंतज़ार।
5. किसी Party में जाने के लिए मित्रों का इंतज़ार।
6. Railway Plate-Form पर Train के आने, रूकने व दोबारा चलने का इंतज़ार।
7. Railway Crossing पर Train के गुजर जाने का इंतज़ार।
8. परीक्षा परिणाम के घोषित होने का इंतज़ार।
9. चालू सरकार गिरने व नई सरकार बनने का इंतज़ार।
10. प्रत्येक Monday को Nest Sunday का इंतज़ार। .... आदि
उपरोक्त के अलावा भी प्रत्येक व्यक्ति किसी ना किसी प्रकार के इंतज़ार में लिप्त रहता ही है, परन्तु मैं यहाँ एक ऐसी प्रतीक्षा (इंतज़ार) के बारे में ज़िक्र करना चाह रहा हूँ, जो आप सुन कर समझ तो लेंगे, परन्तु उसका वास्तविक आनन्द तो महसूस करने से ही मिलेगा।
एक निर्जीव वस्तु भी सजीव के सम्पर्क में आने से सजीव हो उठती है। - "चित्रांश"
एक मकान, घर तभी बनता है, जब उसमें इंसान का वास होता है। चाहर दीवारों से घिरी, गुम्बज़ के नीचे स्थापित की गई एक मूर्ति का स्थान, मन्दिर के रूप में तभी जाना-पहचाना जाता है जब वहाँ सजीवों का आवागमन होता है अथवा महसूस किया जाता है। हम अपने विचारों व मन की शक्ति एवं आत्मविश्वास से ही निर्जीव को सजीव बना देते हैं तथा सजीव को निर्जीव की तरह रहने पर मजबूर कर देते हैं।
यदि मैं कहूँ कि निर्जीव में भी प्राण होते हैं, तो यह कोई नहीं स्वीकारेगा। परन्तु यदि आप महसूस करेंगे तो पाएंगे कि मैंने प्रमणित सत्य ही लिखा है। बच्चों के लिय उनके खिलौनों में, पुस्तक प्रेमियों के लिए पुस्तकों में, एक लेखक के लिए उसकी कलम में, योद्धा के लिए उसके हथियारों में, शिल्पकारों के लिए उनके औज़ारों में, माली को अपने बगीचे के प्रत्येक पौधे एवं पुष्प से, चरवाहे को अपने मवेशियों में और प्रकृति प्रेमियों के लिए तो प्रकृति की हर वस्तु व स्थान में, निर्जीव हो या सजीव, प्राण होते हैं। यह सभी अपने-अपने तरीके से अपनी अमुक वस्तुओं अथवा साथियों से वाकायदा वार्तालाप करने के साथ अपने सुख-दुःख का प्रत्यक्ष साथी भी मानते हैं।
हमने कई लेखों में पढ़ा है कि जहाँ पर हम अक्सर जाया करते हैं, वहाँ की आवोहवा भी हमारा इंतज़ार करती है और हमारे वहाँ पहुँचने पर उस स्थान का वातावरण, दो अंजान प्रेमियों के आत्मिक मिलन के अनुूठे सुख की अनुभूति करते हुए और-अधिक सुहावना व खुशनुमा हो जाता है। इंसान का समुद्र के मगरमच्छ से दोस्ताना, नदी की मछलियों से मित्रता, जंगली जानवरों से अपने पन का अहसास, पेड़-पौधों से बातचीत का अनुभव आदि किस्से उतने ही सत्य हैं, जितना कि ईश्वर की उपस्थिति। मानो तो सब है, न मानो तो कुछ भी नहीं। जिस प्रकार हम उपरोक्त को अपनाते हुए जीवन यापन करते हैं, ठीक उसी प्रकार वे सब भी हमें अप्रत्यक्ष रूप से अपना बना लेते हैं और ठीक उसी पल का इंतज़ार करते हैं, जब उनका अंजाना एवं अपना आएगा और उनसे अपनी ही किसी भाषा में बतियायेगा। अपने और मेरे सुख-दुःख बांटेगा।
मन्दिर की मूर्ति भी अपने विश्वास-भक्त के आगमन तथा उसके प्रिय हाथों से प्रसाद ग्रहण करने के लिए इंतज़ार करती है। इसीलिए कहा जाता है कि जिस मन्दिर में या जिस मूर्ति पर आप विश्वास रखते हैं, एक निश्चित स्थान, दिन व समय पर प्रसाद चढ़ाते व भोग लगाते हैं, उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि वह स्थान, वह मूर्ति आपकी अमुक समय पर प्रतीक्षा कर रही होती है, और यदि किसी कारण वश, आप वहाँ नहीं पहुँच पाते हैं, तो मन ही मन उसे याद करके, वहाँ पर अपनी उपस्थिति को दर्ज कराते हुए महसूस करें। चेतना में धारण करें। विश्वास करें कि आप, उस पल वहाँ उपस्थित हैं, क्योंकि वो पल भी आपके वहाँ होने का इंतज़ार कर रहा होता है।
अधिक न लिखते हुए अंत में केवल यही कहूँगा, कि जन्म को मृत्यु का तथा मृत्यु को पुनः जन्म का इंतज़ार होता है, परन्तु यह कभी मिल नहीं पाते।
मन्दिर की मूर्ति भी अपने विश्वास-भक्त के आगमन तथा उसके प्रिय हाथों से प्रसाद ग्रहण करने के लिए इंतज़ार करती है। इसीलिए कहा जाता है कि जिस मन्दिर में या जिस मूर्ति पर आप विश्वास रखते हैं, एक निश्चित स्थान, दिन व समय पर प्रसाद चढ़ाते व भोग लगाते हैं, उसे कभी नहीं छोड़ना चाहिए, क्योंकि वह स्थान, वह मूर्ति आपकी अमुक समय पर प्रतीक्षा कर रही होती है, और यदि किसी कारण वश, आप वहाँ नहीं पहुँच पाते हैं, तो मन ही मन उसे याद करके, वहाँ पर अपनी उपस्थिति को दर्ज कराते हुए महसूस करें। चेतना में धारण करें। विश्वास करें कि आप, उस पल वहाँ उपस्थित हैं, क्योंकि वो पल भी आपके वहाँ होने का इंतज़ार कर रहा होता है।
जिस प्रकार इन्सान को अपने मित्रों का इंतज़ार रहता है, उसी प्रकार जानवरों व पक्षियों को भी अपने साथियों का इंतज़ार रहता है तथा जिस प्रकार एक दास को अपने स्वामी तथा ईश्वर भक्त को अपने ईष्ट के दर्शन का इंतज़ार रहता है ठीक उसी प्रकार मन्दिर के ईश्वर भी अपने भक्त के आने की प्रतीक्षा करते हैं।
इंतज़ार को मिलन में बदल देने से दोनों को ही एक आलौकिक आनन्द की अनुभूति होती है। - "चित्रांश"
किसी को कभी इंतज़ार न करवाएं, निश्चित स्थान, दिन व समय पर अवश्य उपस्थित हों, क्योंकि निर्जीव हो या सजीव "हर कोई, किसी एक के लिए इंतज़ार करता है।"
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