सकारात्मक विचार / सकारात्मक सोच
बहुत से ज्ञानिओं और लेखकों ने सकारात्मक सोच पर अपनी लेखनी की स्याही द्वारा सकारात्मक भावों का और सकारात्मकता का कलात्मक शब्द चित्रण किया है। मैं भी अपने इस ब्लॉग के माध्यम से कुछ ऐसा ही करने का प्रयास कर रहा हूँ।
सकारात्मक/ धनात्मकता का चिह्न् '+' (Plus) अथवा नकारात्मक/ ऋणात्मक चिह्नों '-' ; '-' (Minus) का संयुक्त मिश्रण। तात्पर्य है कि सकारात्मकता का रास्ता नकारात्मकता के रास्ते से होकर ही गुजरता है, परन्तु यह हमारे अपने दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि दो से ज्यादा नकारात्मक विचारों को हम आने ही न दें। वैसे तो एक नकारात्मक विचार ही पूरी सकारात्मक सोच का बंटा धार करने में सक्षम है, परन्तु यदि इसका प्रयास बीज गणित के शुरुआती सबक के अनुसार चिह्नों के महत्व को समझते हुए कुछ इस तरह से किया जाये कि जिसकी बारम्बारता अधिक होगी या जिस चिह्न का मूल अंक बड़ा होगा वही उत्तर का स्वामी चिह्न कहलायेगा।
उदाहरण के लिए : 7a - 3a = +4a तथा 4a - 8a = -4a
अक्सर बुराई आसान व हमारी पहुँच में होती है और अच्छाई कठिन होने के साथ साथ दूर भी होती है। उसी प्रकार नकारात्मक विचारों को आसानी से समझा जा सकता है अब प्रश्न उठता है कि "सकारात्मकता" का क्या अर्थ है उसका वास्तविक स्वामी क्या है? तो मेरे विचारों में "सकारात्मकता वह है जो आपको ख़ुशी प्रदान करे जो आपको हर पल खुश रहने का एहसास दिलाये आपको आंतरिक रूप से सकारात्मक बनाये।"
एक प्रकार की स्थिरता, ठहराव को हम सकारात्मक सोच की श्रेणी में रख सकते हैं। अर्थात दुःख में और सुख में एक सा। ना दुःख में बहुत दुःखी और ना ही सुख में बहुत उत्साहित। जो है बस यही है। जो अब है वो कल ना
होगा अर्थात अगर दुःख है तो कल न होगा और सुख है तो हमेशा ना रहेगा। इस पंक्ति को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक स्थिति में हर पल ख़ुशी को महसूस करना ही सकारात्मकता का अर्थ है। परन्तु इसका मतलब यह कतई नहीं है कि हम गलत कार्य स्वयं करें और ख़ुशी को महसूस करें। यहाँ पर स्वतः उत्पन्न हुए विचार अथवा सोच को समझने का प्रयास करना है। जैसे यदि आप नए जूते पहनकर सड़क पर कहीं जा रहे हैं और मार्ग में सड़क पर पड़ी किसी कील से आपका जूता, नया जूता ख़राब हो गया, उसमे छेद हो गया। अब लो आरम्भ होती है नकारात्मक विचारों का बारिश, एक एक बूँद करके नहीं, ये तो एक साथ ही मूसलाधार बारिश की तरह हमला करते हैं,
- अपने आप को कोसना शुरू,
- जूते वाले को कोसना शुरू,
- सड़क बनाने वाले को गलियां देना शुरू,
- यहाँ तक कि मार्ग पर चलने वाले यात्रियों को भी नहीं छोड़ा आपने। होता है ना यही, जरा सोचिये ?
अब दूसरी ओर सकारात्मक विचार केवल एक ही काफी है, चलो अच्छा हुआ मेरे जूते में ही कील घुसी, पैर तो घायल होने से बच गया। अब अगर मैं अपने सकारात्मक विचारों की बारिश करूँ तो कुछ इस प्रकार होगी -
- केवल जूते पर ही बीती, पैर बच गया वरना डॉक्टर, पटटी, इंजेक्शन आदि, शुक्र है ईश्वर का।
- किसी बच्चे के नहीं लगी, वरना उसका मुलायम पैर तो सहन ही नहीं कर पता, शुक्र है ईश्वर का।
- किसी के वाहन आदि पर नहीं लगी, यदि टायर पंक्चर हो जाता, तो कहाँ तक पैदल खीचना पड़ता।
- जूता नया है, और अभी तो गारन्टी में भी है। इत्यादि।
- जूता नया है, और अभी तो गारन्टी में भी है। इत्यादि।
अब देखिये एक छोटी से घटना ने हमारे विचारों में कितनी उथल पुथल मचा दी और हमारे व्यक्तित्व को भी दर्शा दिया। सोच ही है जो हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती है। हमें ऊँचा उठाती है।
स्वामी विवेकानंद, पं श्री राम शर्मा आचार्य, श्री श्री रवि शंकर तथा Dr. Rhonda Byrne, Dr. Joseph Merphy जैसे अनेकों युगपुरुष, गुरू एवं लेखकों ने अपनी कलम की पैनी धार से वातावरण की तरंगों का सीना चीरकर हमें सकारात्मक विचारों की अद्भुत व अनूठी शक्ति से रूबरू करवाया।
"ईश्वर मंगल या अमंगल जो कुछ भी करता है, वह सब मेरे मंगल के लिए ही है। ऐसा दृढ़विश्वास रखना ही सांख्य भक्ति तथा सकारात्मकता का मुख्य लक्षण है।"
महा शिव पुराण (रुद्रसंहिता - १९४)
सकारात्मकता का मतलब हालात से समझौता करना बिल्कुल नहीं है बल्कि अपने विचारों से अपने लिए अनुकूल वातावरण उत्पन्न करना तथा हर पल ख़ुशी को महसूस करते हुए, खुश रहकर हर परिस्थिति में अपने ईष्ट का धन्यवाद करना है।
!! अच्छा सोचो, सकारात्मक सोचो, अच्छा करो, सफल होओ !!
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