बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

Kinds of Human Income

आय / धन अथवा Income

मनुष्य को अपने माता-पिता, गुरु, भ्राता, प्रजा, दीन, दुःखी, आश्रितजन, अतिथि, अभ्यागत (घर पर अकस्मात आने वाला) आदि पोष्य वर्गों का पालन/ भरण पोषण प्रयत्न पूर्वक करना चाहिए। इस संसार में उसी व्यक्ति का जीवन श्रेष्ठ है, जो बहुतों के जीवन का साधक बनता है। जो मात्र अपने भरण-पोषण में लगे रहते हैं, वे जीवित रहते हुए भी मरे के समान हैं, क्योंकि अपना पेट पालन तो पूँछ वाला कुत्ता भी कर लेता है।

व्यवहार में अर्थ का महत्व है। अर्थ को उत्पन्न करना एवं बढ़ाना अतिआवश्यक है और जो हमारे सभी कार्यों की सम्पन्नता में  अनिवार्य रूप से उपयोगी हो, उसे "अर्थ" कहते हैं। अर्थ का अत्यन्त महत्व होने पर भी इसके अर्जन में संयम आवयशक है।

धन, मुख्यतः तीन प्रकार का होता है, शुक्ल, शबल (मिश्रित), कृष्ण।

  1. दायभाग के अनुसार वंश परम्परा से यथाधिकार प्राप्त धन। 
  2. प्रेम संगत किसी के द्वारा दिया गया धन। 
  3. यथाविधि विवाहित पत्नी के साथ प्राप्त धन। 

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्णों की आय का उल्लेख निम्न प्रकार हैं। 

- ब्राह्मण की आय के तीन मुख्य साधन हैं - याजन (यज्ञ कराने से प्राप्त आय), अध्यापन से प्राप्त आय और सत्य पात्र से लिया गया दान।

- क्षत्रिय की आय भी तीन प्रकार से समझी जाती है - कर से प्राप्त धन, दण्ड द्वारा प्राप्त धन और विजय द्वारा प्राप्त धन।

- वैश्य का तीन प्रकार का धन है - खेती से प्राप्त धन, गौपालन से प्राप्त धन तथा व्यापर से प्राप्त धन। 

- शूद्र वर्ण की विशेष आय वही है जो उपरोक्त वर्णों की सेवा एवं उनके कार्यों में सहायता करके कृपा रूप से प्राप्त हो।

शास्त्रसम्मत विधि से ही धनोपार्जन करना चाहिए तथा सभी मनुष्यों को अपने लाभांश से पितृगण, देवगण तथा ब्राह्मण आदि की सेवा एवं पूजा आदि करनी चाहिए। अपने आय एवं बचत में से अन्नादि खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ, वस्त्र, शय्या, आसन तथा गौ आदि का दान, पाप नाशक व पुण्य दायक होने के साथ साथ, अप्रत्याक्ष रूप से धन वृद्धि में भी सहायक होता है।

वर्तमान में मानव के जीविकोपर्जन के सामान्यतयः दस साधन मुख्य व सर्वमान्य हैं -

  1. विद्या 
  2. शिल्प 
  3. वेतन 
  4. सेवा 
  5. गौरक्षा 
  6. व्यापार 
  7. कृषि 
  8. वृत्ति (बिना किसी कार्य के, सहायता के रूप में मिलने वाली मासिक धनराशि)
  9. भिक्षा 
  10. कुसीद (ब्याज द्वारा कमाई गई धनराशि)


प्रत्येक वर्ण के किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन यापन के लिए केवल न्यायोचित मार्ग द्वारा ही धन अर्जन करके अपना कार्य पूर्ण करना चाहिए।


- गरुड पुराण (आचार काण्ड - ३७६)




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