गुरुवार, 6 मार्च 2014

AADHYATM - SPIRITUAL

आध्यात्म / Spiritual

हम सभी ने बहुत कुछ सुना व पढ़ा होगा, "आध्यात्म" के बारे में। क्या है आध्यात्म ? किसे कहते हैं आध्यात्म ? 

मैंने "आध्यात्म" रुपी चट्टान को समझने के लिए अपनी कलम रुपी कुदाल से रास्ता बनाने का कुछ प्रयास किया है। हम दूसरों का स्वभाव तथा हाव-भाव जानने को क्या कुछ नहीं करते। हर तरफ पुस्तकों में, समाचार पत्रों में तरह-तरह के लेख भी उपलब्ध हैं, जिनमे आप दूसरों को उनकी लिखावट से, उनके चलने के तरीके से, उठने बैठने के तरीके से यहाँ तक कि शरीर की बनावट को देखकर भी आप उनके स्वभाव से, व्यवहार से परिचित हो सकते हैं, परन्तु स्वयं से परिचय कैसे हो ? स्वयं को कैसे जाने ? यदि स्वयं को जानने की जिज्ञासा शांत करनी हो तो आइये आध्यात्म की शरण में। आध्यात्मिक दुनिया के रंगीन सितारों की अनोखी चमक को आप अपनी आँखों से देख तो कम ही सकेंगे, परन्तु महसूस उससे अधिक कर सकते हैं। 

आध्यात्म कोई पूजा पाठ, मान्यता अथवा किसी धर्म विशेष की कोई क्रिया नहीं है, अपितु आध्यात्म का अपना ही एक अदभुत एवं रंग से रहित एक रंगीन संसार है, जिसका शाब्दिक अर्थ "स्वयं को जानना" या Self Study है। हमारे प्राण, हमारी आत्मा का भाव, हमारे विचार, हमारी भावना आदि इत्यादि सब कुछ आध्यात्मिक ही तो है और इन सब को जानने व समझने के लिए हमें आध्यात्म की शरण में आना होता है। हम जैसे विचार या भावना रखते हैं वैसा ही व्यवहार भी करते हैं। आखिर क्या हैं हम ? क्यों हैं हम ? हम ही क्यों हैं ? कालान्तर से अनगिनत विद्वान, साधू-सन्त तथा धर्म गुरु आदि अपने-अपने तरीके से आपको हमको, अपने अनुयाइयों/ शिष्यों को आध्यात्म का पाठ पढ़ाते आये हैं। उनके भावात्मक व शाब्दिक आशीर्वाद की पवित्र वृष्टि से हम लोगों का मन आच्छादित होता रहता है। एक प्रकार की अनोखी शक्ति महसूस होती है उनकी सभाओं में। परन्तु प्रश्न यह है कि उनकी शाब्दिक कहानिओं को हम कितना समझते हैं और कितना स्वीकार करपाते हैं। जी हाँ जब तक कुछ समझ में न आये तब तक हर एक शब्द केवल शब्द और उनका समूह एक कहानी ही नजर आते हैं, और यदि एक बार समझ में आने लगे तो भूख, प्यास, नींद सब कुछ द्वितीय तथा आध्यात्म प्रथम हो जाता है, और यहीं से आरम्भ होती है आत्म ज्ञान की सुन्दर व अदभुत यात्रा ।   

बचपन में सुना था, आध्यात्म आदि तो बुढ़ापे का कार्य है, जब सारे कार्यों से निवृत्त हो जाओ तब आध्यात्म की ओर चले जाना, जबकि ऐसा नहीं है। जब हमें "आत्म ज्ञान" - "आत्मा का ज्ञान" - "स्वयं की पहचान" ही नहीं होगी तो उम्र भर हम कार्य क्या करेंगे और किस कार्य से निवृत्त होंगे ? आत्म ज्ञान प्राप्त करने की कोई उम्र नहीं है, कोई सीमा नहीं है, कोई निश्चित मार्ग नहीं है, परन्तु मंजिल अवश्य है। बल्कि यहाँ यह कहना उचित होगा कि आध्यात्म जितना अधिक महसूस किया जाता है, हमारा मन उतना ही अधिक आनन्दित होने लगता है। किसी भी धर्म अथवा वर्ण का व्यक्ति किसी भी मार्ग को प्रशस्त करके आध्यात्म की मंजिल की ओर अपने कदम रख सकता है। यदि हम वास्तव में स्वयं को जानना चाहते हैं तो "आध्यात्म" ही एक मार्ग है, और ध्यान एक माध्यम। 

हम यदि आत्म ज्ञान पाने के लिए वृद्धावस्था तक प्रतीक्षा करेंगे, तो उस ज्ञान का आनन्द कब उठाएंगे ? मेरे कहने का श्वेत तात्पर्य यह है कि आज से बल्कि अभी से ध्यान मार्ग को अपनाओ और अपने आप को आध्यात्म की ओर स्वयं आकर्षित होने दो। 


"ध्यान से आत्म ज्ञान का बोध होता है और आत्म ज्ञान ही वास्तविक आध्यात्म है।"      - चित्रांश 


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