अपराजित शक्तियों का मूल स्रोत एवं ग्रहों के अधिपति भगवान् सूर्य के बारे में वर्णन करना मतलब अपनी कलम को धोखा देना है, परन्तु फिर भी अपनी तुच्छ बुद्धि व अधययन के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निम्न हैं -
हम सभी अपने अपने तरीकों से सूर्य देव की पूजा अर्चना करते हैं, जिसमें प्रातःकाल का सूर्य नमस्कार व सूर्य की किरणों पर जल अर्पित करने की आध्यात्मिक परम्परा, वैज्ञानिक तौर पर सर्वमान्य है। शक्ति एवं ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य ही प्रकृति के सभी जीवों के पालन पोषण का आधार है। हमें एकाग्रचित् होकर पवित्र मन से नियमित रूप से सूर्योपासना करनी चाहिए।
निःरोगी काया, भोग व मोक्ष प्रदायक शक्तिपुंज के अधिष्ठाता भगवन सूर्य का सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार है -
ग्रहाधिपति भगवान सूर्य का मूल मंत्र इस प्रकार है -
ऋग्वेद की पवित्र सूर्य/ वरुण स्तुतिओं में से एक स्तुति -
"पवित्र पराक्रम युक्त, सबको आच्छादित करने वाले राजा वरुण, दिव्य तेज पुंज सूर्यदेव को आधार
रहित आकाश में धारण करते हैं। इस तेज पुंज सूर्यदेव का मुख नीचे की ओर तथा मूल ऊपर की ओर
है। इसके मध्य में दिव्य किरणें विस्तीर्ण होती चलती हैं।"
हम सभी अपने अपने तरीकों से सूर्य देव की पूजा अर्चना करते हैं, जिसमें प्रातःकाल का सूर्य नमस्कार व सूर्य की किरणों पर जल अर्पित करने की आध्यात्मिक परम्परा, वैज्ञानिक तौर पर सर्वमान्य है। शक्ति एवं ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य ही प्रकृति के सभी जीवों के पालन पोषण का आधार है। हमें एकाग्रचित् होकर पवित्र मन से नियमित रूप से सूर्योपासना करनी चाहिए।
निःरोगी काया, भोग व मोक्ष प्रदायक शक्तिपुंज के अधिष्ठाता भगवन सूर्य का सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार है -
ॐ आदित्याय विद्महे, विश्वभावाय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात।
(या)
ॐ भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि, तन्नो सूर्यः प्रचोदयात।
ग्रहाधिपति भगवान सूर्य का मूल मंत्र इस प्रकार है -
ॐ खखोल्काय नमः।
पौराणिक द्वादश सूर्यों का वर्णन निम्नलिखित हैं -
- भग
- सूर्य
- अर्यमा
- मित्र
- वरुण
- सविता
- धाता
- विवस्वान
- त्वष्टा
- पूषा
- इंद्र
- विष्णु
- गरूड पुराण (आचार काण्ड -२९)
ऋग्वेद की पवित्र सूर्य/ वरुण स्तुतिओं में से एक स्तुति -
"पवित्र पराक्रम युक्त, सबको आच्छादित करने वाले राजा वरुण, दिव्य तेज पुंज सूर्यदेव को आधार
रहित आकाश में धारण करते हैं। इस तेज पुंज सूर्यदेव का मुख नीचे की ओर तथा मूल ऊपर की ओर
है। इसके मध्य में दिव्य किरणें विस्तीर्ण होती चलती हैं।"
- ऋग्वेद संहिता-१ (सूक्त-२४/७ - २६०/२९)
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