कथनी और करनी / वचन एवं कर्म
उपरोक्त शब्दों के समूह और उनके अर्थ से हम भलीभाँति परिचित हैं, परन्तु वास्तविक, शाब्दिक और भावनात्मक अर्थ से कहीं अधिक महत्वपूर्ण है, उसका आध्यात्मिक अर्थ और उसका गूढ़ रहस्य ।
कथनी, वचन, कथन, मुँह से निकले शब्द, विचारों का शाब्दिक चित्रण, शब्दों का व्यवहारिक और वैचारिक रूप आदि हमारे द्वारा कहे गए वाक्यों का वह समूह है जो पंक्ति एवं अनुच्छेद बनकर हमारे आंतरिक विचारों पर निर्भर हमारे आचरण, व्यवहार और व्यक्तित्व को सकरात्मक या नकारात्मक दर्शन देता है।
करनी, कर्म, हाथों द्वारा किया गया परिश्रम, मानसिक व शारीरिक शक्ति का प्रदर्शन, कार्मिक पहचान आदि हमारे द्वारा किये अथवा करवाये गए कर्मों का वह प्रत्यक्ष रूप एवं दर्शन है, जो आधार कर्म बनकर हमारे उत्तम भाग्य एवं उज्जवल भविष्य के निर्माण का कारक बनता है और हमें समाज में सकारात्मक या नकारात्मक पहचान दिलाता है।
साधारण भाषा में कहा जाये तो "जैसा हम कहते हैं और जैसा हम करते हैं, उसी के अनुरूप हम आकर्षित करते और प्राप्त भी करते हैं। बहुत पुरानी सूक्ति है, जैसी करनी, वैसी भरनी, परन्तु यहाँ पर इस पंक्ति प्रसार कुछ ऐसे किया है, जैसी कथनी, वैसी करनी। यदि हम इसे ऐसे समझने का प्रयास करें कि जैसी कथनी, वैसी करनी, यदि की जाती है तो वैसी भरनी, बहुत ही आनंदित व मन को प्रफुल्लित करने वाली होती है।
जिस प्रकार आत्मा अमर है और शारीर का भोग करते हुए इस सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में विचरण करती है, ठीक उसी प्रकार "शब्द और कर्म" भी अमर हैं, लौट कर पुनः हमारे पास ही आते हैं।
जैसा कहोगे, वैसा करोगे और जैसा करोगे वैसा भरोगे - अर्थ उपरोक्त पंक्तियों में अधिकतम वर्णित कर चुके। जैसा कहा है, वैसा करो - थोड़ी सी भ्रान्ति है इसमें। इस एक सूक्ति के दो अर्थ हो सकते हैं प्रथम यह कि जैसा आपने कहा है, करने विचार किया है, अथवा करने का वचन दिया है, वैसा अवश्य करें और दूसरा यह कि जैसा हमारे बुजुर्गों ने, गुरुओं ने कहा है, जो ईश्वर वाणी है, वैसा ही करें।
अब हम बात करते हैं, कि कैसी हो कथनी और कैसी हो करनी ? तो बहुत आसान सा उत्तर है -
कहो ऐसा, सुन सको जैसा। करो वैसा, कहा है जैसा। - "चित्रांश"
अर्थात आपको अपनी वाणी पर नियंत्रण रखते हुए अपने मुखारविंद से अपने कथन में उन्हीं शब्दों का प्रयोग करना है, जिन्हें आप स्वयं सुनने की क्षमता रखते हों और आपको यदि वैसे शब्द पुनः सुनने पड़ें, तो सहन कर सकें और बुरा भी न लगे। इतना मधुर बोलें कि यदि आपसे कोई वैसा ही व्यववहार करे अथवा कहे तो खुद को कड़ुवा न लगे, अर्थात सात्विक व धार्मिक वाणी, सज्जन एवं गुरुओं की वाणी, ईश्वर की वाणी का पुरजोर प्रयोग करें। अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाने वाले शब्द, अज्ञानता से ज्ञान की ओर ले जाने वाले शब्दों का ही प्रयोग एवं उचित प्रयोग करें। अपने हाथों को देने की पवित्र भावना से उठायें, न की लेने की। सहायता एवं परोपकार की भावना रखते हुए कर्म करें न कि करने के उपरांत घमण्ड की। ईश्वरीय कर्म करें। सात्विक कर्म करें। जैसा हमारे पवित्र ग्रंथों व पुस्तकों में लिखा एवं वर्णित है, गुरुओं द्वारा निर्देशित एवं आदेशित है, वैसा ही प्रेरित कर्म करने में हमारा, हमारे परिवार, हमारे समाज तथा हमारे राष्ट्र का अपितु सम्पूर्ण मानव जाति का वास्तविक कल्याण निहित है।
आध्यात्मिक, शुद्ध, पवित्र व सत्य वचन तथा सात्विक, परोपकारी एवं सत्कर्म आपको आपके मानव जीवन का वास्तविक अर्थ एवं ज्ञान से बोध कराने के साथ-साथ उसका प्रत्यक्ष दर्शन भी कराते हैं। उत्तम विचारों से पवित्र शब्दों का निर्माण होता है। शब्द हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करते हैं। कर्म हमारे व्यक्तित्व को दर्शाता है। कर्म के अनुसार ही भोग प्राप्त होता है। भोग से ज्ञान प्रेरित होता है। ज्ञान से मोक्ष की प्राप्ति होती है। मोक्ष से ईश्वर के दर्शन होते हैं। ईश्वर प्रत्येक प्राणी के ह्रदय में निवास करते हैं। अतः प्रत्येक धर्म व सम्पूर्ण मानव जाति से प्रेम करना चाहिए और भगवान रुपी प्राणी के हितार्थ ही वचन बोलने एवं कर्म करने चाहिए।
- "चित्रांश"
अपनी "कथनी और करनी" का चयन सोच-विचार कर स्वयं करें।
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