गुरुवार, 26 जनवरी 2017

GYAN - 3

ज्ञान - ३  

ज्ञानोपदेशः  


'अज्ञान' की निवृत्ति 'ज्ञान' से ही होती है, कर्म से नहीं। 
ज्ञान परब्रह्म परमात्मा का नाम है। वेदान्तवाक्य के श्रवण और मनन से जो ज्ञान होता है, वह विरक्त पुरुष को ही होता है, दूसरे को नहीं। श्रेष्ठ अधिकारी को गुरुदेव की कृपा से भी ज्ञान हो जाता है। यह सत्य है। मनुष्य के ह्रदय में जो कामनाएं हैं वे सबकी सब जब छूट जाती हैं, तब वह जीवन्मुक्त होकर इसी जीवन में परब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है। क्रूरकाल जागते, सोते, खाते और ठहरते समय सदा ही इस जीव को अपनी ओर खींचता रहता है। संग्रह का अंत विनाश है। अधिक ऊँचे चढ़ने का अंत नीचे गिरना है। संयोग का अंत वियोग और जीवन का अंत मरण है। दि० २१ जनवरी,२०१७ के ब्लॉग देखें। 

जैसे पके हुए फलों को गिरने के सिवा और कोई भय नहीं है, वैसे ही जन्म लेने वाले मनुष्यों को मृत्यु के सिवा और कोई भय नहीं है। जैसे सुदृढ़ खम्भों वाला गृह सुदीर्घ काल के बाद जीर्ण होने पर नष्ट हो जाता है, उसी प्रकार मनुष्य जराजीर्ण होकर मृत्यु के आधीन हो नष्ट हो जाता है। दिन और रात बीतते चले जा रहे हैं। इससे मनुष्यों की आयु नष्ट होती है। इस दशा में तुम अपनी आत्मा के लिए शोक करो। दूसरी किसी बात के लिए क्यों शोक करते हो? हे वत्स! कोई खड़ा हो या दौड़ता हो, उसकी आयु का प्रति क्षण नाश हो रहा है। मृत्यु साथ-साथ चलती है, साथ ही बैठती है और दूर देश में साथ-साथ जाकर पुनः साथ ही लौट आती है। शरीर में झुर्रियां पड़ गईं, सिर के बाल सफ़ेद हो गए और बृद्धावस्था एवं दमा और खाँसी से देह शिथिल हो जाती है। प्रिय बन्धु! जैसे समुद्र में बहते हुए दो काठ एक दूसरे से मिलकर फिर विलग हो जाते हैं, उसी प्रकार कालयोग से मनुष्यों का एक दूसरे के साथ संयोग और वियोग होता है। इसी प्रकार स्त्री, पुत्र, भाई, क्षेत्र और धन ये सब कभी कुछ काल के लिए एकत्र होते और फिर अन्यत्र चले जाते हैं। जैसे कोई पथिक राह चलते हुए किसी दूसरे पथिक से कहता है, कि ठहरिये, मैं भी आपके साथ चलूंगा और इस प्रकार दोनों कुछ काल तक साथ हो जाते हैं और फिर अलग-अलग चले जाते हैं, इसी प्रकार स्त्री और पुत्र आदि का समागम नश्वर है। शरीर के उत्पन्न होने के साथ ही निश्चय ही मृत्यु भी उत्पन्न होती है। इस अवश्यम्भावी मृत्यु को टालने का कोई उपाय नहीं है। हे वत्स! इस शरीर का अंत हो जाने पर देहाभिमानी जीव अपने कर्म की गति के अनुसार दूसरा शरीर धारण कर लेता है। प्राणियों का सदा एक स्थान पर निवास नहीं होता। अपने-अपने कर्म वाश वश सभी जीव एक-दूसरे से विलग हो जाते हैं। 

प्रिय बन्धु! जीवों के शरीर जिस प्रकार उत्पन्न होते और नष्ट हो जाते हैं, उस प्रकार आत्मा का जन्म और मरण नहीं होता। तुम शोक रहित अद्वैत ज्ञानमय सतस्वरूप निर्मल परब्रह्म परमात्मा का दिन-रात चिंतन करो। ऐसी दृष्टि होने पर तुम्हारा किया हुआ प्रत्येक कर्म स्वयं ईश्वर के द्वारा किया हुआ है और उनका किया हुआ प्रत्येक कर्म तुम्हारा किया हुआ है। इस प्रकार अज्ञान के प्रभाव से ही मनुष्य दुःख पाता है और अज्ञान की निवृत्ति हो जाने तथा अंतर्मन में ज्ञान का प्रकाश होने पर, उसे उत्तम सुख की प्राप्ति होती है।

अतः प्रिय बन्धु! तत्वज्ञान में ही सदा स्थित रहो। यह आत्मा स्वयंप्रकाश है। तुम सदा आत्मा के इसी स्वरुप का चिंतन व मनन करो। देह आदि में ममता त्यागकर सदा सत्य-अहिंसा एवं धर्म का आश्रय लो।

 - स्कन्द पुराण (ब्रह्मखण्ड-५८०-५८१)


बुधवार, 25 जनवरी 2017

GYAN - 2

ज्ञान  - २ 

ज्ञानोपदेशः  


'ज्ञान' शब्द का शाब्दिक अर्थ पीछे  दि० २५ जनवरी,२०१७ के ब्लॉग में देखें। 

ज्ञान शब्द का प्रथम युग्माक्षर 'ग' और 'य' है जो परस्पर योग से एकाक्षर 'ज्ञ' उच्चारित करता है। यह अक्षर 'ग' भी पंचाक्षरी महिमा से ओत-प्रोत है, इस एक 'ग' में सृष्टि के पांच महातत्व विद्यमान हैं। शिव-पार्वती पुत्र, प्रथमेश (प्रथम पूजनीय) तथा बुद्धि के देवता 'गणेश' का बीजाक्षर 'गं' है। भगवान गणेश के यह पञ्च गं निम्न हैं, जो गणेश की भांति ही प्रथम पूजनीय तथा वन्दनीय हैं, पुण्यदायक व प्राणस्वरूप हैं - 

१- गुरू,          २- गौ/ गाय,          ३- गंगा,          ४- गायत्री,          ५- गीता।      


- सर्वप्रथम व्यक्ति/ जिज्ञासु गुरू के संपर्क में आता है, तत्पश्चात गुरू ही उसे आगे का मार्ग दर्शाता/ बताता है, चाहें वह माता-पिता के रूप में हों अथवा अन्य कोई आदरणीय, पूजनीय अथवा अनुभवी व्यक्ति। गुरु की महिमा का व्याख्यान तो सौरमण्डल के अधिष्ठाता, महागुरु सूर्य या देव गुरू वृहस्पति भी नहीं कर पाए। जीवन में गुरु की महत्ता अत्यधिक है। गुरू-शिष्य का परमानन्दित सम्बन्ध और उनकी उपस्थिति केवल महसूस की जा सकती है, व्यक नहीं। गुरू के बारे में वेद सम्मत मंत्र निम्न है -

 गुरुर्ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु, गुरुर्देवो महेश्वरः ।   
गुरू साक्षात परब्रह्माः, तस्मै श्री गुरुवे नमः।।


- गौ/ गाय, एक चौपाया-दुग्धक पशु मात्र नहीं है, वरन देवताओं का एक सम्पूर्ण समूह है। वेद-पुराणों के अनुसार जिसमें सभी ३३ कोटि देवी-देवता आदि प्रत्यक्ष निवास करते हैं। इस पवित्र पशु को सृष्टि में स्तन पान कराने वाली 'माँ' का स्थान दिया गया है। यह संसार का एक मात्र जीव है, जो अपनी श्वांस वायु के दौरान कॉर्बन-डाई-ऑक्साइड गृहण करती है और प्राणदायनी ऑक्सीजन का प्रवाह करती है। रोग से ग्रस्त प्राणी के लिए तो गाय का स्पर्श मात्र ही रामवाण/ प्राणदायक औषधि है। गौदुग्ध और गौमूत्र तो किसी औषधि अथवा अमृत से कम नहीं। गाय का दूध, उसका मल-मूत्र (गोबर एवम गौमूत्र) आदि सभी कुछ प्राणिजगत के लिए किसी न किसी रूप में पुष्टिवर्धक तथा लाभदायक है।


- प्राणदायनी, मोक्ष प्रदायनी, पाप विनाशक, पवित्र जल-अमृत धारा माँ गंगा, धरती पर एक मात्र जल का प्रथम स्रोत है, जो प्राणी/ जीव के पञ्च तत्वों में से एक है, जिसे महादेव शिव ने अपनी जटा में धारण करके, एक जल धारा के रूप में पृथ्वी पर उतारा है। सृष्टि के जल की एक-एक बूँद गंगामयी है, गंगा से ही निकली है, परन्तु मूलरूप-प्राकृत गंगा का अपना स्वरुपात्मक गुण आज भी ज्यों का त्यों है। गंगा जल में ऑक्सीजन आदि तत्व प्रचुर मात्रा में होते हैं। गंगा नदी के जल में स्नान और गंगा नदी के जल का पान आदि का पुण्यात्मक, आध्यात्मिक, दैविक तथा वैज्ञानिक माहात्म्य प्राचीन वेद-पुराणों व शास्त्रों में हमारे ऋषि-मुनियों ने अपनी कलम-स्याही से समुद्र के समुद्र उड़ेल दिए हैं, परन्तु निर्मल-पावन गंगा की महिमा का पूर्ण वर्णन नहीं कर पाए।


 - माँ गायत्री का माहात्म्य तथा २४ अक्षरों वाले गायत्री मंत्र की महिमा का गान तो स्वयं १८ पुराण तथा चारों वेद आदि करते हैं। महादेव द्वारा वर्णित एक स्वतंत्र देवी हैं, माँ गायत्री। श्रीरामचन्द्र जी ने स्वयं महादेव की स्तुति भी मन्त्रों के राजा गायत्री मंत्र द्वारा ही की थी। सभी देवी-देवताओं का अपना प्रथक गायत्री मंत्र होता है। वेदमूर्ति पं० श्री राम शर्मा आचार्य ने तो माँ गायत्री की आराधना मात्र से तथा उनके गायत्री मंत्र को आधार बना के एक विश्व व्यापी मिशन की स्थापना कर दी। मानव जाति के कल्याण के लिए स्वयं ईश्वर ने गायत्री मन्त्र को सर्वश्रेष्ठ बताया है, जिसे पृथ्वी पर सभी धर्मो ने अपनाया भी है, वह निम्न है -  
भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात्
 
भावार्थ- उस प्राण स्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें। 
गणेश गायत्री मंत्रशिव गणों के ईष्ट, सृष्टि के प्रथम पूजनीय व विघ्नहर्ता भगवान गणेश का गणेश गायत्री मन्त्र  इस प्रकार है - महाकर्णाय विद्महे, वक्रतुण्डाय धीमहि, तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्।

सूर्य गायत्री मंत्रनिःरोगी काया, भोग  मोक्ष प्रदायक शक्तिपुंज के अधिष्ठाता भगवन सूर्य का सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार है आदित्याय विद्महे, विश्वभावाय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात।




- भगवान् नारायण के नाभि-कमल से उत्पन्न श्री ब्रह्मा के मुखारविंद से वेदों की उत्पत्ति हुई। पृथ्वी के श्रेष्ठतम गुरु 'श्री व्यास' ने वेदों का सार पुराणों-शास्त्रों-उपनिषदों में प्रतिपादित किया। इस प्रकार वैदिक और शास्त्रीय ज्ञान तथा भगवान् के मध्य कई व्यवधान पड़े, जबकि श्री विष्णु के द्धापर युग के अवतार श्री कृष्ण ने महाभारत के कुरुक्षेत्र में अपने सखा अर्जुन को 'गीता का उपदेश' दिया। अतः गीता तो स्वयं भगवान् के श्री मुख से निकली है। पवित्र ग्रन्थ गीता के लिए स्वयं वेदव्यास जी ने कहा है -
गीता सुगीता कर्त्तव्या किमन्यैयः शास्त्रसंग्रहैः। 
या स्वयं पद्मनाभस्य मुखपद्मद्विनिः सृता ।।

भारतीय दर्शन के अनुसार जीवन का सार व सार्थकता 'श्रीमद्भागवत गीता' में है। सम्पूर्ण मानव जाति को लक्ष्य प्राप्ति करादेने में सहायक और एकमात्र आश्रय 'गीता' ही है, जो सर्वार्थ-सिद्ध तथा सबल-साधन के रूप में उद्घृत है। गीता की महत्ता लोक कल्याणकारी है, सर्व-मान्य व विश्वप्रसिद्ध है और हमारा तो राष्ट्रीय ग्रन्थ है।  


          जिस प्रकार प्राणी का नश्वर शरीर सृष्टि के पाँच तत्वों (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश) से मिलकर बना है और ये सभी प्राकृतिक तत्व जीवन का आधार हैं, ठीक उसी प्रकार उपरोक्त पञ्च गं का ज्ञानोपदेश, समझ एवं अनुभव, जीवन का वास्तविक ज्ञान ही नहीं है, अपितु इनकी शिक्षा, इस विशाल पर्वत रुपी संघर्षमयी जीवन को जीने के लिए व अपने जीवन आनंदित बनाने के लिए प्रारम्भिक और अत्यधिक महत्त्वपूर्ण है।


GYAN - 1

ज्ञान  - १

ज्ञानोपदेशः  


'ज्ञान' शब्द का अर्थ बहुत विस्तृत एवं अति व्यापक है। ज्ञान का शाब्दिक तथा वास्तविक अर्थ होने के साथ-साथ यह अपने आप में पूर्ण तो है, परंतु इसका सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त कर पाना अत्यंत दुर्लभ है आसान नहीं है, परन्तु प्रयास और अथक प्रयास करने से 'ज्ञान' प्राप्ति तभी हो सकती है, जब प्रभु की अनुकंपा हो। सृष्टि, समूचा ब्रह्माण्ड, इसकी उत्पत्ति तथा विनाश, जीवन तथा मृत्यु का रहस्य आदि इसी 'ज्ञान' शब्द में समाया हुआ है। 

ॐ (ओंकार/ प्रणव) सृष्टि का प्रथम उद्गम है। यह एक ऐसा आदि मन्त्र है, जिससे सृष्टि का, ब्रह्माण्ड का निर्माण हुआ है। सम्पूर्ण सृष्टि इसी एकाक्षरी आदि मन्त्र में निहित है, जिसका स्थूल पंचाक्षरी है और सूक्ष्म ॐ (ओंकार) जो वेद-पुराणों के सभी मंत्रो का आदि तथा अंत भी है। कोई भी मंत्र ॐ से आरम्भ होकर, ॐ पर ही अंत होता है।  ॐ (ओंकार) हिंदी वर्णमाला का प्रथमांक/ प्रथम अक्षर है तथा 'ज्ञ' अंतिम अक्षर।

महाशिव पुराण के अनुसार ॐ (ओंकार/ प्रणव) पंचाक्षरों के एकोच्चारण में क्रमशः 'अ', 'उ', 'म', 'नाद' तथा 'ध्वनि', ये पाँचो एक स्वर की तरह सम्मिलित हैं। ध्वनि और नाद के साथ तीनो अक्षर ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन करते हैं। प्रणव में तीन अक्षर हैं, 'प्र'-प्रकृति से उत्पन्न महासागर का नाम है। 'न'-इस महासागर को पार करने के लिए नाव तथा 'व'-हम-तुम सभी के लिए। अतः इन तीन भावो को एक ही मानकर 'ज्ञानी' पुरुष 'एक ओंकार' (ॐ) कहते हैं, यही एक शब्द त्रिगुणी ईश्वर तथा ब्रह्माण्ड का सारतत्त्व है व सृष्टि के माया रुपी महासागर को पार करने के लिए एक मात्र नाव है। ॐ (ओंकार) मातृका का प्रथमाक्षर, अ - उ - म, इन तीन तत्वों से युक्त है, जिसमे अकार श्री ब्रह्मा स्वरुप हैं, उकार श्री विष्णु स्वरुप हैं तथा मकार स्वयं महेश्वर हैं और ये तीनो एक रूप ओंकार स्वरुप हैं। सदाशिव रूद्र के ओंकार रुपी डमरू की 'ध्वनि' तथा 'नाद' शून्यमयी ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। इसी शून्य से सृष्टि की उत्पत्ति होती है और विनाशकाल में इसी में समा जाती है। 

यह 'ज्ञान' शब्द भी पंचाक्षरी प्रणव की भांति है, सृष्टि की तरह जिसमे पूर्ण हिन्दी वर्णमाला सम्मिलित है। अक्षर 'ज्ञ' और 'अ', यानि 'अ' से 'ज्ञ' तथा उपरोक्त वर्णित है, अक्षर 'न' अर्थात नाव। अब यदि 'अ' से 'ज्ञ' का ज्ञान हो अथवा 'ज्ञ' से 'अ' का ज्ञान, दोनों ही रूपों में आपको वर्णमाला का ज्ञान तो हो ही जायेगा। ज्ञानी व्यक्ति के ज्ञान का प्रकाश स्वतः करतल 'ध्वनि' उत्पन्न करता है और शून्य/ 'नाद' से बाहर आने का प्रयास करता है। वह ज्ञानी व्यक्ति अपने ज्ञान रुपी नाव की सहायता से यह जीवन/ संसार के मायावी महासागर को पार लेता है और अपनी सभी मनोकामनाएं पूर्ण करता है। अब एक भ्रान्ति दिमाग में उत्पन्न हो रही होगी, कि 'अ' से 'ज्ञ' का ज्ञान हो, यह पंक्ति सीधी व उचित प्रतीत होती है, परंतु  'ज्ञ' से 'अ' के ज्ञान की पंक्ति तो उल्टी है !! ?? इसके लिए वेदमूर्ति पं० श्री राम शर्मा आचार्य की एक अनोखी सीख है, कि यदि उल्टे को सीधा करना हो, तो उसे पुनः उल्टा कर देना चाहिए। जब हम दर्पण में अपना चेहरा देखते हैं, तब हमें अपना ही प्रतिबिम्ब उल्टा दिखाई देता/ प्रतीत होता है, परन्तु हम तो उल्टे नहीं हो जाते, सीधे ही रहते हैं। ठीक उसी प्रकार 'ज्ञ' से 'अ' को जब उल्टा करेंगे तो स्वतः ही सीधा होकर, 'अ' से 'ज्ञ' हो जायेगा और कोई भी 'ज्ञान' उसकी अपनी वर्णमाला से ही आरम्भ होता है, अर्थात किसी भी पद्धति को जानने व समझने के लिए उसका व्यावहारिक ज्ञान अर्थात उसकी A,B,C,D . . . . etc. के बारे में जानकारी होना अतिआवश्यक होता है। चाहें वह अंग्रेजी का A to Z हो अथवा हिंदी वर्णमाला का 'अ' से 'ज्ञ'। किसी की पूर्ण या अपूर्ण जानकारी होना भी ज्ञान का ही प्रतीक है, परन्तु अपूर्ण ज्ञान लाभदायक नहीं होता। अतः साक्षर होना प्रथमावश्यक है।  (हिंदी वर्णमाला का पूर्ण ज्ञान और उसकी आध्यात्मिकता को जानने के लिए मेरा दि० ०९ जनवरी,२०१७ का ब्लॉग देखें।)

जब कोई शिशु पहली बार वर्णमाला का ज्ञान प्राप्त करता है, किशोरावस्था में अपने विद्द्यालय का मार्ग याद कर लेता है, युवावस्था में किसी वाहन को चलाने की प्रक्रिया को सीख लेता है या किसी भी प्रकार का कोई भी ज्ञान प्राप्त करता है अथवा कोई भी जिज्ञासु किसी बृद्ध/ गुरु/ अनुभवी व्यक्ति से कुछ ज्ञानवर्धक तथ्यों की जानकारी प्राप्त करके अपनी जिज्ञासा रुपी प्यास को बुझलता है, तो उसके आनंदित-प्रफुल्लित अंतर्मन के प्रकाश की 'ध्वनि' उसे 'शून्य' से बाहर लाकर ज्ञानी होने का अनुभव कराती है और इस प्रकार उस जिज्ञासु/ ज्ञान के पिपासु को ज्ञानोपदेश की प्राप्ति होती है। 


रविवार, 22 जनवरी 2017

Only One is different Three - Separate Three are only One.

अलग-अलग तीन ही एक हैं 


त्रिगुणात्मक सृष्टि के तीन गुण क्रमशः सत्त्व गुण, रजो गुण व तमो गुण, जिनके अधिष्ठाता त्रिदेव हैं। ये तीनो गुण प्रत्येक प्राणी में विद्यमान हैं। प्रथम श्री ब्रह्मा-रचयिता हैं जो जगतपिता/ परमपिता कहलाते हैं, द्वितीय श्री विष्णो, जो सृष्टि का पालन करते हैं व तृतीय श्री रूद्र हैं, जो प्रकृति को सन्तुलित करने के लिए संहार करते हैं। ये सभी आदि, अन्त तथा मध्य में नित्य मंगलमय हैं, जिनकी समानता अथवा तुलना कभी भी नहीं है, जो आत्मा के स्वरुप को प्रकाशित करने वाले देवता/ परमात्मा हैं। यही सर्वश्रेष्ठ अजर-अमर ईश्वर हैं। यह सब ज्ञान, भक्ति व वैराग्य से उत्कृष्ट हैं, इनके दर्शन एवं साक्षात्कार का यही साधन है। श्रवण, कीर्तन/ध्यान व मनन ये तीनो साधन वेद सम्मत हैं (स्कन्द पुराण-४८६) और मोक्ष के साक्षात्कार का एक मात्र साधन। यह तीनो एक हैं और एक में तीनो निहित हैं।

यह शब्द ब्रह्म ही ज्योतिर्मय स्तम्भ है, जो सृष्टि का निर्माणक/ स्रोत है। सृष्टि का निर्माण, पालन, संहार, ब्रह्म के जगत्सम्बन्धी तीन कार्य हैं, जो नित्य सिद्ध हैं। इन तीनो अवयवों से एकीभूत होकर सृष्टि का प्रथम अक्षर प्रणव, ॐ (ओंकार) उत्पन्न हुआ। प्रणव के उच्चारण में क्रमशः 'अ', 'उ' तथा 'म' तीनो अक्षर ब्रह्म की एकता का प्रतिपादन करते हैं। प्रणव में तीन अक्षर हैं, 'प्र'-प्रकृति से उत्पन्न महासागर का नाम है। 'न'-इस महासागर को पार करने के लिए नाव तथा 'व'-हम-तुम सभी के लिए। अतः इन तीन भावो को एक ही मानकर ज्ञानी पुरुष 'एक ओंकार' (ॐ) कहते हैं, यही एक शब्द त्रिगुणी ईश्वर तथा ब्रह्माण्ड का सारतत्त्व है व सृष्टि के माया रुपी महासागर को पार करने के लिए एक मात्र नाव है। वह अ - उ - म, इन तीन तत्वों से युक्त है, जिसमे अकार श्री ब्रह्मा स्वरुप हैं, उकार श्री विष्णु स्वरुप हैं तथा मकार स्वयं महेश्वर हैं और ये तीनो एक रूप ओंकार स्वरुप हैं।
                                                            - शिव पुराण (विद्येश्वर संहिता-५८, ७४)


भारत देश के उत्तरप्रदेश में अयोध्या नगरी- त्रेता युग के श्री राम जन्म भूमि को हम भली प्रकार जानते हैं, यह अयोध्या नाम भी अपने आप में उपरोक्त त्रिगुणात्मक शक्ति का बोध करवाता है, अकार कहते हैं ब्रह्मा को, यकार विष्णु का नाम है और धकार रूद्र स्वरुप है, इन सबके योग से 'अयोध्या' नाम शोभित होता है। समस्त उपपातकों के साथ ब्रह्म हत्या आदि महापातक इस पुरी से युद्ध नहीं कर सकते, इसलिए इस स्थान को 'अयोध्या' कहा जाता है। यह श्री राम जन्म भूमि 'अयोध्या पुरी' भी त्रिगुणी शक्ति का एक अनूठा द्योतक है। 
                                                                  - स्कन्द पुराण (वैष्णवखण्ड-५०८) 


भारत देश के उत्तरप्रदेश में मथुरा नगरी- द्धापर युग के श्री कृष्ण की जन्म भूमि है, जिन्हें हम माधव अथवा केशव नाम से भी संबोधित करते हैं। यहाँ 'केशव' नाम का उल्लेख श्रीमद्भागवत में इस प्रकार है, अक्षर 'क' ब्रह्मा हैं, अक्षर 'अ' विष्णु हैं, 'ईश' स्वयं शिव हैं तथा ये तीनो जिसके 'व'-वपु अर्थात स्वरुप हों, उसको केशव कहते हैं। यहाँ अर्जुन भगवन को 'केशव' नाम से संबोधित करके यह भाव दिखलाते हैं, कि आप समस्त जगत के सृजन, संरक्षण और संहार करने वाले सर्वशक्तिमान साक्षात् सर्वग्य परमेश्वर हैं।
- श्रीमद्भागवत गीता (दूसरा अध्याय, श्लोक-५४) 



तात्पर्य यह है कि, उपरोक्त तीनो शक्तियाँ, यह सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड जिनके अधीन है, अलग-अलग तीन होते हुए भी सर्वथा एक ही हैं। यही तीनो/ त्रिदेव सृष्टि रुपी संसार के तीनो संताप (आध्यात्मिक, आदिदैविक, आदिभौतिक) समूह का अपहरण करते हैं तथा अपनी कीर्तिमयी प्रभा से सम्पूर्ण जगत्समुदाय को, समस्त विश्व को प्रकाशित करते हैं।
- स्कन्द पुराण (वैष्णवखण्ड-३९८) 


हिन्दी शब्दावली में 'भगवान' या 'ईश्वर' को अंग्रेजी भाषा में 'GOD' कहते हैं, जिसका शाब्दिक व व्यापक अर्थ, G से Generator (रचयिता), O से Operator (पालनकर्ता) और D से Destroyer (संहारक) है, जो एक शब्द मात्र नहीं है, बल्कि त्रिशक्तियों का एक सुप्रसिद्ध प्राकृत/ दैविक समूह है, जिसके विचार करने मात्र से शरीर में एक अनदेखी सकारात्मक ऊर्जा का संचार सा होने लगता है, जो अलग-अलग भी होकर हमें एक होने का आभास कराते हैं। इन तीनों शक्तियों का एक साथ उच्चारण करने के लिए एक अन्य मार्ग भी है, उनका लघु नाम। सृष्टि के पालक विष्णु/ प्रभु जगन्नाथ को "श्री हरि" नाम से, सृष्टि के आदि-अंत/ संहारक भगवान शिव को 'ओंकार' (ॐ) और सत्त्व गुण के रूप परमपिता ब्रह्मा को 'तत्सद्' से संबोधित हैं, इस प्रकार "हरि-ॐ-तत्सद्" एक सूत्र में बंधे वो तीन मोती हैं, जो तीन होकर भी एक हैं तथा जिनका उच्चारण करने से हमारे प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष सभी कष्टों का निवारण होता है। 



शनिवार, 21 जनवरी 2017

The Death creates a new Life

मृत्यु ही नए जीवन का निर्माण करती है। 


अब प्रश्न है कि मृत्यु क्या है और जीवन क्या है ? उत्तर है कि जीवन एक नई ऊर्जा है, स्फूर्ति से भरा एक शक्ति पुंज, जबकि मृत्यु उस ऊर्जा के माध्यम का एक बदलाव मात्र है, अर्थात जब कोई शक्ति अपने एक पुराने माध्यम को बदलकर नवीन माध्यम में पुनः वास/ प्रवेश करती है, तो एक ओर पुराने माध्यम के लिए वह मृत्यु और दूसरी ओर नवीन माध्यम के लिए वही जीवन का अनुभव कराती है।

          हमारे शरीर में १०१ व्याधियाँ स्थित हैं, इनमे से एक व्याधि तो काल के साथ रहती है, शेष १०० व्याधियाँ आगन्तुक मानी गई हैं। जो आगन्तुक व्याधियाँ हैं, वो तो दवाओं-औषधियों आदि का सेवन करने तथा दान, जप, तप, होम आदि करने से शांत हो जाती हैं, परंतु 'मृत्यु' रूप व्याधि कभी शांत नहीं होती, यदि देहधारी के जीवन का काल आ पहुंचा है, तो उसे धन्वन्तरि भी जीवित नहीं रख सकते। काल से पीड़ित मनुष्य को औषधि, तपस्या, दान, होम, मित्र या बंधु-बान्धव आदि कोई भी बचा नहीं सकते। कोई भी रसायन, योग, सिद्ध महात्मा या पण्डित- ये सब मिलकर भी कालजनित मृत्यु को नहीं टाल सकते। सम्पूर्ण पृथ्वी पर समस्त प्राणियों के लिए मृत्यु के समान कोई दुःख नहीं है, मृत्यु के समान कोई भय नहीं है, मृत्यु के समान कोई त्रास भी नहीं है। हजारों मनुष्यो में से कोई पांच भी शायद ही ऐसे होंगे, जो पूरे सौ वर्षों तक जीने वाले हों, कोई अस्सी-नब्वे, तो कोई सत्तर वर्ष की अवस्था में मृत्यु को प्राप्त होते हैं। मनुष्य की वर्तमान आयु मात्र ६० वर्षों की ही रह गई है, किन्तु वह भी सभी के लिए निश्चित नहीं है। जिस देहधारी को अपने पूर्वकर्मानुसार जितनी आयु प्राप्त होती है, उसका आधा भाग तो मृत्युरूपिणी रात्रि हर लेती है, शेष अबोधावस्था, बाल्यावस्था, किशोरावस्था तथा बृद्धावस्था में लगभग २० से ४० वर्ष व्यतीत हो जाते हैं, जो धर्म, अर्थ, काम - किसी के भी उपयोग में नहीं आते। शेष आयु का आधा भाग मनुष्य पर आने वाले बहुत से भय तथा अनेक प्रकार के रोग और शोक आदि हर लेते हैं, इन सबसे जो शेष रह जाता है, वही मनुष्य का वास्तविक 'जीवन' है और इसी जीवन की समाप्ति होने पर मनुष्य अत्यंत भयंकर 'मृत्यु' को प्राप्त होता है। इस प्रकार योनि जनित जीवों को बारम्बार मृत्यु रुपी कष्ट उठा कर ही नए जीवन का सुख प्राप्त होता है। विनाश, नव-निर्माण का प्रेरक है।

          मृत्यु के पश्चात् मनुष्य पुनः करोड़ों योनियो में जन्म ग्रहण करता है, कर्मों की गणना के अनुसार देह-भेद से जो जीवन का एक शरीर से वियोग होता है, उसी को 'मृत्यु' नाम दिया गया है, वास्तव में उससे जीवन का विनाश नहीं होता। जैसे तृणजलौका जल में बहते हुए तिनके के अंत तक पहुँचकर, जब दूसरा तिनका थाम लेती है, तब पहले को छोड़ देती है। उसी प्रकार जीव एक देह से दूसरी देह में क्रमशः प्रवेश करता है। भावी शरीर में अंशतः प्रवेश करके पूर्व शरीर का त्याग करता है।
- स्कन्द पुराण (कुमारिकाखण्ड-१७१-१७२)

 उपरोक्त पंक्तियों में जीवन व मृत्यु के बारे में समझाने का तात्पर्य यह है कि, यदि जीवन का आनंद लेना है तो मृत्यु का भय दिल-दिमाग से पृथक करना होगा। यह जीवन मरण की शक्तियाँ सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड, जिनके अधीन है, त्रिदेव भी सृष्टि के इस नियम को नहीं टाल सकते। हमें नया, स्फूर्ति भरा जीवन प्राप्त करने हेतु  संसार के तीनो संताप समूह (आध्यात्मिक, आदिदैविक, आदिभौतिक) का नाश करना होगा तभी अपनी कीर्तिमयी प्रभा से सम्पूर्ण जगत्समुदाय को, समस्त विश्व को प्रकाशित कर सकते हैं। जिस प्रकार हम स्नान करके अपने मैल आदि का त्याग करते हैं, गंदे कपड़ों को पानी से धोकर स्वच्छ करते हैं, ठीक उसी प्रकार अपने मन की व्याधियों को मारकर, एक नए जीवन का अनुभव कर सकते हैं, क्योंकि जीवन प्राप्त करने लिए मृत्यु आवश्यक है, किसको जीवित रखने हेतु किसे मारना है, यह विचार आपका अपना है। अतः मृत्यु ही जीवन की जननी है।

- मृत्यु से ही जीवन का निर्माण होता है। 

त्रेता युग में दशरथ नंदन, मर्यादा पुरुषोत्तम श्री राम ने लंका में राक्षस राज रवण का संहार करके, द्वापर युग में देवकी नंदन, श्री कृष्ण ने अपने दुराचारी मामा कंस का वध करके एक नए युग का निर्माण किया। कौरव-पाण्डवों के मध्य महाभारत के रणक्षेत्र में कौरवों परास्त कर, सभी अधर्मियों व उनका साथ देने वालो साथियों का संहार करके, पाण्डवों को युद्ध में विजय दिलवाकर धर्म की स्थापना की थी, परंतु इसका यह आशय नहीं है, कि हम-और-आप एक दुसरे का वध करें, अपितु अपने अन्तर्मन/ अन्दर के बुरे विचारों का संहार करें, कुसंगातियों का त्याग करें तथा सभी व्याधियों का वध करें। तभी एक अनुशासित, सुव्यवस्थित, स्वर्णिम व सदाचारी तथा शिष्टाचारी व्यक्तित्व का निर्माण हो सकेगा। एक किसान भी अपनी फसल को और अधिक अच्छा करने के लिए खेत की मिट्टी में उत्पन्न खर-पतवार को उखाड़ फेंकता है। फसल को कीट आदि से रक्षित करने के लिए उसे कीटनाशक औषधियों का छिड़काव आदि करता है और इस प्रकार वह किसान अपनी फसल की पैदावार को अच्छी व स्वच्छ बनाने में समर्थ हो पाता है। यदि किसान कीट अथवा खर-पतवार जैसी व्याधियों से अपनी फसल को रक्षित न करे, उनका संहार न करे, तो वह एक नई और अच्छी फसल का उत्पादन नहीं कर सकेगा। अतः संहार ही निर्माण का आधार है।

सोमवार, 16 जनवरी 2017

Wow Life ! - Wah Jindagi

वाह जिन्दगी !!

. . . जिन्दगी ?
क्या है जिन्दगी ?  
कैसी होती है जिन्दगी ? 
किसे कहते हैं जिन्दगी ?  
क्या आपने देखी है जिंदगी ?
          
          उपरोक्त सभी प्रश्नों के प्रतिउत्तर में, मैं मात्र इतना कहना चाहूँगा, कि ''जी हाँ, मैंने देखी है, जिन्दगी।'' बहुत ही सुन्दर है, कल्पना से परे है, और आपका साक्षात्कार भी करवाऊंगा। वह लोग जो अपनी जिन्दगी को हंसी-ख़ुशी जीते हैं, उनके लिए खिलते हुए अति सुन्दर व मनमोहक गुलाबों का बगीचा है, तथा दूसरी ओर जो सज्जन दुःखी मन से द्वेष की भावना से देखते हैं, उनके लिए जी का जंजाल/ बवाल है। 
          
          अरे ! यह तो एक निर्मल, स्वच्छ व स्वादिष्ट पानी वाली नदी के दो किनारे हैं, जिसके बीच में निर्मल जल की कल-कल करती धारा प्रवाहित हो रही है और पानी के दोनों ओर सूखी हुई जमीन। अब किनारे पर रहकर, नदी में बिना प्रवेश किये, ना तो प्यास बुझाई जा सकती है और ना ही उस निर्मल जल में स्नान का आनन्द ही मिल सकेगा। बस यूँ ही, ऐसी ही तो है हमारी मनभावन जिन्दगी। 
          
          ''जैसी मूर्ति मन में बसा लो, वैसे ही हैं भगवन'', यह पंक्ति तो सभी ने सुनी व पढ़ी होगी। हमारी जिन्दगी भी कुछ ऐसी ही है। जो सुखी हैं अथवा हर पल, हर स्थिति में सुखी रहते हैं, वे दिन-प्रतिदिन सुख का अनुभव करते हुए प्रगति की सीढियां चढ़ते चले जाते हैं और जो अपने मन-अंतरमन को दुःखी मानते हैं, हर पल दुःख का अनुभव करते तथा दुःखी ही रहते हैं, उनकी यह दुःखमयी सोच, उन्हें पतन की ओर ढकेलती रहती है। अरे ! मेरे प्रिय बन्धुओं, जिन्दगी तो सुन्दर वस्त्रों व आभूषणों में लिपटी कोमल काया वाली, चिरयौवन से युक्त वह सुन्दर स्त्री है, जिसे हम अपने विचार और संस्कार से अलग-अलग संज्ञा देकर पुकारा करते हैं, जैसे-माता, बहिन, पत्नी अथवा मित्र और फिर वही स्त्री कुविचारों से वैश्या हो जाती है, जबकि उसे यह रूप व नाम देने वाले और उसकी वैश्यावृत्ति का लाभ उठाने वाले आप और हम ही तो हैं। परन्तु यदि थोड़ा सा अपने दिमाग पर जोर डालें तो जानेंगे कि, पौराणिक कथाओं में या मंदिरों में जहाँ पर भी देवियों का उल्लेख है अथवा मूर्तियों की शाब्दिक या वास्तविक चित्रकारी की गई है, वे सभी सुन्दर व सुडौल शरीर वाली, चिरयौवन से युक्त, कवि की शाब्दिक कल्पनाओं से परे, दर्शायी गई हैं। प्रश्न यह है, कि ये मूर्तियाँ या उनकी कहानी, क्यों अनूठी सुंदरता से परिपूर्ण होती है? क्योंकि, सुन्दर व पवित्र विचारों से ही हमारी जिन्दगी परिभाषित, सुगन्धित एवं उद्घोषित होती है। हमारे व्यक्तित्व का निर्माण भी इसी तथ्य पर निर्भर करता है। जिन्दगी से, एक ओर कोई दुःखी है और दूसरी ओर किसी की ख़ुशी का ना तो ठिकाना है और ना ही कोई सीमा।   

          जैसे किसी मूर्तिकार अथवा कवि ने कभी किसी देवी या किसी अप्सरा को प्रत्यक्ष नहीं देखा, परंतु उसकी छाया का चित्रांकन और उसकी मूर्ति को अपनी शिल्पकारी से तथा कवि अपने शब्दों से वो आकार-प्रकार-रूप प्रदान कर देता है, अपनी कल्पनात्मक सोच व नज़रिये से सजा कर ऐसे प्रस्तुत करता है, कि हम उस मूर्ति को/ छाया चित्रण को वैसा ही मानने पर मजबूर हो जाते हैं। ठीक उसी प्रकार एक मूर्तिकार की तरह ही अपनी जिंदगी को मन्दिर की दैवीय मूर्ति जैसी खुशनुमा, रंगीन, अदभुत, अतिसुन्दर और चिरयौवन से युक्त बनाने की सम्पूर्ण जिम्मेवारी हमारी स्वयं की ही है। यह तो आप सभी जानते होंगे, कि मानव जीवन (Human Life) प्रकृति का अदभुत ऐवम अभूतपूर्व तोहफा है, जो हम प्राक्तृतिक सौन्दर्य को महसूस करने के साथ-साथ अपनी प्रत्यक्ष आँखों से देख कर समझने की क्षमता भी रखते हैं। जैसे प्रकृति हमें अपने अनूठे-अद्भुत सौंदर्य का एहसास करवाती है, वैसे ही हमें भी अपनी जिंदगी के खुशनुमा होने का एहसास स्वयं करना होगा।    

          मैं 'अथर्ववेद' एक की सूक्ति/ ऋचा का यहाँ उल्लेख करता हूँ, "यदन्तरं तद बाह्मं, यद् बाह्मं तदन्तरं", अर्थात जो तुम बाहर से हो, वही तुम अंदर से भी बन जाओ, जो अंदर हो, वही बहिरंग में प्रकट हो।


  'जो है, वही अंतर्मन से महसूस करो और जो अपने अंतर्मन में महसूस करो, वही प्रवाहित भी।'

                                                                                               - "चित्रांश"

          जिस प्रकार प्रकृति बाहर से सुन्दर होने के साथ-साथ अंदर से भी सुन्दर होने का एहसास करवाती है। निर्जीव होकर भी सुन्दर वस्त्र व वस्तुएँ हमें अपनी ओर आकर्षित कर ही लेती हैं। हम भी हमेशा सुन्दर वस्त्र पहनने को लालायित रहते हैं तथा सुन्दर वस्त्र ही देखते व पहनते हैं, वैसे ही बाहर और अन्दर दोनों ओर से अपने विचारों को, अपनी सोच को बदलकर, अपने अंतर्मन को निर्मल करके, उसमे सुन्दर व निश्चल जीवन धारा प्रवाहित करो और जिन्दगी की संज्ञा को स्वयं परिभाषित करो। सिद्ध करो कि, हम अपनी जिन्दगी के मूर्तिकार स्वयं हैं। 


          जीवन जीने का वास्तविक आनन्द तो तब है जब आनन्द की अनुभूति अंतर्मन में हो, वो आलौकिक आनंद की अनुभूति, जो शब्दों में न व्यक्त की जा सके और कलम की स्याही से मापी न जा सके। यह पूर्णानंद आपके भीतर है, आपके अंतर्मन में है, आपके रोम-रोम में निहित है। खेत की मिट्टी में बोये हुए बीज के अंकुर की तरह धरती की छाती चीरकर बाहर निकलो और असंख्य लोगों के बीच जोर से, पूरी ताकत के साथ, पूर्ण वेग से चिल्लाकर कहो - खुशनुमा है जिन्दगी, आलौकिक आनन्द से परिपूर्ण है, हमारी जिन्दगी। 


वाह जिन्दगी !!

हमें अपनी आनंदमयी जिन्दगी की परिभाषा, अपनी ही लेखनी से स्वयं लिखनी है और ऐसी लिखनी है कि मुख, स्वर व ध्वनि बलपूर्वक स्वतः ही कहें, कि  - वाह जिन्दगी, वाह-वाह जिंदगी !!


रविवार, 15 जनवरी 2017

GOD HUMAN - Insani Ishwar

"इन्सानी ईश्वर"

 

एक सत्य घटना पर आधारित यात्रा चित्र -

 

         यह सुखद घटना वर्ष जून,२००९ की है जब "अंकुर" अपनी हवाई यात्रा के दौरान दक्षिण अफ्रीका में जोहनसबर्ग एयरपोर्ट पर अपनी अगली फ्लाइट की प्रतीक्षा में परेशान व हताश बैठा था। अंकुर को फ्लाइट में प्रवेश के लिए माना कर दिया गया था, जबकि उसके पास अपनी अगली फ्लाइट का टिकट आदि सभी कुछ उपलब्ध था। वास्तव में अंकुर के दोनों पैर अचानक ख़राब (पैरों पर खड़े होने व चलने की शक्ति नहीं रही) हो जाने के कारण व्हील चेयर पर यात्रा कर रहा था। उसके साथ कोई अन्य साथी अथवा सहायक भी नहीं था। दरअसल उसके साथी उसे "मपूटो एयरपोर्ट" (मोजांबिक देश की राजधानी, जहाँ से यात्रा आरम्भ हुई थी) पर ही शुभ यात्रा (Happy Journey) सन्देश के साथ विदा करके अपने-अपने घर वापस लौट चुके थे।
          पहली बार एक "व्हील चेयर मरीज" के रूप में यात्रा कर रहे अंकुर से जोहनसबर्ग एयरपोर्ट पर अगली फ्लाइट में प्रवेश के लिए "मेडिकल रिपोर्ट" की मांग की गई थी, जो उसके पास नहीं थी। जब उसने सोचा कि मपूटो हॉस्पिटल, जहाँ फर्स्ट ऐड के दौरान भर्ती हुआ था, फ़ोन-ईमेल आदि की सहायता से मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध करवा दी जाये, तो उसमे भी कम से कम ४८ घण्टों का समय लगना था, जबकि दूसरी ओर उस फ्लाइट को रवाना होने में मात्र ३ घण्टों का समय ही शेष था। अब तो अंकुर को आगे की यात्रा कर पाना सम्भव नहीं लग रहा था। एक ओर ४८ घण्टों तक जोहनसबर्ग एयरपोर्ट पर वेटिंग पैसेंजर के रूप में अकेले रुकना तथा दूसरी ओर अगले २ घण्टे ५९ मिनट में मेडिकल रिपोर्ट उपलब्ध करवा पाना, दोनों ही कार्य उस समय असम्भव ही थे, जबकि ठीक उसी समय एयरपोर्ट का "काउन्टर ड्यूटी सहायक" अपनी उस दिन की सेवाएं समाप्त करके, अपने अन्य साथियों को आगे का कार्य भार सौंप रहा हो। अब बेचारे अंकुर के पास एक ही रास्ता शेष था, कि वह सच्चे मन व पूर्ण श्रद्धा से अपने ईष्ट/ ईश्वर को पुकारे और सहायता की मांग करे।
          अंकुर, जो अपने पैरों पर खड़े होने व चलने की शक्ति खोने के साथ-साथ मल-मूत्र त्यागने की शक्ति-आभास सभी कुछ पूर्ण रूप से खो चुका था, उसका नाभि के नीचे, दोनों पैरों तक लगभग सुन्न हो चुका था। यूरिनल पाइप और डाइपर लगा हुआ था। व्हील चेयर पर पहली बार और वह भी बिना किसी सहायक/ साथी के, अपने हाथों में केवल पासपोर्ट-टिकट-बोर्डिंग पास तथा डॉक्यूमेंट फाइल लिए, कभी ऊपर की ओर देखता, कभी नज़रें नीचे करके सोचता, तो कभी इधर-उधर नज़रें घुमाकर देखता, कि इस अचानक हुए अपाहिज को, उस अनजान जगह पर कोई तो सहायक मिले। कदाचित ईश्वर स्वयं प्रकट होकर अंकुर के सहायक बने और अर्जुन के सारथी की भांति उसको भी कोई रास्ता सुझाएँ। तभी अचानक एक झटका सा लगा, मानो पूरे शरीर में बिजली सी दौड़ गई हो और एक महिला ने अचानक अंकुर के पास आकर, उसकी व्हील चेयर को पीछे की और खीचते हुए उससे, उसका परिचय पूछते हुए हाल जानने का प्रयास किया। यह वो पल था, जब अंकुर को लगा, जैसे उसकी प्रार्थना ईश्वर ने स्वीकार कर ली और स्वयं दर्शन देने व उसकी सहायता के लिए ही वहाँ उसके पास प्रकट हुए हों। वह महिला, बीच में खड़ी व्हील चेयर को, जिस पर अंकुर बैठा था, बोर्डिंग पास काउन्टर की पंक्ति/ अहाता पर से एक किनारे करने के लिए आई थी।
         अनजान जगह, अकेला अपाहिज, अपनी परेशानियों की उलझनों में उलझा, परेशान व हताश 'अंकुर' कुछ सोचने व समझने में असमर्थ, आवेश में आकर उसने उस महिला को 'दीदी' (Elder Sister) कह कर संबोधित किया और वह एक सुखद गलती कर बैठा। बस फिर क्या था, अंकुर की उस अनजान 'अफ़्रीकी दीदी' ने उसे साँस रहने तक का कर्ज़दार/ ऋणी बना दिया। दीदी का नाम 'सुजैन' था। वह दक्षिण अफ्रीका के जोहनसबर्ग एयरपोर्ट पर एक महिला कर्मचारी के रूप अटेंडेंट के पद पर कार्यरत थी, जो उस वक्त "इंसानी ईश्वर"/ God Human, के रूप में अंकुर के समक्ष प्रकट हुई थी। उसके डेली ड्यूटी समाप्त हो चुकने के बाद भी 'सुजैन दीदी ने वहां रुक कर अंकुर की निःस्वार्थ भाव से आवश्यक सहायता की। उस अनजान जगह पर एक बेहतर सुविधाजनक हवाई यात्रा प्रतीक्षा भवन/ Travelers' Waiting Room, उपलब्ध करवाया व अपने भाई अंकुर को सुव्यस्थित कमरे में ले गई, स्वयं गोद में उठाकर व्हील चेयर से बिस्तर पर लिटाया। भरे हुए यूरिन बैग को स्वयं खाली भी किया। भाई अंकुर लिए जूस-भोजन आदि की व्यवस्था भी की। उसी वक्त सुजैन दीदी के पति का फ़ोन कॉल आया, क्योंकि वह अपने निर्धारित समय पर घर नहीं पहुची थी, और वह घर अपनी पत्नी की प्रतीक्षा कर रहे थे, जबकि 'सुजैन' अपने भारतीय भाई की सेवा में व्यस्त थी। अतः अब सुजैन दीदी ने वहाँ एयरपोर्ट पर अपने सहायक कर्मचारी को 'अंकुर' की सहायता की जिम्मेदारी सौंपी, भाई अंकुर को शीघ्र स्वस्थ होने का आशीर्वाद देते हुए परमपिता परमेश्वर से प्रार्थना की और वहां से भाव-भीनी विदाई ली।
          यह सब सुजैन दीदी ने अपने उस भारतीय भाई के लिए किया था, जिससे वह पहले कभी नहीं मिली थी। जोहनसबर्ग एयरपोर्ट पर यह उनकी पहली और कदाचित अंतिम मुलाकात थी। यदि हम परमपिता परमेश्वर में विश्वास रखते हैं और सच्चे-निर्मल मन से उन्हें याद करते हैं तो वही परमपिता  परमेश्वर किसी न किसी रूप में, अपनी संतान की सहायता करने अवश्य आते हैं। वह किसी भी प्राणी अथवा जीव के रूप में कभी भी-कहीं भी प्रकट होकर हमारे सहायक होते हैं।
 
                  भारतीय भाई 'अंकुर' की अफ़्रीकी दीदी 'सुजैन' को शत-शत नमन। 

                                                       !!*****!!

सत्य यात्रा चित्र की हृदयस्पर्शी रचना 'इन्सानी ईश्वर', इन्सानियत के प्रति अंतर्मन को छूती हुई एक संवेदात्मक अभिव्यक्ति है। 

सोमवार, 9 जनवरी 2017

Spiritual Power of Hindi Alphabets

हिंदी वर्णमाला की आध्यात्मिक शक्ति - 

हिंदी वर्णमाला में कुल ५२ अक्षरों का समावेश है, जिसमें साधारणतयः १३+३= १६ स्वर एवं ३६ व्यंजन होते हैं, जो हम सभी जानते हैं, किन्तु हिंदी वर्णमाला के आध्यात्मिक रहस्य का रूप कुछ अलग ही है।

- मातृका में ५२ अक्षर बताये गए हैं, जिसमे सबसे प्रथम अक्षर, सृष्टि का निर्माणक ओंकार है, इसके उपरान्त १४ मनुस्वरूप स्वर (Vowels), ३३ देवता स्वरुप व्यंजन (Consonants) तथा शेष ४ क्रमशः अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय व उपध्मानीय, यही सब मिलकर ५२ मातृका वर्ण माने गए हैं। इन्ही मातृकाओं का सार सर्वस्व बताया गया है। 

व्याख्यात्मक वर्णन - प्रथम अक्षर ॐ (ओंकार) के बाद १४ मनुस्वरूप स्वर हैं - स्वायंभुव, स्वरोचिष, औत्तम, रैवत, तामस, चाक्षुष, वैवस्वत, सावर्णि, ब्रह्मसावर्णि, रुद्रसावर्णि, दक्षसावर्णि, धर्मसावर्णि, रौच्य एवं भौत्य। ३३ व्यंजन रुपी देवता क्रमशः -
- अक्षर 'क' से 'ठ' तक कुल १२ आदित्य (द्वादश सूर्य के लिए मेरा दि० १६ फरवरी,२०१४ का ब्लॉग देखें),
- अक्षर 'ड' से 'ब' तक कुल ११ रूद्र (कपाली, पिंगल, भीम, विरुपाक्ष, विलोहित, शास्ता, अजपाद, अहिर्बुधन्य, शम्भु, चण्ड, भव),
- अक्षर 'भ' से 'ष' तक कुल ८ वसु (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु, आकाश, सूर्य, चंद्र, ध्रुव/ नक्षत्र/ ईशान) तथा
- अंत के अक्षर 'स' और 'ह' २ अश्वनी कुमार हैं।
- ४ जीव क्रमशः जरायुज, अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज/ अनुस्वार, विसर्ग, जिह्वामूलीय, उपध्मानीय।


कुल योग - प्रथम ॐ + १४ स्वर + ३३ व्यंजन + ४ जीव = ५२ अक्षर
इस प्रकार हिंदी वर्णमाला के ५२ अक्षरों का आध्यात्मिक स्वरुप स्कन्द पुराण में वर्णित है। 
- स्कन्द पुराण-कुमारिकाखण्ड (पृष्ठ सं १००,१०१)


The Spirituality of no.108.

108 की आध्यात्मिक शक्ति/ रहस्य १०८ का/ अष्टोत्तरशत जप- 

यह तो आप सभी जानते होंगे कि जप आदि करने के लिए हम कई प्रकार की मालाओं का प्रयोग करते हैं, मुख्यतः तुलसी ऐवम रूद्राक्ष और इन जप करने वाली मालाओं में १०८ दाने (गिनती के लिए अंक) होते हैं, परंतु १०८ ही क्यों होते हैं ? अपने किसी ईष्ट का नाम अथवा दीक्षा द्धारा प्राप्त मन्त्रों का १०८ के गुणांक/ बारंबारता में उच्चारण क्यों करते हैं ?
हम अपने मानवीय कष्ट कम करने या उनको सहन करने की शक्ति प्राप्त करने के उद्देश्य अथवा कई अन्य उद्देश्यों की पूर्ती के लिए १०८ दानो वाली माला का जप करते हैं और हिन्दू संस्कृति ऐवम वेद-पुराणों आदि में यह संख्या अत्यंत पवित्र मानी गई है। कारण निम्न हैं कि =

- कुल १२ राशियां (Sun Sign) विद्यमान हैं और सौरमण्डल में कुल ९ गृह हैं, जो सभी राशियों में क्रमशः गतिमान रहते हैं। अतः सभी नवगृहों को प्रधान मान कर, सूर्य की सभी १२ रश्मियों से शक्ति प्राप्त करने हेतु हम 12 x 9 = 108 दानो की माला का जप करते हैं।

- ज्योतिष विज्ञान के अनुसार कुल २७ नक्षत्र हैं व मानव योनि के ४ पुरुषार्थ हैं, धर्म, अर्थ, काम एवं मोक्ष और दूसरी ओर ४ प्रकार के जीव/ प्राणी क्रमशः जरायुज, अंडज, स्वेदज, उद्भिज्ज। हमारा जन्म, कर्म, सभी पुरुषार्थ, भाग्य, सम्पूर्ण जीवन-मरण इन्हीं पर निर्भर होता है। जिसका गुणांक 27 x 4 = 108 है।

-   भारतीय शास्त्रों एवं पुराणों के अनुसार १४ मनु (मन्वन्तर) / १४ यम / १४ भुवन तथा त्रिगुणी सृष्टि के तीन गुण - सत्व गुण, रजो गुण व तमो गुण, ३३ देवी-देवता (स्पष्टीकरण के लिए मेरा दि० १५ फरवरी,२०१४ का ब्लॉग देखें), सृष्टि/ प्रकृति के जीव का निर्माण कुल ५ तत्वों से मिल कर हुआ है और हमारे पवित्र हिन्दू ग्रन्थ श्रीमद्भागवत गीता, जोकि वास्तविक ज्ञान का केंद्र ऐवम स्रोत है, जिसका एक-एक अक्षर ईश्वर वाणी है, कुल १८ अध्यायों में वर्णित है, यही १८ विद्याएं हैं (स्कन्द पुराण-वैष्णव उत्कल०-३३१) तथा महाभारत का युद्ध, (अच्छाई की बुराई पर जीत, अथवा धर्म की अधर्म पर विजय) १८ दिनों तक ही चला था और अंत में धर्म की विजयपताका चहुँओर लहराई थी, फिर ६ शास्त्र (सांख्य, योग, न्याय, विज्ञान/ विषयक, पूर्व मीमांसा, उत्तर मीमांसा) व ४ प्रकार के जीव (जरायुज, अंडज, स्वेदज उद्भिज्ज), ब्रह्माण्ड के सभी प्राणियों/ जीवों का हर तरह से कल्याण करने के लिए १०८ की महत्ता इसप्रकार समीकरणित है -
 14 x 3 = 42 + 33 + 5 +18 + 6 + 4 = 108 है।

- त्रिगुणी सृष्टि के तीन गुण क्रमशः सत्त्व गुण, रजो गुण व तमो गुण, जिनके अधिष्ठाता त्रिदेव (श्री ब्रह्मा-रचयिता, श्री विष्णो-पालनकर्ता व श्री रूद्र-संहारकर्ता) तथा इन तीनो गुणों से संयुक्त जीव/ प्राणी के चार पुरुषार्थ क्रमशः धर्म, अर्थ, काम व मोक्ष सर्वविख्यात हैं। इनको पाने के लिए भक्ति एक साधन है, जिसके कुल ९ स्वरुप (श्रवण, कीर्तन, स्मरण, सेवन, अर्चन, वंदन, दास्य, साख्य तथा आत्मनिवेदन) हैं। इस प्रकार से गुणांक जप को ही 'अष्टोत्तरशत जप' कहा गया है।   3 x 4 x 9 = 108 

- हिन्दी वर्णमाला/ मातृका में कुल ५२ अक्षर हैं, जिनमें सभी ३३ देवी-देवता आदि सम्मिलित हैं (स्पष्टीकरण के लिए मेरा दि० १५ फरवरी,२०१४ का ब्लॉग देखें)। ज्योतिष विज्ञान के अनुसार कुलकुल १२ राशियां (Sun Sign) तथा २७ नक्षत्र (Stars) विद्यमान हैं, ब्रह्माण्ड में व्याप्त अष्टसिद्धि प्राप्त करने हेतु ८ योग (अष्टांग योग) तथा स्कन्द पुराण के अनुसार ९ निधियाँ (महापद्म, पद्म, शंख, मकर, कच्छप, मुकुंद, कुंद, नील, खर्व) परस्पर जुड़कर,  ५२+२७+१२+८+९ = १०८ की ही संख्या पूरी करती हैं।

- स्कन्द पुराण के अनुसार हमारी आत्मा, जोकि परमात्मा का ही एक अंश मात्र है और जो हमारे शरीर रुपी घर में निवास करती है, उस नाशवान शरीर के निर्माण में कुल २५ तत्वों का महत्वपूर्ण योगदान है, ५ महाभूत, ५ कर्मेन्द्रियाँ, ५ ज्ञानेन्द्रियाँ, ५ विषय, ५वां रूप सदाशिव स्वरुप है, जिसके ५ तत्व- मन, बुद्धि, अहंकार, प्रकृति व पुरुष हैं। प्रकृति की चार दिशाऐं अथवा किसी मण्डप के चार द्वार (पूर्व, पश्चिम, उत्तर, दक्षिण), इस प्रकार प्राणी (स्त्री-पुरुष) अपने शरीर रुपी मंदिर के प्रत्येक तत्व को चहुंओर से बलवान करने तथा अपने चित्त को वृत्तियों से रोकने के लिए अथवा ब्रह्माण्ड में व्याप्त अष्टसिद्धि प्राप्त करने हेतु ८ योग (अष्टांग योग) की शरण लेता है, अतः २५ महातत्वों का चारों दिशाओं से गुणांक तथा उसमे ८ का योग होने से १०८ अंक की जप, तप व होम विधि से प्राप्त शक्ति से हमारी शारीरिक अंतरात्मा बलवती होती है।  25x4=100+8=108 

                                                               - स्कन्द पुराण - कुमारिकाखण्ड (पृष्ठ सं०-१००,२१०,२१४,२२६)


अतः गणना में १०८ अंकों का और उसी के गुणांक में मंत्रोचारण एवं जप, तप, होम आदि का वैज्ञानिक, दैविक तथा आध्यात्मिक विधान है, जो पूर्णतयः सकारात्मक और उर्जात्मक है।