शनिवार, 22 फ़रवरी 2014

Positive Thoughts and Positive Thinking

सकारात्मक विचार / सकारात्मक सोच 


बहुत से ज्ञानिओं और लेखकों ने सकारात्मक सोच पर अपनी लेखनी की स्याही द्वारा सकारात्मक भावों का और सकारात्मकता का कलात्मक शब्द चित्रण किया है। मैं भी अपने इस ब्लॉग के माध्यम से कुछ ऐसा ही करने का प्रयास कर रहा हूँ। 
सकारात्मक/ धनात्मकता का चिह्न् '+' (Plus) अथवा नकारात्मक/ ऋणात्मक चिह्नों '-' ; '-' (Minus) का संयुक्त मिश्रण। तात्पर्य है कि सकारात्मकता का रास्ता नकारात्मकता के रास्ते से होकर ही गुजरता है, परन्तु यह हमारे अपने दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि दो से ज्यादा नकारात्मक विचारों को हम आने ही न दें। वैसे तो एक नकारात्मक विचार ही पूरी सकारात्मक सोच का बंटा धार करने में सक्षम है, परन्तु यदि इसका प्रयास बीज गणित के शुरुआती सबक के अनुसार चिह्नों के महत्व को समझते हुए कुछ इस तरह से किया जाये कि जिसकी बारम्बारता अधिक होगी या जिस चिह्न का मूल अंक बड़ा होगा वही उत्तर का स्वामी चिह्न कहलायेगा। 

उदाहरण के लिए :  7a - 3a = +4a  तथा  4a - 8a = -4a 

अक्सर बुराई आसान व हमारी पहुँच में होती है और अच्छाई कठिन होने के साथ साथ दूर भी होती है। उसी प्रकार नकारात्मक विचारों को आसानी से समझा जा सकता है अब प्रश्न उठता है कि "सकारात्मकता" का क्या अर्थ है उसका वास्तविक स्वामी क्या है? तो मेरे विचारों में "सकारात्मकता वह है जो आपको ख़ुशी प्रदान करे जो आपको हर पल खुश रहने का एहसास दिलाये आपको आंतरिक रूप से सकारात्मक बनाये।" 

एक प्रकार की स्थिरता, ठहराव को हम सकारात्मक सोच की श्रेणी में रख सकते हैं। अर्थात दुःख में और सुख में एक सा। ना दुःख में बहुत दुःखी और ना ही सुख में बहुत उत्साहित। जो है बस यही है। जो अब है वो कल ना 
होगा अर्थात अगर दुःख है तो कल न होगा और सुख है तो हमेशा ना रहेगा। इस पंक्ति को ध्यान में रखते हुए प्रत्येक स्थिति में हर पल ख़ुशी को महसूस करना ही सकारात्मकता का अर्थ है। परन्तु इसका मतलब यह कतई  नहीं है कि हम गलत कार्य स्वयं करें और ख़ुशी को महसूस करें। यहाँ पर स्वतः उत्पन्न हुए विचार अथवा सोच को समझने का प्रयास करना है। जैसे यदि आप नए जूते पहनकर सड़क पर कहीं जा रहे हैं और मार्ग में सड़क पर पड़ी किसी कील से आपका जूता, नया जूता ख़राब हो गया, उसमे छेद हो गया। अब लो आरम्भ होती है नकारात्मक विचारों का बारिश, एक एक बूँद करके नहीं, ये तो एक साथ ही मूसलाधार बारिश की तरह हमला करते हैं, 
- अपने आप को कोसना शुरू,
- जूते वाले को कोसना शुरू,
- सड़क बनाने वाले को गलियां देना शुरू, 
- यहाँ तक कि मार्ग पर चलने वाले यात्रियों को भी नहीं छोड़ा आपने। होता है ना यही, जरा सोचिये ?

अब दूसरी ओर सकारात्मक विचार केवल एक ही काफी है, चलो अच्छा हुआ मेरे जूते में ही कील घुसी, पैर तो घायल होने से बच गया। अब अगर मैं अपने सकारात्मक विचारों की बारिश करूँ तो कुछ इस प्रकार होगी -
- केवल जूते पर ही बीती, पैर बच गया वरना डॉक्टर, पटटी, इंजेक्शन आदि, शुक्र है ईश्वर का। 
- किसी बच्चे के नहीं लगी, वरना उसका मुलायम पैर तो सहन ही नहीं कर पता, शुक्र है ईश्वर का। 
- किसी के वाहन आदि पर नहीं लगी, यदि टायर पंक्चर हो जाता, तो कहाँ तक पैदल खीचना पड़ता।
- जूता नया है, और अभी तो गारन्टी में भी है।  इत्यादि।

अब देखिये एक छोटी से घटना ने हमारे विचारों में कितनी उथल पुथल मचा दी और हमारे व्यक्तित्व को भी दर्शा दिया। सोच ही है जो हमारे व्यक्तित्व का निर्माण करती है। हमें ऊँचा उठाती है। 

स्वामी विवेकानंद, पं श्री राम शर्मा आचार्य, श्री श्री रवि शंकर तथा Dr. Rhonda Byrne, Dr. Joseph Merphy जैसे अनेकों युगपुरुष, गुरू एवं लेखकों ने अपनी कलम की पैनी धार से वातावरण की तरंगों का सीना चीरकर हमें सकारात्मक विचारों की अद्भुत व अनूठी शक्ति से रूबरू करवाया।  


                "ईश्वर मंगल या अमंगल जो कुछ भी करता है, वह सब मेरे मंगल के लिए ही है। ऐसा दृढ़विश्वास                 रखना ही सांख्य भक्ति तथा सकारात्मकता का मुख्य लक्षण है।"  

महा शिव पुराण (रुद्रसंहिता - १९४)


सकारात्मकता का मतलब हालात से समझौता करना बिल्कुल नहीं है बल्कि अपने विचारों से अपने लिए अनुकूल वातावरण उत्पन्न करना तथा हर पल ख़ुशी को महसूस करते हुए, खुश रहकर हर परिस्थिति में अपने ईष्ट का धन्यवाद करना है। 
   
!! अच्छा सोचो, सकारात्मक सोचो, अच्छा करो, सफल होओ !!
              

बुधवार, 19 फ़रवरी 2014

Kinds of Human Income

आय / धन अथवा Income

मनुष्य को अपने माता-पिता, गुरु, भ्राता, प्रजा, दीन, दुःखी, आश्रितजन, अतिथि, अभ्यागत (घर पर अकस्मात आने वाला) आदि पोष्य वर्गों का पालन/ भरण पोषण प्रयत्न पूर्वक करना चाहिए। इस संसार में उसी व्यक्ति का जीवन श्रेष्ठ है, जो बहुतों के जीवन का साधक बनता है। जो मात्र अपने भरण-पोषण में लगे रहते हैं, वे जीवित रहते हुए भी मरे के समान हैं, क्योंकि अपना पेट पालन तो पूँछ वाला कुत्ता भी कर लेता है।

व्यवहार में अर्थ का महत्व है। अर्थ को उत्पन्न करना एवं बढ़ाना अतिआवश्यक है और जो हमारे सभी कार्यों की सम्पन्नता में  अनिवार्य रूप से उपयोगी हो, उसे "अर्थ" कहते हैं। अर्थ का अत्यन्त महत्व होने पर भी इसके अर्जन में संयम आवयशक है।

धन, मुख्यतः तीन प्रकार का होता है, शुक्ल, शबल (मिश्रित), कृष्ण।

  1. दायभाग के अनुसार वंश परम्परा से यथाधिकार प्राप्त धन। 
  2. प्रेम संगत किसी के द्वारा दिया गया धन। 
  3. यथाविधि विवाहित पत्नी के साथ प्राप्त धन। 

ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य तथा शूद्र वर्णों की आय का उल्लेख निम्न प्रकार हैं। 

- ब्राह्मण की आय के तीन मुख्य साधन हैं - याजन (यज्ञ कराने से प्राप्त आय), अध्यापन से प्राप्त आय और सत्य पात्र से लिया गया दान।

- क्षत्रिय की आय भी तीन प्रकार से समझी जाती है - कर से प्राप्त धन, दण्ड द्वारा प्राप्त धन और विजय द्वारा प्राप्त धन।

- वैश्य का तीन प्रकार का धन है - खेती से प्राप्त धन, गौपालन से प्राप्त धन तथा व्यापर से प्राप्त धन। 

- शूद्र वर्ण की विशेष आय वही है जो उपरोक्त वर्णों की सेवा एवं उनके कार्यों में सहायता करके कृपा रूप से प्राप्त हो।

शास्त्रसम्मत विधि से ही धनोपार्जन करना चाहिए तथा सभी मनुष्यों को अपने लाभांश से पितृगण, देवगण तथा ब्राह्मण आदि की सेवा एवं पूजा आदि करनी चाहिए। अपने आय एवं बचत में से अन्नादि खाद्य पदार्थ, पेय पदार्थ, वस्त्र, शय्या, आसन तथा गौ आदि का दान, पाप नाशक व पुण्य दायक होने के साथ साथ, अप्रत्याक्ष रूप से धन वृद्धि में भी सहायक होता है।

वर्तमान में मानव के जीविकोपर्जन के सामान्यतयः दस साधन मुख्य व सर्वमान्य हैं -

  1. विद्या 
  2. शिल्प 
  3. वेतन 
  4. सेवा 
  5. गौरक्षा 
  6. व्यापार 
  7. कृषि 
  8. वृत्ति (बिना किसी कार्य के, सहायता के रूप में मिलने वाली मासिक धनराशि)
  9. भिक्षा 
  10. कुसीद (ब्याज द्वारा कमाई गई धनराशि)


प्रत्येक वर्ण के किसी भी व्यक्ति को अपने जीवन यापन के लिए केवल न्यायोचित मार्ग द्वारा ही धन अर्जन करके अपना कार्य पूर्ण करना चाहिए।


- गरुड पुराण (आचार काण्ड - ३७६)




Kinds of Human Bath

स्नान/ Bath - 

आपने तरह तरह के स्नानों के बारे में सुना व पढ़ा होगा। साधारणतया तीन प्रकार के स्नान होते हैं, पहला जन्म के समय, दूसरा विवाह के समय व तीसरा मृत्यु होने पर। 
बिना स्नान किये पुरुष अथवा नारी जप, तप, पूजा, हवन आदि करने के अधिकारी नहीं होते। प्रातः काल का स्नान आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण बताया गया है। स्नान से शरीर में चुस्ती व स्फूर्ति आती है। मन तरोताजा रहता है।  मानव जीवन की दैनिक दिनचर्या में आठ प्रकार के स्नानों का वर्णन निम्नलिखित है - 

  1. नित्य 
  2. नैमित्तिक 
  3. काम्य 
  4. क्रियांग 
  5. मलापकर्षण 
  6. मार्जन 
  7. आचमन 
  8. अवगाहन 

  1. नित्य स्नान - प्रातः काल का स्नान आध्यात्मिक व वैज्ञानिक रूप से अत्यन्त महत्वपूर्ण है। रात कि निद्रा आलस हटाने व शरीर में स्फूर्ति लाने के लिए किये गए इस स्नान  को "नित्य स्नान" कहते हैं। यह स्नान हमें प्रातः काल नियम पूर्वक रोज़ ही करना चाहिए।  इससे मन प्रसन्न रहता है व दिन की शुरुआत भी अच्छी होती है। 
  2. नैमित्तिक स्नान - शव, चाण्डाल, विष्ठा तथा रजस्वला का स्पर्श करने के बाद जो स्नान किया जाता है, उसे "नैमित्तिक स्नान" कहते हैं। 
  3. काम्य स्नान - ज्योतिषशास्त्र के अनुसार पुष्य आदि नक्षत्रों में जो स्नानादिक कृत्य किया जाता है, वह "काम्य स्नान" कहलाता है। निष्काम व्यक्ति को इस प्रकार का स्नान नहीं करना चाहिए। 
  4. क्रियांग स्नान - जब मनुष्य पूजा, हवन, होमादिक कृत्यों को सम्पन्न करने की इच्छा से प्रेरित होकर अथवा कोई अन्य पवित्र कृत्य, देवता या अतिथि आदि का पूजन-सत्कार इत्यादि करने की इच्छा से सम्पूर्ण स्नान करता है, ऐसे पवित्र भावना से किये गए स्नान को "क्रियांग स्नान" की संज्ञा दी गई है। 
  5. मलापकर्षण स्नान - शारीरिक मल को दूर करके साफ़ करने के उद्देश्य से सरोवर, देवकुण्ड या तीर्थ नदियों में किया गया स्नान "मलापकर्षण स्नान" है। सामान्य जल से स्नान करने पर केवल शरीर की ऊपरी शुद्धि होती है और पवित्र-तीर्थ स्थानों के जल से शरीर का बाह्य एवं आंतरिक रोम-रोम शुद्ध हो जाता है और विशष्ट फल की प्राप्ति होती है।   
  6. मार्जन स्नान - मुख्य रूप से स्नान के निमित्त विहित मन्त्रों द्वारा मार्जन करने से मनुष्य का पाप उसी क्षण विनष्ट हो जाता है। इस स्नान को ही "मार्जन स्नान" कहते हैं। 
  7. आचमन स्नान - पूजन-हवन अथवा अन्य किसी पवित्र कार्य को करने से पूर्व इंद्रियों सहित पूरे शरीर को पवित्र करने की भवना से पवित्र गंगा जल द्वारा की गई आचमनादि क्रियाओं को "आचमन स्नान" की संज्ञा दी गई है। 
  8. अवगाहन - ज्योतिषशास्त्र के अनुसार विशेष तिथियों एवं गृह-नक्षत्रों में किसी विशिष्ट कार्य की पूर्ती हेतु अथवा देवता विशेष के लिए किया गया स्नान "अवगाहन स्नान" कहलाता है। दिन, तिथि व समय के अनुसार अवगाहन स्नान के अत्यंत रूप तथा नियमादि होते हैं। 
तीर्थों के जल का अभाव होने पर उष्ण जल अथवा अन्य किसी प्रकार से प्राप्त कृत्रिम जल से स्नानादि क्रियाएँ सम्पन्न कर लेनी चाहिए। यूं तो भूमि से निकला हुआ जल पवित्र होता है। पर्वतों, झरनों, नदिओं अथवा सरोवर आदि का जल भी पवित्र होता है। इन सभी जलों में तीर्थ स्थान का जल अत्यन्त शुभ व पवत्र माना जाता है और अपेक्षाकृत इनसे भी अधिक श्रेष्ठ, पापनाशक, पुण्य प्रदायक व परम पवित्र तथा निर्मल जल "गंगा जल" का स्थान सर्वोपरी है। 

- गरुड पुराण (आचार काण्ड - ३७७)




रविवार, 16 फ़रवरी 2014

Surya Gayatri Mantra & Twelve energy radix of Lord Surya

अपराजित शक्तियों का मूल स्रोत एवं ग्रहों के अधिपति भगवान् सूर्य के बारे में वर्णन करना मतलब अपनी कलम को धोखा देना है, परन्तु फिर भी अपनी तुच्छ बुद्धि व अधययन के आधार पर कुछ महत्वपूर्ण तथ्य निम्न हैं -

हम सभी अपने अपने तरीकों से सूर्य देव की पूजा अर्चना करते हैं, जिसमें प्रातःकाल का सूर्य नमस्कार व सूर्य की किरणों पर जल अर्पित करने की आध्यात्मिक परम्परा, वैज्ञानिक तौर पर सर्वमान्य है। शक्ति एवं ऊर्जा का मूल स्रोत सूर्य ही प्रकृति के सभी जीवों के पालन पोषण का आधार है। हमें एकाग्रचित् होकर पवित्र मन से नियमित रूप से सूर्योपासना करनी चाहिए।

निःरोगी काया, भोग व मोक्ष प्रदायक शक्तिपुंज के अधिष्ठाता भगवन सूर्य का सूर्य गायत्री मंत्र इस प्रकार है -

ॐ आदित्याय विद्महे, विश्वभावाय धीमहि, तन्नः सूर्यः प्रचोदयात।   

(या) 

ॐ भास्कराय विद्महे, दिवाकराय धीमहि, तन्नो सूर्यः प्रचोदयात।   


ग्रहाधिपति भगवान सूर्य का मूल मंत्र इस प्रकार है -

ॐ खखोल्काय नमः।


पौराणिक द्वादश सूर्यों का वर्णन निम्नलिखित हैं -
  1. भग 
  2. सूर्य 
  3. अर्यमा 
  4. मित्र 
  5. वरुण  
  6. सविता  
  7. धाता  
  8. विवस्वान  
  9. त्वष्टा  
  10. पूषा 
  11. इंद्र  
  12. विष्णु 
- गरूड पुराण (आचार काण्ड -२९)


ऋग्वेद की पवित्र सूर्य/ वरुण स्तुतिओं में से एक स्तुति -

             "पवित्र पराक्रम युक्त, सबको आच्छादित करने वाले राजा वरुण, दिव्य तेज पुंज सूर्यदेव को आधार 
              रहित आकाश में धारण करते हैं। इस तेज पुंज सूर्यदेव का मुख नीचे की ओर तथा मूल ऊपर की ओर 
              है।  इसके मध्य में दिव्य किरणें विस्तीर्ण होती चलती हैं।"

- ऋग्वेद संहिता-१ (सूक्त-२४/७ - २६०/२९)


The Logic of 33 GODs

३३ …………… देवी-देवता 

३३ करोड़ / 
३३ लाख / 
३३ हजार / 
३३ कोटि .... या फिर, कितने ?

इस प्रकार कई पूजनीय देवी-देवताओं के बारे में तरह-तरह की मान्यतायें लोगों में व्याप्त हैं, परन्तु इसके पीछे वास्तविक रहस्य क्या है? जब मैंने इस तथ्य के बारे में अपनी जिज्ञासा शांत करने के उद्देश्य से पवित्र एवं ज्ञानवर्धक पुस्तकों का अध्ययन किया, तो कुछ ऐसा सामने आया जो उचित व सर्वमान्य है। 

मैनें अपने पिछले ब्लॉग में "भगवान्" का अर्थ व उसका पूर्ण समावेश, प्रकृति के पाँच तत्वों से बने शरीर में होने की बात कही है, मगर यह क्या, यहाँ तो कुछ और भी सामने आ गया। 

जी हां, केवल "भगवान्" ही नहीं बल्कि उपरोक्त ३३ करोड़ देवी-देवताओं का प्रत्यक्ष वास है हमारे मानव शरीर में ! यह कोई अचम्भे की बात नहीं है, वरन् सोचने व समझने की बात है, कि आखिर कैसे ?

३३ देवताओं का वास्तविक अर्थ व तर्क प्रमाण सहित निम्नलिखित है -

१). शरीर शास्त्र तथा विज्ञान के अनुसार हमारा सम्पूर्ण शरीर पूर्ण रूप से केवल "मेंरुदण्ड" या "स्पाइनल कॉर्ड" पर टिका है जो कई अस्थिओं व घटकों से मिल कर बनी हुई सर्पाकार पोली डंडी है, जिस पर शरीर का प्रत्येक कशेरू टिका और सूत्रों से कसा हुआ है। यह अस्थि समूह कुल पाँच भागों में विभाजित है -

           १. ग्रीवा - स्पाइनल रीज़न -                   ७ अस्थियाँ   -   7
           २. वक्ष - डॉर्सल रीज़न -                       १२ अस्थियाँ   - 12
           ३. कटि - लम्बर रीज़न -                        अस्थियाँ    -  5
           ४. त्रिक - वस्तिगृह्वर - सैक्रल रीज़न -        अस्थियाँ   -  5
           ५. चेंचु - क़ॉक्सीजियल -                        अस्थियाँ    -  4
                                                                                   -------
                                                                                      33 .

हमारे शरीर की सभी नाड़ियां इसी पोले अस्थि खण्डों से होकर गुजरती हैं। यह लचीला और अपनी धुरी पर हर दिशा में घूमने में सक्षम व शरीर का प्रमुख आधार है। इन पाँच प्रकार के तैंतीस खण्डों के इसी समूह को वास्तव में ३३ देवता कहा गया है और इनमे सन्निहित क्षमता को दैवीय शक्ति की मान्यता दी गई है। 

-- वेदमूर्ति पं० श्री राम शर्मा आचार्य
शांतिकुंज, हरिद्वार


२). यज्ञ करते समय ऋग्वेद की जिन ऋचाओं का उच्चारण करके देवताओं का आह्वाहन व स्तुति की जाती  है, उनमें से मात्र एक का हिंदी अनुवाद इस प्रकार है -
            
           "आप सभी ३३ देवता हमारे इस पावन यज्ञ में मधुपान के लिए पधारें। हमारी आयु बढ़ाएं और हमारे 
            पापों को भली-भांति विनष्ट करें। हमारे प्रति द्वेष की भावना को समाप्त करके, सभी कार्यों में
            सहायक बनें।"  

- ऋग्वेद संहिता -१ (सूक्त-३४/११-४०९/४८)


ऋषि-मुनि, संत-महात्मा आदि "कुण्डलिनी जागरण" की प्रक्रिया के दौरान अपनें शरीर की इन्ही दैवीय शक्तिओं को उजागर करने का प्रयास करके ब्रह्माण्ड के सभी ३३ देवी-देवताओं का ही आत्मदर्शन करते हैं। 

यह मंगलमयी मोक्ष प्रदायनी कुण्डलिनी ३३ देवी-देवताओं के रूप में हमारे शरीर में प्रत्यक्ष रूप से विराजमान है। 


शनिवार, 15 फ़रवरी 2014

Meaning of Bhagwan is Five Elements of Body

प्रिय पाठकों,

सादर प्रणाम !

जैसा कि आप जानते व समझते हैं कि चौरासी लाख योनिओं में श्रेष्ठ मानव योनि है तथा धर्मों में सर्वश्रेष्ठ धर्म मानव धर्म है। हिन्दू, मुस्लिम, सिक्ख, ईसाई, पारसी, जैन व बुद्ध आदि सभी धर्म मानवता को एक ही सन्देश देते हैं कि आपस में प्रेम करो तथा एक दुसरे की मदद करो।

उपरोक्त पंक्ति का वास्तविक व गूढ़ रहस्य हिंदी भाषा के "भगवान्" शब्द के शाब्दिक अर्थ से स्पष्ट  हो जाता है। सामान्यतः हम "भगवान्" को केवल हिन्दुओं के लिए प्रयोग करते हैं। अन्य संप्रदाय के लोग अपनी -अपनी भाषा में अलग -अलग नामों से पुकारते हैं। जबकि आपको जानकर अचम्भा नहीं होना चाहिए कि इन्सान भगवान् का ही रूप है, हर इन्सान में भगवान् का वास है, बल्कि हर प्राणी अपने आप में भगवान् है। बस थोड़ा सा सोच-विचार करने की जरूरत है, जैसे -
                     
                             - भूमि / धरती
                            - गगन / आकाश
                            - वायु / हवा
                             - अग्नि / प्रकाश   
                            - नीर / पानी

आप और हम भली प्रकार जानते हैं कि प्राणी की संरचना प्रकृति के पाँच तत्वों से मिलकर हुई है - धरती, आकाश, वायु, आग  पानी प्रकृति के यह पाँचों तत्व हमारे मानव शरीर में पूर्ण रूप से निहित हैं, जोकि "भगवान्" शब्द का वास्तविक अर्थ भी स्पष्ट करते हैं।

अंततः हमारे कहने तात्पर्य इतना मात्र है कि आप किसी भी धर्म अथवा रूप में ईश्वर को पाना चाहते हैं तो सर्वप्रथम इंसानियत को समझने का प्रयास करें तथा प्रत्येक मानव / इन्सान / प्राणी से प्रेम करें, क्योंकि हमारे वास्तविक पूजनीय "भगवान्" तो हर जगह हैं, हर प्राणी में हैं, बल्कि हमारे ही अंदर हैं।

हम सब एक ही परम पिता परमेश्वर की सन्तान हैं व एक समान हैं  

!! सबका मालिक एक !!



शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2014

Ganesha Gayatri Mantra & Twelve names of Lord Ganesha

एक बुद्धिमान मनुष्य पृथक पृथक तरीकों व नामों से विघ्नविनाशक, प्रथमपूज्यनीय भगवान् गणेश का पूजन व जप करता है। गणेश पूजन के कुछ महत्वपूर्ण मंत्र निम्नवत हैं -

गणेश गायत्री मंत्र - 

ॐ महाकर्णाय विद्महे वक्रतुण्डाय धीमहि तन्नो दन्तिः प्रचोदयात्। 


गणेश पूजन करने व जप करने योग्य अन्य मंत्र -

१. ॐ गणाय नमः

२. ॐ गणपतये नमः

३. ॐ कूष्माण्डकाय नमः

४. ॐ गं गणपतये नमः

५. ॐ गः स्वाहा (प्रणव युक्त मूल मंत्र)

शिव - पार्वती पुत्र व गणो के अधिनायक प्रथमेश भगवान गणेश के बारह नाम इस प्रकार हैं - 

            गणपूज्यो वक्रतुण्ड एकदंष्ट्री त्रियम्बकः।
            नीलग्रीवो लम्बोदरो विकटो विघ्नराजकः।।
            धूम्रवर्णो भालचन्द्रो दशमस्तु विनायकः।
            गणपतिर्हस्तिमुखो द्वादशारे यजेड्गणम् ।।


विधि विधान व सच्चे मन से गणपति देव का स्मरण तथा उनकी पूजा करके व्रत, जप एवं हवन करने से विद्द्या एवं मोक्ष की प्राप्ति होती है। खाण्ड के लड्डू व मोदक का प्रसाद भगवन गणेश को अत्यंत प्रिय हैं। भगवान् को उनका प्रिय भोग भेंट स्वरुप देने से मनुष्य की सभी कामनाएं पूर्ण होती हैं व सौभाग्य की प्राप्ति होती है।

- गरुड पुराण (आचार काण्ड-२१९)


गुरुवार, 13 फ़रवरी 2014

Meaning of Gayatri Mantra

गायत्री मन्त्र

! ॐ भूर्भुवः स्वः तत्सवितुर्वरेण्यम् भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नह प्रचोदयत् !

भावार्थ

उस प्राण स्वरूप, दुःखनाशक, सुखस्वरूप, श्रेष्ठ, तेजस्वी, पापनाशक, देवस्वरूप परमात्मा को हम अन्तरात्मा में धारण करें। वह परमात्मा हमारी बुद्धि को सन्मार्ग की ओर प्रेरित करें।     
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ईश्वर दण्ड नहीं देता, कर्म की प्रतिक्रिया अन्यायी को दण्ड देती है। 
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मानव मात्र को उज्जवल भविष्य प्रदान में सक्षम गायत्री महाविद्या सबके लिए सुलभ, सबके लिए साध्य, सबके लिए हितकर है। इसे समझें, अपनायें, साधें और अनुपम लाभ उठायें।      
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विविध सम्प्रदायों में गायत्री मंत्र का अर्थ - 


हिन्दू :- ईश्वर प्राण स्वरूप, दुःख नाशक, सुख स्वरूप है। हम प्रेरक देव के उत्तम तेज का ध्यान करें, जो हमारी बुद्धि को सन्मार्ग पर आगे बढ़ने के लिए पवित्र प्रेरणा दे। 

इस्लाम :- हे अल्लाह! हम तेरी ही वंदना करते तथा तुझी से सहायता चाहते हैं। हमें सीधा मार्ग दिखा। उन लोगों का मार्ग, जो तेरे कृपा पात्र बनें, न कि उनका जो तेरे कोप भाजन बने तथा पथ भ्रष्ठ हुए। 
     
सिक्ख :- ईश्वर एक है, उसका नाम सत्य है। वह सृष्टि कर्ता, समर्थ पुरुष, निर्भर, निर्बैर, जन्म रहित तथा स्वयं भू है। वह गुरू की कृपा से जाना जाता है।  

ईसाई :- हे पिता हमे परीक्षा में न डाल, परन्तु बुराई से बचा, क्योंकि राज्य, पराक्रम तथा महिमा सब तेरी ही है।     

जैन :- अईहतों को नमस्कार, सिद्धों को नमस्कार, आचार्यों को नमस्कार, उपाध्याओं को नमस्कार तथा सब बन्धुओं को नमस्कार।     

बौद्ध :- मैं बुद्ध कि शरण में जाता हूँ। मैं धर्म की शरण में जाता हूँ। मैं संघ की शरण में जाता हूँ। 

पारसी :- वह परम गुरू (अहुरमज़द) परमेश्वर अपने ॠत व सत्य के भंडार के कारण राजा के समान महान है। ईश्वर के नाम पर किये गए परोपकारों से मनुष्य, प्रभु प्रेम का पात्र बनता है।  

-- वेदमूर्ति पं० श्री राम शर्मा आचार्य,
शांतिकुंज, हरिद्वार



"जो उपासक प्रातःकाल उठकर स्नान आदि से निवृत्त होकर नित्य गायत्री मंत्र का जप करता है, वह कमलपत्र की भाँति पाप से संलिप्त नहीं होता। "   
- गरुड पुराण (आचार काण्ड - ३७५)

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हरि।  ओइम।  तत्सद। 

माता - पिता के श्री चरणों में सादर प्रणाम
गुरू के श्री चरणों में सादर प्रणाम
ईष्ट देव को साष्टाँग प्रणाम
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यहाँ से मेंरा ब्लॉग आरम्भ होता है। आप सभी पाठकों से हार्दिक आशीर्वाद की अभिलाषा में आपका अपना -

- अभिषेक कुमार "चित्रांश"
सी० बी० गंज, बरेली
उत्तर प्रदेश
चलभाष # 09897111313